हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Friday, June 26, 2009

यहाँ सत्यनारायण की कथा ही नहीं है...!!

 

images22हिन्दू परिवारों में सत्यनारायण की कथा से कौन नहीं परिचित होगा। कुछ गृहस्थ तो प्रत्येक मास की पूर्णिमा को इस कथा का आयोजन करते हैं। पंडित जी सत्यनारायण व्रत कथा की पोथी खोलकर बाँचते हैं और प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर शंख बजाते हैं। कथा के अन्त में यजमान को सबसे पहले प्रसाद मिलता है। उसके बाद सभी उपस्थित भक्तों को पञ्चामृत, मोहनभोग, पंजीरी आदि का प्रसाद वितरित किया जाता है। शहरों में भी आस-पड़ोस में आयोजित होने पर इस कथा में सम्मिलित होने का एक विशिष्ट ‘मेन्यू’ बन चुका है।

लेकिन मेरा अनुमान है कि इस कथा की विषयवस्तु के बारे में बहुत कम लोग रुचि लेकर जानने का प्रयास करते हैं। कथा में सशरीर उपस्थित होकर प्रसाद प्राप्त करने को ही अधिक महत्व दिया जाता है। मनसा उपस्थिति प्रायः शून्य ही होती है। इस कथा का मूल श्रोत भविष्य पुराण है। यह इसके प्रतिसर्ग पर्व के २३वें से २९वें अध्याय में वर्णित है। किन्तु भविष्य पुराण में और भी ढेर बातें हैं जो चमत्कृत करती हैं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित भविष्य पुराण में भगवान सूर्य नारायण की महिमा, उनके स्वरूप, पूजा उपासना विधि का विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसीलिए इसे ‘सौर-पुराण’ या ‘सौर ग्रन्थ’ भी कहा गया है।

इस पुराण में स्त्री-पुरुष के शारीरिक लक्षणों, विभिन्न रत्नों की शुद्धता परखने का तरीका, विविध स्तोत्र, आयुर्वेद से सम्बन्धित अनेक प्रभावशाली औषधीय गुणों से युक्त वनस्पतियों और सर्प विद्या से सम्बन्धित अनेक अद्‌भुत बाते बतायी गयी हैं।

हजारो साल पहले रचे गये इस पुराण में २००० वर्षों का अचूक वर्णन है। इसकी विषय सामग्री देखकर मन बेहद आश्चर्य से भर उठता है। भविष्य की कोंख में छिपे घटना्क्रम और राजाओं, सन्तों, महात्माओं और मनीषियों के बारे में इतना सटीक वर्णन अचम्भित कर देता है। इसमें नन्द वंश एवं मौर्य वंश के साथ-साथ शंकराचार्य, तैमूर, बाबर हुमायूँ, अकबर, औरंगजेब, पृथ्वीराज चौहान तथा छत्रपति शिवाजी के बारे में बताया गया है। सन्‌ १८५७ में इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के भारत की साम्राज्ञी बनने और आंग्ल भाषा के प्रसार से भारतीय भाषा संस्कृत के विलुप्त होने की भविष्यवाणी भी इस ग्रन्थ में की गयी है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस पुराण को इसीलिए भविष्य का दर्पण भी कहा गया है।

Image017प्रारम्भ में इस पुराण में पचास हजार (५००००) श्लोक विद्यमान थे लेकिन श्रव्य परम्परा पर निर्भरता और अभिलेख के रूप में उचित संरक्षण न मिल पाने के कारण वर्तमान में केवल अठ्ठाइस हजार (२८०००) श्लोक ही उपलब्ध रह गये हैं। स्पष्ट है कि अभी भी विद्वान उन अद्‍भुत एवं विलक्षण घटनाओं और ज्ञान से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं जो इस पुराण के विलुप्त आधे भाग में वर्णित रही होंगी। सौभाग्य से अब गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा ऐसे अनेक वैदिक व पौराणिक ग्रन्थों का संचयन, संरक्षण, परिमार्जन और प्रकाशन किया जाता है जो इस धर्मप्राण देश की अमूल्य थाती हैं। मूल संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में अनुवाद और टीकाएं प्रकाशित करने का यह अनुष्ठान प्रणम्य है।

इस वृहद ग्रन्थ की सम्पूर्ण सामग्री का उल्लेख तो यहाँ सम्भव नहीं है लेकिन मैं यहाँ चार पर्वों में विभाजित इस पुराण से कुछ ऐसी लोकप्रिय और जनश्रुत कहानियों और पौराणिक पात्रों तथा व्यक्तियों का नामोल्लेख करना चाहूँगा जिनके बारे में हम अपनी सामान्य बोलचाल में, रीति-रिवाजों के अनुपालन मे, अपने पारिवारिक व सामाजिक दिनचर्या में या साहित्य के अध्ययन की बौद्धिक परम्परा में प्रायः सुनते रहते हैं:

 

१.ब्राह्म पर्व:

गर्भाधान से लेकर यज्ञोपवीत तक के संस्कार, भोजन विधि, ओंकार एवं गायत्री मन्त्र के जप का महत्व, अभिवादन विधि, विवाह योग्य युवक-युवतियों के शुभाशुभ लक्षण, विवाह के आठ प्रकार, पतिव्रता स्त्रियों, पुरुषों तथा राजपुरुषों के शुभाशुभ लक्षण, चतुर्थी व्रत, नागपंचमी व्रत, सर्पदंश से पीड़ित मनुष्यों के लक्षण, सर्पों के विष के वेग, शरीर में विष के पहुँचने, उसके प्रभाव तथा सर्पदंश की चिकित्सा विधि, षष्ठी व्रत (छठ- बिहार वाली), भगवान सूर्यदेव के माहात्म्य से जुड़ी अद्‌भुत और विलक्षण कथाएं,

२.मध्यम पर्व:

सृष्टि एवं विभिन्न लोकों की उत्पत्ति व स्थिति का वर्णन, गृहस्थ आश्रम की महिमा, माता, पिता व गुरू की महत्ता, विभिन्न वृक्षों को लगाने से प्राप्त होने वाले फल, वृक्षारोपण का उचित समय व इसका महत्व, हानिकारक वृक्ष, यज्ञ-हवन की विधियाँ, विभिन्न पक्षियों के दर्शन से प्राप्त होने वाले लाभ; चन्द्रमास, सौरमास, नक्षत्रमास, एवं श्रावण मास का माहात्म्य; ‘मल मास’ में शुभ कार्यों की वर्जना; उद्यानों, जलाशयों, गोचर भूमियों, अश्वत्थ, पुष्करिणी, तुलसि तथा मण्डप आदि की प्रतिष्ठा की महत्वपूर्ण शास्त्रोक्त (वैज्ञानिक) विधियाँ आदि।

३.प्रतिसर्ग पर्व:

ऐतिहासिक व आधुनिक घटनाओं का सुन्दर मिश्रण। ईसा मसीह का जन्म, उनकी भारत-यात्रा, मुहम्मद साहब का आविर्भाव, महारानी विक्टोरिया का राज्यारोहण, तक का वर्णन।

सतयुग, त्रेता (सूर्यवंश व चंद्रवंश), द्वापर और कलियुग के राजा तथा उनकी भाषाएं, ‘नूह’ की प्रलय गाथा, मगध के राजा नन्द, बौद्ध राजा, चौहान व परमार वंश, राजा विक्रम और वेताल की शिक्षाप्रद कहानियाँ- ‘वैताल-पचीसी’, रूपसेन एवं वीरवर, हरिस्वामी, राजा धर्मबल्लभ एवं मन्त्री सत्यप्रकाश, जीमूतवाहन एवं शंखचूड़, गुणाकर, चार मूर्ख,एवं मझले भाई की रोचक व शिक्षाप्रद कथाएं। श्री सत्यनारायण व्रतकथा का पूजन विधि सहित विस्तृत वर्णन जिसमें शतानन्द ब्राह्मण, राजा चन्द्रचूड़, लकड़हारे, साधु वणिक व उसके जामाता की कथा वर्णित है।

देवी दुर्गा की सप्तशती मे वर्णित उनके तीन चरित्र, कात्यायन एवं मगधराज महानन्द, देवी सरस्वती की कृपा से महर्षि पतंजलि द्वारा कात्यायन को शास्त्रार्थ में पराजित करने की कथा। भारत के लगभग १०००ई. के बाद का इतिहास। ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, शंकराचार्य, कृष्णचैतन्य, पृथ्वीराज चौहान, अकबर, जयचन्द, तैमूरलंग, रामानुज, कुतुबुद्दीन ऐबक आदि का वर्णन।

इस पर्व में शंकराचार्य को भगवान शिव का व रामानुजाचार्य को भगवान्‌ विष्णु का अंशावतार बताया गया है तथा काशी में उनके बीच हुए रोचक शास्त्रार्थ का वर्णन किया गया है।

४.उत्तर पर्व:

भुवनकोश, भगवान्‌ विष्णु की माया से देवर्षि नारद के मोहित होने का आख्यान व चित्रलेखा का चरित्र। तिलक व्रत, अशोक व्रत, करवीर व्रत (कनेर के वृक्ष की पूजा), परम गोपनीय और अत्यन्त फलदायी कोकिला व्रत (इस व्रत के प्रभाव से पति-पत्नी के मध्य प्रेम प्रगाढ़ होता है।), अनेक सौभाग्यशाली (रमा, मधूक, ललिता, अवियोग, रम्या, हरकाली, आदि) तृतीया व्रत, शनि ग्रह की पीड़ा से निवारण के लिए शनि व्रत के माहात्म्य सम्बन्धी पिप्पलाद की कथा।

मैने इस अनमोल पुस्तक से कोई एक कथा संक्षेप में प्रस्तुत करने का मन बनाया था लेकिन इसमें छिपे खजाने के बारे में बताने का लोभसंवरण नहीं कर सका। अब मैं आपकी प्रतिक्रियाओं और फ़रमाइशों की प्रतीक्षा करूंगा। जनता की मांग के अनुसार ऊपर गिनाये गये विषयों में से कुछ अंश सत्यार्थमित्र पर प्रस्तुत करने की कोशिश करूंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Monday, June 22, 2009

सच्चाई की परख सबमें है... पर करते क्यों नहीं?

 

यह दुनिया भी ग़जब निराली है। इसमें रहने वाले लोग अपनी सामाजिक प्रास्थिति में अपने व्यवहार को किसी न किसी आचार संहिता से निर्देशित करते हैं। सबका अपना वैल्यू सिस्टम है जो व्यक्ति के अनुवांशिक लक्षण, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा के स्तर, सामाजिक स्वरूप और इतिहास बोध से निर्धारित होता है। लेकिन ऐसा देखने में आया है कि प्रायः सबने इस आचरण नियमावली के दो संस्करण बना रखे हैं। एक अपने लिए और दूसरा दूसरों के लिए। एक ही सिचुएशन में जैसा व्यवहार वे स्वयं करते हैं वहीं दूसरों से बिल्कुल भिन्न व्यवहार की अपेक्षा करते हैं।

imageकुछ ऐसा व्यवहार इन बातों में झलकता है, “मेरे घर आओगे तो क्या लाओगे?”“मैं तुम्हारे घर आऊंगा तो क्या दोगे?”

हमें अपने आस-पास ऐसे लोग सहज ही मिल जाएंगे जो किसी भी मुद्दे पर अपनी सिनिकल राय रखने से बाज नहीं आते। मुहल्ले का कोई लड़का परीक्षा में फेल हो गया तो तुरन्त उसकी ‘आवारगी’ के किस्से सुना डालेंगे, किसी लड़की को बाइक चलाते या ब्वॉयफ्रेण्ड के साथ देख लिए तो उसकी बदचलनी का आँखों देखा हाल बयान कर देंगे। इतना ही नहीं, यदि किसी ने यूनिवर्सिटी भी टॉप कर लिया तो कहेंगे प्रोफ़ेसर से अच्छी सेटिंग हुई होगी। लोक सेवा आयोग से चयनित भी हो गया तो इण्टरव्यू में जुगाड़ और घूसखोरी तक की रिपोर्ट पेश कर देंगे।

लेकिन यही सब यदि उनके परिवार के बच्चों ने किया हो तो फेल होने का कारण ऐन वक्त पर तबियत खराब होना या ‘हार्ड-लक’ ही होगा, लड़का फिर भी बड़ा मेहनती और जहीन ही कहा जाएगा, लड़की पढ़ी-लिखी, आधुनिक और प्रगतिशील कही जाएगी, टॉपर लड़के की उत्कृष्ट छवि तो लोगों को बुला-बुलाकर बतायी ही जाएगी, कमीशन भी उच्च आदर्शों का प्रतिरूप हो जाएगा जहाँ प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों को पहचानने की अद्‌भुत प्रणाली विकसित हो गयी हो।

image मनुष्य की इस दोरुखी प्रवृत्ति का कारण समझने की कोशिश करता हूँ तो सिर्फ़ इतना जान पाता हूँ कि यथार्थ और आदर्श का अन्तर अत्यन्त स्वाभाविक है और इसे बदला नहीं जा सकता। अच्छी मूल्यपरक नैतिक शिक्षा और सत्‍संगति से इस अन्तर में थोड़ी कमी लाई जा सकती है।

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि किसी कार्य की सफलता या असफलता के पीछे जो वाह्य और आन्तरिक कारक होते हैं उनकी व्याख्या व्यक्ति अपनी सुविधानुसार ही करता है। अपनी सफलता का श्रेय वह अपने आन्तरिक कारकों को देता है और असफलता का ठीकरा वाह्य कारकों पर फोड़ता है। लेकिन दूसरे व्यक्ति की समीक्षा के समय यह पैमाना उलट जाता है; अर्थात्‌ दूसरों की सफलता उनके वाह्य कारकों की वजह से और असफलता उनके आन्तरिक कारणों से मिलती हुई बतायी जाती है। इस मनोवृत्ति का सटीक उदाहरण समाचार चैनेलों के स्टूडियो में चुनाव परिणामों पर पार्टी नेताओं की बहस सुनते समय मिलती है।

लेकिन यह मनोवृत्ति चाहे जितनी स्वाभाविक और प्राकृतिक हो, इसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। यह सोच एक शिष्ट और सभ्य समाज के सदस्य के रूप में हमें सच्चा नहीं बनाती। यह सत्यनिष्ठा और शुचिता के विपरीत आचरण ही माना जाएगा। जिनका मन सच्चा और आत्मा पवित्र होगी वे ऐसी विचित्र सोच को अपने विचार और व्यवहार में स्थान नहीं देंगे। हमारे वैदिक ऋषि, सन्त महात्मा, और सार्वकालिक महापुरुष इसीलिए महान कहलाए क्योंकि उन्होंने अपने व्यवहार में इस प्रवृत्ति को पनपने नहीं दिया। उन्होंने केवल उसी एक आचार संहिता का पालन किया जिसकी अपेक्षा उन्होंने दूसरों से भी की। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं किया।

अस्तु, हमें सोचना चाहिए कि अपने व्यवहार को सच्चाई के करीब रखने के लिए और अपने विचार में शुचिता लाने के लिए हमें दुनिया के प्रति क्या धारणा बनानी चाहिए। अपनी सामाजिक भूमिका के लिए क्या पॉलिसी बनानी चाहिए।

केन्ट एम. कीथ ने इसकी जाँच के लिए एक दिग्दर्शक यन्त्र बनाया है। मेरा मानना है कि यदि उनके जाँच यन्त्र से हम जितना ही तादात्म्य बिठा सकें हम सच्चाई और सत्यनिष्ठा के उतने ही नजदीक पहुँचते जाएंगे। आइए देखें क्या है यह परीक्षण:

INTEGRITY TEST:

  • लोगों को मदद की जरूरत होती तो है लेकिन यदि आप मदद करने जाय तो वे आपके प्रति बुरा बर्ताव कर सकते हैं। फिर भी आप मदद करते रहें।
  • यदि आप किसी की भलाई करने जाते हैं तो लोग इसमें आपकी स्वार्थपरता का आरोप लगा सकते हैं। फिर भी आप भलाई करते रहें।
  • आप आज जो नेक काम कर रहे हैं वह कल भुला दिया जाएगा। फिर भी आप नेकी करते रहें।
  • यदि आप सफलता अर्जित करते हैं तो आपको नकली दोस्त और असली दुश्मन मिलते रहेंगे। फिर भी सफलता प्राप्त करते रहें।
  • ईमानदारी और स्पष्टवादिता आपको संकट में डाल देती है। फिर भी आप ईमानदार और स्पष्टवादी बने रहें।
  • आप यदि दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित कर दें तो भी आपको घोर निराशा  हाथ लग सकती है। फिर भी अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करते रहें।

इस जाँच यन्त्र का मूल अंग्रेजी पाठ यदि पढ़ना चाहें तो यहाँ मिल जाएगा।

मुझे लगता है कि हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए यह बताने वाली एक आवाज हमारे भीतर ही उठती रहती है। लेकिन पता नहीं क्यों हम इस आवाज को अनसुना करते रहते है। प्रकृति ने हमें सच्चाई की परख करने के लिए एक आन्तरिक दृ्ष्टि दे रखी है लेकिन हम इस दृष्टि का प्रयोग नहीं कर पाते। काम, क्रोध, मद और लोभ हमारे व्यवहार को दिशा देने में अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। ये चारो हमारे विवेक को भ्रष्ट कर देते हैं।

अरे, यह पोस्ट तो घँणी उपदेशात्मक होती जा रही है। अब पटाक्षेप करता हूँ। यहाँ तक पढ़ने वालों का धन्यवाद।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Friday, June 19, 2009

क्या लिखूँ...? बताइए न...!

 

ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। ...चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

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गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। ...एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों...। :)

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ...! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न...! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)