Thursday, April 30, 2009

सालगिरह से निकली नयी राह...

 

ये रही एक माइक्रो-पोस्ट

टूटी-फूटी से हुआ, सपना इक साकार।

भेंट चढ़ा ब्लॉगरी के पूरा इक परिवार॥

आप सबकी शुभकामनाओं की सख़्त जरूरत है।

पुछल्ला:

डॉ. अरविन्द मिश्रा ने आज हमारी जोड़ी की तस्वीर तलाश किया जो थी ही नहीं। नहीं मिली तो किसी जोड़ा-जामा टाइप फोटू की फरमाइश भी कर दिए। हम ठहरे तकनीक से पैदल, सो शादी वाली फोटू यहाँ चेंप न सके। लेकिन एकदम ताजी फोटू भतीजे से खिंचवा ली है। आप भी देखिए :)

परिणय दशाब्दि  (2) (सिद्धार्थ)

Saturday, April 25, 2009

पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों...!

 

चुनावी ड्यूटी से फारिग़ होने के बाद अगले दिन कार्यालय में काम कुछ हल्का ही था। एक सीनियर अफ़सर मेरे कमरे में आये तो मैंने उनका खड़ा होकर स्वागत किया। मेरे अन्दाज में कुछ अतिरिक्त गर्मजोशी अनायास ही आ गयी थी क्यों कि वे शायराना तबीयत के मालिक हैं। ग़ज़लें और नज्में लिखते हैं। ‘क्लीन शेव’ मुसलमान हैं। उनकी बातों से दकियानूसी या कट्टर ख़्याल की बू कभी नहीं आयी थी। अच्छी तालीम हासिल किए होंगे तभी अधिकारी बने हैं। मेरे मन में उनके प्रति यही भाव बने हुए थे।

मैने उनसे उर्दू अदब और ग़ज़लकारी की कुछ चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनकी चार-पाँच किताबें उर्दू एकेडेमी से छप चुकी हैं। फै़ज़ अहमद फैज़ ने उनकी पीठ ठोकी है। फिराक़ साहब ने भी प्रशंसा में सिर हिलाया है...। मैने शिकायत की कि आपने हिन्दी (देवनागरी) में प्रकाशन क्यों नहीं कराया तो बोले प्रकाशक नहीं मिला। मैंने अफ़सोस जताया।

मैने उनसे ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई आदि के बारे में कुछ जानना चाहा। अनाड़ी जो ठहरा। वे कुछ उदाहरण देकर मुझे समझा रहे थे। मेरे जैसा चेला पाकर वे उत्साहित भी लग रहे थे। तभी एक गजब हो गया...

उन्होंने कहा कि ये चार लाइनें सुनो...। यह गवर्नमेण्ट की पॉलिसी के खिलाफ़ है इसलिए मैने इसे कहीं साया (प्रकाशित) नहीं कराया है। लेकिन यह एक वजनदार बात है। उम्मीद है तुम्हें पसन्द आएगी।

उनकी ये चार लाइनें सुनने के बाद मैने सिर पकड़ लिया। मन में बेचैनी होने लगी कि नाहक इन्हें उस्ताद बनाने को सोच रहा था। कोफ़्त इतनी बढ़ गयी कि वार्ता बन्द करके उठ गया... इतना निकल ही गया कि सर! यह तो पब्लिक पॉलिसी और नेशनल पॉलिसी के भी खिलाफ़ है...।

अच्छा हुआ ये कहीं प्रकाशित नहीं हुआ। लेकिन उनके मन की खिड़की में झाँककर जो देख लिया उससे आपको परिचित जरूर कराना चाहूंगा। पता नहीं यह नैतिक है या नहीं लेकिन जिस सोच से मैं परिचित हुआ  वो चिन्तित करने वाली जरूर है...

उन्होंने फ़रमाया...

तामीरे तनो-जान न रोको लोगों

ये नस्ले परीशान न रोको लोगों

शायद कोई इन्सान निकल ही आये

पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों

(तामीरे तनो जान= शरीर और प्राण का निर्माण)

अचानक हुए इस मानसिक आघात्‌ से मैं हतप्रभ होकर अपने बॉस के कमरे में चला गया। वो बहुत व्यस्त थे। अपनी पीड़ा बताने के अवसर की प्रतीक्षा में मैने सामने पड़े कागज के टुकड़े पर ये चार लाइनें भी लिख डाली...

हो रहा मुल्ला परेशान न रोको लोगों

देश बन जाये पाकिस्तान न रोको लोगों

दिवाला निकले देश का कि मुसीबत आये

निकल जो आये तालिबान न रोको लोगों

 

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या यह हकीकत चोट पहुँचाने वाली नहीं है? आप इसमें कुछ जोड़ना चाहेंगे क्या?

(सिद्धार्थ)

Thursday, April 16, 2009

मिलिए एक साहसी प्रत्याशी से...!

 

शशि पाण्डेय चुनावी ड्यूटी के रूप में आजकल कोषागार के सभी अधिकारी प्रत्याशियों के चुनावी खर्चे का हिसाब लेने में व्यस्त हैं। व्यय रजिस्टर का सूक्ष्म परीक्षण करने के लिए निर्वाचन आयोग ने कड़े दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं। बुधवार को मैं भी इसी कार्य में व्यस्त था। तभी मेरे बॉस का बुलावा आ गया। मैं उनके कार्यालय कक्ष में दाखिल हुआ तो वहाँ का नजारा देखकर दंग रह गया।

एक पढ़ी लिखी सम्भ्रान्त सी दिखने वाली युवती अपने हाथ में कागजों का पुलिन्दा लिए बदहवास सी रोए जा रही थी। गोरे चिट्टे स्निग्ध चेहरे का रंग सुर्ख लाल हो गया था और आँखों से अश्रु धारा बहती जा रही थी। लगातार बोलते रहने से आवाज बैठ गयी थी। क्रोध और असहायता का मिश्रित भाव समेटे उसकी आँखों में भी लाल डोरे उभर आए थे। भर्राती आवाज गला सूखने का संकेत दे रही थी। वहा बैठे दूसरे लोग इस मोहतरमा को चुप कराने की सूरत नहीं निकाल पा रहे थे।  एक तूफान सा उमड़ पड़ा था जो थमने का नाम नहीं ले रहा था।

कुछ क्षण के लिए मैं भी विस्मय से निहारता रहा। फिर मैने महिला गार्ड से ठण्डा पानी लाने को कहा और उन्हें शान्त होकर अपनी बात नये सिरे से धीरे-धीरे कहने का अनुरोध करने लगा। वो अकस्मात्‌ फिर से शुरू हो गयीं तब मैने उनकी बात सुनने से पहले ठण्डा पानी पीने और आँसू पोंछकर बिलकुल नॉर्मल हो जाने की शर्त रख दी।

जब आँधी और बूँदा बाँदी थम गयी तब मुझे पता चला कि ये एक निर्दल प्रत्याशी हैं जो इलाहाबाद से सांसद बनकर देश की सेवा करने का सपना पूरा करना चाहती हैं। एक सपना जो इन्होंने अपने बचपन में ही देखा था और जिसे पूरा करने के लिए अन्य बातों के अलावा अविवाहित रहने का फैसला भी कर लिया था।

फिलहाल जिस समस्या से ये हलकान हुई जा रही थीं वो ये थी कि इनके द्वारा प्रस्तुत खर्च का व्यौरा जाँच अधिकारी ने अस्वीकृत कर दिया था। इस बात का आसन्न खतरा मडराता देखकर इनके होश उड़ गये थे कि शायद इनकी उम्मीदवारी खतरे में न पड़ जाय।

सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर चुकी कु. शशि पांडेय करीब डेढ़ साल पहले अपने पुराने शहर वापस आयी जहाँ २३ वर्ष पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। भारत की संसद में लोकसभा के लिए चुने जाने का सपना इनके दिल और दिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि बड़ी से बड़ी बाधा की चट्टान इनके फौलादी इरादों को रोक नहीं सकती।

सम्पन्न माँ बाप की इकलौती दुलारी बेटी ने अपने लिए जो रास्ता चुना है उसपर चलते हुए इन्होंने दिल्ली की पॉश कॉलोनी की आभिजात्य जीवन शैली का त्याग कर इलाहाबाद की मेजा, माण्डा, करछना तहसीलों के धूल भरे दुर्गम और अन्जान रास्तों पर निकल कर देहात में पसरी बदहाल गरीबी, भुखमरी और लाचारी के बीच उम्मीद की किरण फैलाने का फैसला किया है। कॉन्वेन्ट शिक्षा की विशुद्ध अंग्रेजी जुबान छोड़कर ग्रामीण परिवेश की स्थानीय अवधी/भोजपुरी बोली में संवाद कायम करने की चेष्टा बार-बार मुखरित हो जाती है। 

सुश्री शशि पाण्डे- सांसद प्रत्याशी इलाहाबाद

Name: Km. Shashi Pandey

D/O: shri Vishwanath Pandey

Date of Birth: 13 June, 1963

Marital Status: Unmarried

Residence:  Pitam Nagar, Allahabad

 

Education & Qualifications:

Graduation: BA with  Eng.Literature, History, Political Science-1984 (University of Allahabad)

Post Graduation: MA in Political Science-1986 (AU).

LT : KP Training College, Allahabad-1988.

EDP: Entrepreneur Development Programme- FICC Tanasen Marg- 1994

LLB: Delhi University- Law Centre-2nd.(2001)

Diploma in Human Rights Law (2002): Indian Law Institute(Deemed University)

Family Background: Armed Forces Officers’ Family.

-Represented Delhi University in March 2000 for 1st PN Bhagawati Moot Court Competion in Benglore, Adjudged- “runner up”.

-Member: “Hum Aapke” - a registered NGO for Legal assistance to those who work in public interest. PIL on Ajmer Shariff to root out corruption rampant in Dargah Shariff, Ajmer.

“ I fought for the cause and rights of poor, indigent and sick which was deer to Khwaja Sahib”

“Pain of masses is my own pain. It pains me to watch them without water, electricity, sanitation, cleanliness, road and other basic amenities of life.”

किसी पार्टी का समर्थन प्राप्त किए बिना, समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम गठित किए बिना, और चुनावी अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार किए बिना ही संसद की मंजिल तक पहुँचने की राह दुश्‍वार नहीं लगती? इस प्रश्‍न का उत्तर कु.शशि बड़े आत्मविश्वास से देती हैं। अपने पहले प्रयास में मेरी कोशिश है कि मैं ग्रामीण जनता से व्यक्तिगत रूप से मिलूँ और उन्हें विश्वास दिलाऊँ कि राजनीति में स्वच्छ और ईमानदार छवि के लोग भी आगे कदम बढ़ाने को इच्छुक हैं।  गाँव के बड़े-बुजुर्गों और महिलाओं ने जिस हर्षित भाव से मेरे सिर पर हाथ रखा है उसे देखकर मुझे बहुत खुशी मिल रही है।

गाँव-गाँव में घूमकर लोगों से अपने लिए वोट जुटाने में लगी शशि को रास्ता बताने वाले भी क्षेत्र से ही खोजने पड़ते हैं। अपनी सुरक्षा के लिए भी इन्होंने जिलाधिकारी से गनर नहीं मांगे। एक मात्र ड्राइवर के साथ सुबह का ‘ब्रन्च’ लेकर जब ये अपनी निजी इण्डिका में निकलती हैं तो पता नहीं होता कि आज किससे मिलना है। जिधर ही दस-बीस लोग दिख जाते हैं वहीं गाड़ी से उतरकर अपना परिचय देती हैं , अपनी योजनाओं को समझाती हैं, आशीर्वाद मांगती हैं, और वहीं से कोई आदमी गाड़ी में बैठकर अगले पड़ाव तक पहुँचा देता है। रात ढल जाने पर किसी देहाती बाजार, छोटे कस्बे या तहसील मुख्यालय में ही धूल, मिट्टी, मच्छर और गर्मी के बीच बिना बिजली के रात बिताने के चिह्न आसानी से चेहरे पर देखे जा सकते हैं। प्रत्येक तीसरे दिन चुनावी खर्चे का एकाउण्ट दिखाना अनिवार्य है इसलिए शहर आकर समय खराब करना पड़ता है।

इतने मजबूत और नेक इरादों वाली लड़की यदि छोटी सी बात पर रोती हुई पायी जाती है तो इसका क्या अर्थ क्या समझा जाय? एक नेता यदि इतना अधीर हो जाएगा तो कठिन परिस्थियों में कैसे नेतृत्व देगा? इस सवाल पर शशि झेंप जाती है लेकिन झटसे सच्चाई का खुलासा करती है। दर‍असल मुझे लगा कि मेरी एक चूक से मेरा सारा सपना यहीं चकनाचूर हुआ जा रहा है। मैं नियम कानून का अक्षरशः पालन करने में विश्वास करती हूँ। कोई गलत काम करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। कानून का पेशा है मेरा। फिर भी यदि एक कानूनी चूक से मुझे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है तो यह मेरे लिए सबसे बुरा होगा। इसी घबराहट में मेरा धैर्य जवाब दे गया था।



शशि से लम्बी बात-चीत मैने अपने मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड की है। इसे दो-तीन बार सुन चुका हूँ। सुनने के बाद मेरा मन बार-बार यही पूछ रहा है कि इस युग में क्या ईमानदारी भी मनुष्य को कमजोर बना देती है?

Sunday, April 12, 2009

चुनावी कुण्डलियाँ... वाह नेता जी!

 

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आजकल चुनावी सरगर्मी में कोई दूसरा विषय अपनी ओर ध्यान नहीं खींच पा रहा है। दिनभर दफ़्तर से लेकर घर तक और अखबार-टीवी से लेकर इण्टरनेट तक बस चुनावी तमाशे की ही चर्चा है। सरकारी महकमें तो बुरी तरह चुनावगामी हो गये हैं।

ऐसे में मेरा मन भी चुनावी कविता में हाथ आजमाने का लोभ संवरण नहीं कर सका। तो लीजिए पेश हैं:

चुनावी कुण्डलियाँ

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वामपन्थ की रार से अलग पड़ गया ‘हाथ’।
सत्ता की खिचड़ी पकी, अमर मुलायम साथ॥

अमर मुलायम साथ चले कुछ मास निभाए।
बजा चुनावी बिगुल, छिटक कर बाहर आए॥

यू.पी. और बिहार में, नहीं ‘हाथ’ का काम।
तीन-चार मोर्चे बने, ढुल-मुल दक्षिण-वाम॥

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अडवाणी की मांग पर, मनमोहन हैं मौन।
सत्ताधारी पीठ का,     असली  नेता कौन॥

असली नेता कौन समझ में अभी न आया।
अडवानी,  पसवान,  मुलायम,  लालू,  माया॥

लोकतंत्र का मन्त्र,  जप रही बर्बर वाणी।
‘पी.एम. इन वेटिंग’ ही  बन बैठे अडवाणी॥

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नेता पहुँचे क्षेत्र में, भाग-भाग हलकान।
वोटर से विनती करें, हमें चुने श्रीमान्‌॥

हमें चुनें श्रीमान्,    करूँ वोटर की पूजा।
मैं बस एक महान, नहीं है काबिल दूजा॥

मचा   चुनावी शोर,  घोर घबराहट देता।‌
पाँच वर्ष के बाद    लौटकर आया नेता॥

आप चुनाव का भरपूर आनन्द लीजिए। लेकिन एक विनती है कि मतदान के दिन धूप, गर्मी, और शारीरिक कष्ट की परवाह किए बिना अपना वोट ई.वी.एम. मशीन में लॉक कराने जरूर जाइए। यदि हम इस महत्व पूर्ण अवसर पर अपने मताधिकार का सकारात्मक प्रयोग नहीं करते हैं तो राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेने का हमें कोई हक नहीं है।

(सिद्धार्थ)