हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, August 24, 2009

हरितालिका व्रतकथा में भय तत्व

 

imageहरितालिका तीज का व्रत अभी अभी सम्पन्न हुआ। एक दिन पहले पत्नी के साथ कटरा बाजार में जाकर व्रत सम्बन्धी खरीदारी करा लाया। वहाँ अपने उत्सवप्रधान समाज की छटा देखते ही बनती थी। दान के लिए चूड़ी, आलता, बिन्दी, सिन्दूर, साबुन, तेल, कंघी, शीशा, चोटी, रिबन, आदि सामग्रियों की मौसमी दुकानें ठेले पर सज गयी थीं। प्रायः सभी सुहागिनें इन सामानों के रेडीमेड पैकेट्स खरीद रहीं थीं, लेकिन निजी प्रयोग के लिए वही साजो-सामान ऊपर सजी पक्की दुकानों से पसन्द किये जा रहे थे। सभी ‘रेन्ज’ की दुकानें और सामान, और उतने ही रेन्ज के खरीदार भारी भीड़ के बीच एक दूसरे से कन्धा घिस रहे थे।

मैने भी यथासामर्थ्य अपनी धर्मपत्नी को फल, फूल, बिछुआ, पायल, और श्रृंगार व पूजा की सामग्री खरीद कराया। साथ में सड़क की पटरी पर बिक रही हरितालिका व्रत कथा की किताब भी दस रूपये में खरीद लिया। मेरा अनुमान है कि यह पुस्तक लगभग सभी घरों के लिए खरीदी गयी होगी।

तीज के दिन भोर में साढ़े तीन बजे अलार्म की सहायता से जगकर पत्नी को व्रत के लिए तैयार होता देखता रहा। चार बजे आखिरी चाय की चुस्की लेकर इनका उपवास शुरू हुआ। व्रत की पूजा का मूहूर्त प्रातः साढ़े नौ बजे से पहले ही था। इसीलिए स्नान ध्यान और पूजा का क्रम जल्दी ही प्रारम्भ हो गया था। आमतौर पर इस दिन की पूजा का क्रम शनैः-शनैः आगे बढ़ता है, ताकि मन उसी में रमा रहे और भूख को भूलाए रहे। किन्तु इस बार शुभ-मुहूर्त ने थोड़ी कठिनाई पैदा कर दी। image

शिव मन्दिर में जाकर शिवलिंग और पार्वती जी का पूजन-अभिषेक व घर में वेदिका बनाकर विशेष पूजन करते समय किताब में बतायी गयी पूजन विधि का अक्षरशः पालन करने का प्रयास जारी रहा। इस व्रत में उपवास के साथ व्रत की कथा सुनना भी अनिवार्य बताया गया था। घर से दूर अकेले रहने के कारण बड़े-बुजुर्ग या पण्डीजी की भूमिका मुझे ही निभानी पड़ी। धर्मपत्नी ने हाथ मे फूल अक्षत्‌ लेकर आसन जमाया और मेरे हाथ में पोथी थमा दिया।

व्रत की कथा माँ पार्वती और भगवान शंकर के बीच वार्ता के रूप में प्रस्तुत की गयी है। शिव जी अपनी धर्मपत्नी को उन्हीं की कहानी बता रहे हैं कि उन्होंने कैसे कठिन तपस्या करके शिव जी को वर के रूप में प्राप्त किया। अपने पिता द्वारा विष्णु के साथ उनके विवाह का निर्णय लिए जाने पर कैसे उन्होंने विरोध स्वरूप अपनी सखी (आली) के साथ स्वयं का हरण कराया और घने जंगल में जाकर घोर तपस्या करते हुए शिव जी को प्रसन्न किया, वर पाया और अन्ततः अपने पिता को शिव जी के वरण के लिए राजी किया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को अपनी तपस्या का फल प्राप्त कर चुकी पार्वती जी ने शिवजी से ‘इस व्रत का माहात्म्य पूछा’। (शायद पाठकों और भक्तगणों को सुनाने के लिए उन्होंने ऐसा पुनरावलोकन किया होगा...!)

शिव जी बोले- हे देवि! सभी सुहागिनों को चाहिए कि ‘इन मन्त्रों तथा प्रार्थनाओं के द्वारा मेरे साथ तुम्हारी पूजा करे, तदनन्तर विधिपूर्वक कथा सुने और ब्राह्मण को वस्त्र, गौ, सुवर्ण, आदि प्रदान करे। इस तरह जो स्त्री अपने पति के साथ भक्तियुक्त चित्त से इस सर्वश्रेष्ठ व्रत को सुनती तथा करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। लेकिन जो स्त्री तृतीया तिथि को व्रत न कर अन्न भक्षण करती है, वह सात जन्म तक वन्ध्या रहती है, और उसको बार-बार विधवा होना पड़ता है। वह सदा दरिद्री, पुत्र-शोक से शोकाकुल, कर्कशा स्वभाव की लड़की सदा दुख भोगने वाली होती है। उपवास न करने वाली स्त्री अन्त में घोर नरक में जाती है।’

‘तीज के दिन अन्न खाने से शूकरी, फल खाने से बन्दरिया, पानी पीने से जोंक, दूध पीने से नागिन, मांसाहार करने से बाघिन, दही खाने से बिल्ली, मिठाई खाने से चींटी, और अन्य वस्तुओं को खाने से मक्षिका (मक्खी) के जन्म में आती है। उस दिन सोने से अजगरी और पति को ठगने से कुक्कुटी (मुर्गी) होती है।’

imageइस कथा का यह अन्तिम भाग पढ़ते-पढ़ते मेरा धैर्य जवाब दे गया। मन की आस्था दरकने लगी। घर-घर में निर्जला उपवास कर रही धर्मभीरु गृहिणियों को इस व्रत के लिए तैयार करने तथा दान-पुण्य की ओर प्रवृत्त करने के ऐसे हथकण्डे को देखकर पहले तो थोड़ी हँसी आयी, लेकिन जब इस बकवास को लिखने और बेचने वाले धूर्त और पाखण्डी लोगों की ऐसी करतूत से हमारे समाज को होने वाली हानि की ओर ध्यान गया तो मन रोष से भर गया।

कथा पढ़ने के बाद कल से लेकर आजतक इसके बारे में सोचता रहा। टीवी, इण्टरनेट और अखबारों में सुहागिन स्त्रियों के सजे-सँवरे सुन्दर और उत्साही चित्रों को देखता रहा, मेहदी रचे हाथों को सायास प्रदर्शित करती भाव-भंगिमा को निहारता रहा। उत्सव का ऐसा मनोरम माहौल है कि अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते इस विचार को कोई आश्रय नहीं दे पा रहा हूँ। मन में यह खटक रहा है कि इस कठिन व्रत का जितनी पाबन्दी से ये स्त्रियाँ खुशी-खुशी पालन करती दीखती हैं उसके पीछे इस ‘भय तत्व’ का भी कुछ हाथ है क्या?

मैं हृदय से यह मानना चाहता हूँ कि यह सब पति-पत्नी के बीच एक नैसर्गिक प्रेम और विश्वास, पारस्परिक सहयोग व समर्थन तथा मन के भीतर निवास करने वाली श्रद्धा, भक्ति, पूजा और अर्चना की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण ही हो रहा होगा; लेकिन मन है कि बार-बार उस किताब में लिखी बातों में उलझ जा रहा है जो घर-घर पहुँच कर उसी श्रद्धा से बाँची और सुनी गयी होंगी।

इस उलझन से निकलने में कोई मेरी मदद तो करे...!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Saturday, August 15, 2009

ब्लॉग की किताब चल कर आयी...

 

मुखपृष्ठ सत्यार्थमित्र... आज स्वतन्त्रता दिवस है, और आज मेरी पुस्तक प्रेस से छूटकर मेरे घर आ गयी है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने इसे छापकर निश्चित रूप से एक नयी शुरुआत की है। कहना न होगा कि आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

ब्लॉग की किताब छापना व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी है इसका पता शायद इस किताब पर पाठकों की प्रतिक्रिया से पता चलेगा। अलबत्ता जिस संस्था ने इसका प्रकाशन किया है, उसके पास अपने उत्पादों के विपणन का कोई नेटवर्क नहीं है। पुराने जमाने में देश भर के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार यहाँ आते रहते थे और एकेडेमी के बिक्री काउण्टर पर उपलब्ध प्रकाशनों को खरीदते थे और अपने शहर जाकर इसके बारे में बताते थे। इसप्रकार यहाँ की धीर गम्भीर, व शोधपरक पुस्तकें धीरे-धीरे लम्बे समय में बिकती थीं। कुछ खरीद सरकारी पुस्तकालयों द्वारा की जाती थी।

पहली बार लोकप्रिय श्रेणी की एक ऐसी हल्की-फुल्की पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे आमपाठक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। लेकिन आम पाठकों तक इसे पहुँचाने का सही माध्यम क्या है, इसकी जानकारी हमें नहीं है। एकेडेमी द्वारा भी इस दिशा में कोई स्पष्ट व सुविचारित नीति अपनाये जाने का उदाहरण नहीं मिला है।

अतः मैं यहाँ अपने शुभेच्छुओं, मित्रों और वरिष्ठ चिठ्ठाकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस सद्यःप्रकाशित ब्लॉग की किताब के प्रचार-प्रसार और बिक्री के कारगर उपाय सुजाने का कष्ट करें।

सत्यार्थमित्र आवरणसत्यार्थमित्र पुस्तक का आवरण 

इस पुस्तक में मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित अप्रैल-२००८ से मार्च-२००९ तक की कुल १०१ पोस्टों में से चयनित ६५ पोस्टें संकलित की गयी हैं। प्रत्येक पोस्ट के अन्त में कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश भी दिये गये हैं। ऐसी टिप्पणियों को स्थान दिया गया है जिनसे कोई नयी बात विषयवस्तु में जुड़ती हो।

पुस्तक के अन्त में दिए गये परिशिष्ट में हिन्दी ब्लॉगजगत के सर्वाधिक सक्रिय ४० चिठ्ठों का नाम-पता दिया गया है जिनका सक्रियता क्रमांक चिठ्ठाजगत द्वारा निर्धारित है।

कुल २८८ पृष्ठों के इस सजिल्द संस्करण का बिक्री मूल्य रु.१९५/- मात्र रखा गया है। इसपर एकेडेमी की नीति के अनुसार छूट की व्यवस्था भी है।

तो देर किस बात की... आइए प्रिण्ट माध्यम में हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा खोलने के इस अनुष्ठान में अपना भरपूर योगदान करें। इसके बारे में उन्हें बतायें जो अभी अन्तर्जाल की सुविधा से नहीं जुड़ सके हैं। पुस्तक प्राप्त करने का तरीका हिन्दुस्तानी एकेडेमी के जाल पते पर उपलब्ध है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Wednesday, August 12, 2009

किताबों की खुसर-फुसर भाग-३

पिछले साल मैने एक अत्यन्त प्रतिष्ठित संस्था के एक समृद्ध पुस्तकालय में जाकर वहाँ मौजूद किताबों की जो खुसर-फुसर सुनी थी, उसका वर्णन सत्यार्थमित्र के पन्नों पर दो किश्तों में किया था। लम्बे समय से लकड़ी और लोहे की आलमारियों में जस की तस पड़ी हुई किताबों की भाव भंगिमा देखकर और पीड़ा व उलाहना भरी बातें सुनकर मेरा मन इतना व्यथित हुआ था कि उसके बाद कभी अकेले में उन किताबों के पास जाने की मुझे हिम्मत नहीं हुई। अलबत्ता मैने उनकी कहानी यहाँ-वहाँ प्रकाशित और प्रसारित कराकर यह कोशिश की थी कि सुधी पाठकों और हिन्दी सेवियों के मन में उन बोलती किताबों के प्रति सम्वेदना जागृत हो, और लोग उनका हाल-चाल लेने अर्थात्‌ उनके पन्ने पलटने के लिए पुस्तकालय तक जा सकें।

मेरे इस प्रयास से उन पुस्तकों का कोई भला हो पाया हो या नहीं, लेकिन मुझे यह लाभ जरूर हुआ कि मुझमें कदाचित्‌ एक ऐसी इन्द्री विकसित हो गयी जो किताबों की बातचीत सुन सकती है और उनसे अपनी बात कह भी सकती है। मैने उस पुस्तकालय की सभी किताबों को एक बार पलटवाकर, झाड़-पोंछ कराकर और उनके निवास स्थल की मरम्मत व रंगाई-पुताई कराकर जो पुण्य लाभ अर्जित किया उसी के ब्याज से कदाचित्‌ यह संवाद शक्ति अर्जित हो गयी है। जैसे कोई आयतें उतरकर मेरे जेहन में नमूँदार हो गयी हों। हाल ही में मुझे अपनी इस छठी इन्द्री का अनुभव फिर से हुआ।

उस दिन इस संस्था के सभागार में एक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित था। एक कहानी संग्रह का लोकार्पण और राष्ट्रीय स्तर के हिन्दी साहित्य के एक विद्वान द्वारा कहानी साहित्य पर एक उद्‌बोधन होना था। उस समय एक वक्तव्य राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना हुआ था जिसमें हिन्दी ब्लॉगजगत में कूड़ा प्रकाशित होने की बात कही गयी थी। इस साहित्यिक समागम में इस विषय पर भी कुछ सुनने की उम्मीद थी मुझे। आमन्त्रण पत्र पर छपे समय के हिसाब से मैं दो-चार मिनट पहले ही पहुँच गया था, ताकि सीट मिल जाय और कुछ छूट जाने की आशंका न रहे, लेकिन वहाँ पहुँचने पर बताया गया कि कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर लगेगी, क्योंकि मुख्य अतिथि अभी नहीं पधारे हैं। कुछ अन्य गणमान्यों (VIPs) का भी रास्ते में होना बताया गया।

मैने अन्दर जाकर देखा तो सभागार बिल्कुल सूना था। बैनर, पोस्टर, माइक, स्पीकर, दरी, चादर, कुर्सी, मेज, पानी की बोतल, सरस्वती देवी का फोटो, हार, दीपक, तेल, बाती, मोमबत्ती, दियासलाई, कपूर, माला, बुके, स्मृति चिह्न इत्यादि सामग्रियों को कुछ कर्मचारी यथास्थान जमा रहे थे। आड़ी तिरछी कुर्सियों को सीधा किया जा रहा था लेकिन उन्हें पोछा नहीं जा रहा था। मैने अनुमान किया कि अगले आधे घण्टे में कुछ भी ‘मिस’ नहीं होने वाला है। मैं वहाँ से इत्मीनान से निकलकर पुस्तकालय की दिशा से खुद को बचाता हुआ संस्था के सचिव महोदय के कक्ष में जाकर बैठ गया।

वे फोन पर जमे हुए थे। सामने टेलीफोन नम्बरों की डायरी खुली हुई थी। एक के बाद एक अनेक लोगों का नम्बर मिलाते जा रहे थे और एक ही मज़मून का अनुरोध करते जा रहे थे, “ ...आदरणीय फलाने जी, अभी चल दिए कि नहीं...! सब लोग आ चुके हैं... बस आपकी ही प्रतीक्षा है... जल्दी आ जाइए... आपके आते ही कार्यक्रम शुरू हो जाएगा... हाँ-हाँ, सब लोग हैं, आइए... नमस्कार।”

यह फोनवार्ता इतनी यन्त्रवत्‌ हो रही थी, और विषयवस्तु की इतनी पुनरावृत्ति हो रही थी कि अपनी मुस्कराहट छिपाने के लिए मुझे वहाँ से उठ जाना पड़ा। मैने ठीक सामने वाले कक्ष में कदम बढ़ा दिया, जहाँ इस संस्था द्वारा स्वयं प्रकाशित की गयी पुस्तकों का बिक्री काउण्टर है। इस कक्ष का वातावरण और नक्शा किसी दुकान सरीखा कतई नहीं है। इस कक्ष की चारो दीवारों से सटकर रखे हुए बुकशेल्व्स से एक बड़ा घेरा बनता है जिसके बीच में दो बड़ी-बड़ी मेंजें सटाकर रखी हुई हैं। इनके एक ओर दो कुर्सियाँ लगी थीं जिनमें से एक पर एक वृद्ध व्यक्ति बैठे थे, और कोहनी मेज पर टिकाए कुछ कागजों में खोये हुए थे। मैने अनुमान किया कि ये शायद ‘दरबारी जी’ होंगे जिन्हें सचिव जी ने अभी-अभी ‘हर्षबर्द्धन’ के साथ बुलाया था। मेज पर अनेक नयी ताजी आयी हुई किताबें पड़ी थीं जिनका शायद स्टॉक में अंकन किया जाना था।

चित्रों पर चटकाकर बड़ा कर सकते हैं


मैने चारो ओर एक उचटती सी दृष्टि डा्ली और दरबारी जी के सामने कुर्सी खींच कर बैठ गया।

“लगता है ज्यादा लोग नहीं आएंगे...!” मैने यूँ ही बात छेड़ी।

दरबारी जी शान्त थे। क्या जवाब देते? मौन रहकर सहमति जताना ठीक समझा होगा शायद। ...तभी मुझे कुछ खनकती हुई हँसने की आवाजें सुनायी दीं। मैने चौक कर पीछे देखा। कोई नहीं था। ...फिर पारदर्शी शीशे के पीछे से झाँकती लक-दक चमक बिखेरती हरि चरित्र नामक मोटी पुस्तक की हरकत दिखायी दी।

उसे शायद इस छोटी सी बात में कुछ ज्यादा ही रस मिल गया था। मैंने हैरत से उसकी ओर घूरा। जो बात निराशा पैदा करने वाली थी उसपर ऐसी हँसी? “आखिर बात क्या है...?” मैने उसे पुचकार कर पूछा।

वह एकाएक गम्भीर हो गयी। मैने उसके मन के भाव जानने की कोशिश की तो दार्शनिक अन्दाज में उसने जो बताया उसका सार यह था कि करीब सात सौ पृष्ठों की इस अनूठी पुस्तक की पान्डुलिपि को एक लम्बे समय से सहेजकर रखने वाले डॉ. शिवगोपाल मिश्र के सपनों को पूरा करने के लिए ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ ने इसे प्रकाशित तो कर दिया, लेकिन न तो आज लोकार्पित होने वाले कहानी संग्रह की तरह जन सामान्य तक पहुँचने का उसका भाग्य है, और न ही सरकारी खरीद के माध्यम से देश भर के पुस्तकालयों तक इसके जाने की कोई सम्भावना दिखती है। इसी से बेचारी कुछ विचलित सी हो गयी है।

श्रीमद्‌भागवत के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं का वर्णन हुआ है। संस्कृत में होने के कारण जब जन-सामान्य को इन लीलाओं को समझने में कठिनाई होने लगी, तो उनका भाषानुवाद होना स्वाभाविक था। सर्वप्रथम संवत्‌ १५८७ में रायबरेली (उ.प्र.) निवासी श्री लालचदास ने दशम्‌ स्कन्ध का अवधी में भाषानुवाद “हरि चरित्र’ के नाम से किया। इसकी विशेषता है कि उन्होंने ९० अध्यायों का अपनी बुद्धि के अनुसार दोहा-चौपाई शैली में अनुवाद प्रस्तुत कर दिया था। सन्त कवि तुलसीदास से ४४ वर्ष पूर्व अवधी में हरि-चरित्र की रचना सचमुच एक अनूठा प्रयास है। ‘सम्पूर्ण हरि चरित्र’ का अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ था। अब कई प्राचीन हस्त-लिपियों के आधार पर इसका प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया गया है। लेकिन इसका भविष्य क्या है?

आजकल पुस्तकों की पाठक संख्या का जो हाल है,
और पुस्तक व्यवसाय में लगे व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा जिस प्रकार की एग्रेसिव कैम्पेन चलायी जाती है उसके मुकाबले एक शहर तक सिमटी आधुनिक प्रचार-प्रसार और विपनन के संसाधनों से विहीन सार्वजनिक संस्था के कन्धे पर सवार होकर यह मोटी-तगड़ी पुस्तक कितना रास्ता तय कर पाएगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कदाचित्‌ इसी बोध से एक नैराश्य भाव इसकी खोखली हँसी में उभर आया था, क्योंकि कम श्रोताओं की बात सुनकर इसके ईर्ष्या भाव में जरूर कुछ कमी आयी होगी, और बरबस ये भाव निकल पड़े होंगे। (जारी...)

[अगली कड़ियों में हम कुछ और गोपनीय बातों का खुलासा करेंगे, जो मुझे उन चन्द घन्टों में उनके बीच बैठकर पता चलीं। शर्त यह है कि आप को इन बातों में कुछ रस मिल रहा हो, जिसकी गवाही आपकी टिप्पणियाँ देंगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Monday, August 3, 2009

लोकतन्त्र के भस्मासुर

 

“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं?