हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, February 24, 2009

त्रिवेणी महोत्सव सम्पन्न... अब ब्लॉगरी

Image065 पिछला पूरा सप्ताह ब्लॉगरी से जुदा होकर त्रिवेणी महोत्सव की धूम में खो जाने वाला रहा। रात में दो-ढाई  से चार बजे तक रंगारग कार्यक्रमों का आनन्द उठाने के बाद घर लौटता, सुबह यथासम्भव जल्दी उठकर बैडमिण्टन कोर्ट जाता, लौटकर नहा-धो तैयार होकर ऑफिस जाता, दिनभर ऊँघते हुए काम निपटाना और शाम होते ही फिर यमुना तट पर सजी महफिल में शामिल हो जाता।

शुरुआत गंगापूजन के बाद जोरदार आतिशबाजी से हुई। फिर जसवीर जस्सी ने पंजाबी पॉप की मस्ती लुटायी। ‘दिल लै गयी कुड़ी गुजरात की’ पर दर्शक झूम उठे।

डोना गांगुली का ओडिसी बैले, राजा हसन और सुमेधा की जोड़ी का फिल्मी गायन और भोर में साढ़े तीन बजे तक चलने वाला मुशायरा दूसरे दिन दर्शकों को बाँधे रखा।

तीसरे दिन भरतनाट्यम शैली में ‘रणचण्डी रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा’ नृत्यनाटिका देखने के बाद दर्शकों ने सोनू निगम की ‘विजुरिया’  पर दिल खोलकर डान्स किया। दो घण्टे की अद्‌भुत प्रस्तुति में सोनू ने अपनी प्रतिभा से सबको चमत्कृत कर दिया।

चौथे दिन इलाहाबाद के स्कूली बच्चों के नाम रहा। स्थानीय बाल कलाकारों ने अपनी कला से मन को मोह लिया। बॉलीवुड की स्पष्ट छाप इन नन्हें कलाकारों पर देखी जा सकती थी।

अलपवयस्का रीम्पा शिवा ने तबलावादन में जो महारत हासिल कर ली है उसे देख-सुन कर सबने दाँतों तले अंगुली दबा ली। पाचवें दिन ही कॉमेडी सर्कस के चैम्पियन वी.आई.पी. (विजय) ने अपने गले से जो इक्यावन फिल्मी अभिनेताओं और राजनेताओं की आवाज निकाली वह अद्वितीय रही। के.शैलेन्द्र ने किशोर कुमार के गीत हूबहू नकल करके सुनाये और काफी तालियाँ बटोरी।

छठे दिन हर्षदीप कौर ने फिल्मी गीतों पर दर्शकों को खूब नचाया। उसके बाद विराट कवि सम्मेलन सुबह चार बजे तक चला। सुनील जोगी, विष्णु सक्सेना, सरदार मन्जीत सिंह, विनीत चौहान और वेदव्रत वाजपेयी आदि जैसे पन्द्रह कवि खूब सराहे गये।

सातवें और आखिरी दिन सुरमयी शाम की शुरुआत भजन संध्या और शाम-ए-ग़ज़ल को मिलाकर सजायी गयी। सुशील बावेजा, प्रीति प्रेरणा और इनके साथ पं. अशोक पाण्डे के तबले से निकली रामधुन पर दर्शक झूम उठे। इसके बाद के अन्तिम कार्यक्रम ने सर्वाधिक भीड़ बटोरी। विशाल और शेखर की हिट संगीतकार जोड़ी  जब अपने साजिन्दों के साथ स्टेज पर उतरी तो दर्शकों में जोश का जैसे तूफान उमड़ पड़ा। छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े तक लगातार तालियाँ बजाते और थिरकते रहे। कुर्सियों के ऊपर खड़े होकर नाचते गाते युवा दर्शक कार्यक्रम का हिस्सा बन गये।

इस साल का त्रिवेणी महोत्सव हमारे मानस पटल पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ गया।

इस बीच ब्लॉगजगत में काफी कुछ बह गया। वैलेण्टाइन डे के आसपास गुलाबी चढ्ढियाँ छायी रहीं। सुरेश चिपलूकर जी और शास्त्री जी ने इस अभियान पर प्रश्नचिह्न खड़े किए तो बात बढ़ते-बढ़ते कहाँ की कहाँ पहुँच गयी। बहुत सी पोस्टें आयीं। मैने जहाँ तक देखा किसी भी पोस्ट में प्रमोद मुथालिक द्वारा मंगलौर में किए जाने वाले हिंसक कुकृत्य का समर्थन नहीं किया गया। और न ही किसी ब्लॉगर ने शराब खाने में जाकर जश्न मनाने को महिमा मण्डित किया। दोनो बातें गलत थीं और दोनो का समर्थन नहीं हुआ। इसके बावजूद पोस्टों की विषय-वस्तु पर गुत्थम-गुत्थी होती रही। केवल बात कहने के ढंग पर एतराज दर्ज होते रहे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मर्यादा, वर्जना, नैतिकता, संयम, समानता, आदि कि कसौटी पर ‘स्त्री-विमर्श’ होता रहा।

जो चुप रहे उन्हें भी इस पक्ष या उस पक्ष के साथ जोड़ने का प्रयास हुआ। मुझे लगता है कि इस सहज सुलभ माध्यम की प्रकृति ही ऐसी है कि भीतर से कमोवेश एकमत होते हुए भी हमें अनर्गल विवाद की ओर बढ़ जाने का खतरा बना रहता है। कदाचित टीवी चैनेलों की तरह यहाँ भी टी.आर.पी.मेनिया अपने पाँव पसार रहा है। इसीलिए एक-दूसरे पर शंका पर आधारित आरोप-प्रत्यारोप लगते रहते हैं। फिर सफाई देने-लेने का व्यापार चलता रहता है।

क्या ऐसा करके हम ‘बन्दर के हाथ में उस्तरा’ थमाने वाली उक्ति चरितार्थ नहीं कर रहे हैं...?

अन्त में..

विष्णु सक्सेना ने कवि सम्मेलन में अपना सबसे प्रसिद्ध गीत भी सुनाया। यूँ तो उनकी आवाज में सुनने का अलग ही मजा है लेकिन इसके बोल भी बहुत प्यारे हैं। देखिए...

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा
एक आयी लहर कुछ बचेगा नहीं...
तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया
पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं...

मैं तो पतझड़ था फिर क्यूँ निमन्त्रण दिया
ऋतु वसन्ती को तन पर लपेटे हुए
आस मन में लिए प्यास मन में लिए
कब शरद आयी पल्लू लपेटे हुए
तुमने फेरी निगाहें अन्धेरा हुआ
ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं...

मैं तो होली बना लूँगा सच मान लो
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो
मैं तुम्हें सौंप दूंगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पंखों को आकाश दो
उंगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम
यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं...

आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी दिखी
बन्द की आँख तो राधिका सी लगी
जब भी सोचा तुम्हें शान्त एकान्त में
मीराबाई सी एक साधिका तुम लगी
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो
मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं...

विष्णु सक्सेना

Friday, February 13, 2009

रागिनी जी की एक और कहानी... कर्ज़

 

पिछले दिनों आपने इन पन्नों पर श्रीमती रागिनी शुक्ला की लिखी सत्यकथा दुलारी पढ़ा और सराहा था। आज प्रस्तुत है उनकी एक और कहानी- कर्ज। पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार के गरीब मजदूर वर्ग की त्रासदी का बयान करती यह कहानी परिवार और समाज के भीतर सूक्ष्म मानवीय रिश्तों का मार्मिक चित्रण करती है:

कर्ज

रात ढल रही थी चाँद भी अपना सफर पूर्ण कर आराम की तैयारी में लगा था, आकाश में तारे एक-एक कर अपनें घर जाने लगे थे, उस रात कि ख़ामोशी में थोड़ी सी खनक आती जब चन्दन अपनी टूटी चारपाई पर करवट बदलता। पूरा वातावरण ऐसा लग रहा था, जैसे सबको अपनी-अपनी मंजिल की राह मिल गयी हो।

पेड़ पर चिड़ियों की चहचहाने की आवाज आने लगी, जैसे सभी से कह रही हों, “उठो, सुबह हो गयी अब अपने-अपने काम पर चलो।” …आकाश में हल्की लालिमा दिखाई दी।

प्रत्यक्ष देवता ‘दिवाकर जी’ भी अपनी सुबह की यात्रा शुरू करने वाले थे। चन्दर अपने दरवाजे पर लगे पीपल के पेड़ के नीचे लेटा हुआ यह सब नजारा देख रहा था। धीरे-धीरे डालों की सारी चिड़ियाँ इधर-उधर जाने लगीं। चन्दर ने अब सोच लिया था कि हमें भी कुछ करना चाहिए। वह अपनी बूढ़ी माँ को बगैर बताये मुनीम जी के घर चला गया।

ploughअपनी जो थोड़ी सी जमीन थी उसके ऊपर कर्ज लेकर चन्दर ने एक जोड़ी बैल खरीदा। अपने हाथ से खेती करने लगा। कन्धे पर हल रखकर खेत जोतने जाता। दिन भर पसीना बहाता। जब चन्दर अपने बैलों के साथ घर वापस आता उसकी माँ बड़े प्यार से खेत का उगाया प्याज और गरम-गरम रोटियाँ खिलाती। वह इतने प्रेम से खाता जैसे इससे स्वादिष्ट कोई भोजन हो ही नहीं सकता।

चन्दर अपने बैलों को बहुत प्यार करता था। बार-बार अपने बैलों को सहलाता, बैलों के लिये हरे चारे की व्यवस्था करता। उनकी सेवा करते-करते वह उनसे से बातें भी करता, “…मोती-ज्योती! जल्दी-जल्दी खा लो, कल भला सुबह ही जुताई करने जाना है।”

माँ बोली, “बेटा इस बार धान रोप दो, क्योंकि अबकी समय से  खेतों में पानी मिल जायेगा तो शायद भगवान की कृपा हम लोगों पर भी हो जाय। चन्दर अपने बैलों के साथ सुबह खेत की जुताई करने चला गया।

धीरे-धीरे समय निकलता जा रहा था। माँ को बैलों का कर्ज़ परेशान कर रहा था। …अगर फ़सल अच्छी नहीं हुई तो कर्ज़ कैसे चुकाया जाएग। मुझे झाड़ू- बर्तन करने से इतने पैसे तो नहीं मिलते जिससे पेट पलने के बाद कुछ बचा भी सकूँ…। बेचारी दिनभर पैसों के जोड़-तोड़ मे लगी रहती थी। चन्दर भी कड़ी मेहनत कर के अपने खेत को सँवारने में लगा रहता। माँ को दूसरों के घरों और खेतों में काम करके कुछ न कुछ मिल जाता, जिससे माँ-बेटे कभी भूखे नहीं रहते।

मुनीम जी बीच-बीच में चन्दर को पैसों की याद दिलाना नहीं भूलते। चन्दर अपने बैलों को लेकर दूर-दूर तक जुताई करने चला जाता। लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी जरूरत पूरी नहीं होती। कर्ज़ बढ़ता जा रहा था। इधर चन्दर ने अपने खेतों मे धान रोप दिया था। बारिश का मौसम आ जाने के बाद बैलों को कोई काम भी नहीं मिलता। कर्ज़ को चुकाना अब और बोझ बनता जा रहा था।

चन्दर सोचने लगा कि खेतों की बुआई तो हो ही गयी है… अभी फ़सल तैयार होने मे पाँच-छः महीने लग ही जाएंगे… घर बैठने से अच्छा है, इन पाँच महीनों मे मैं भी बाहर (पंजाब) जाकर कुछ कमा लाऊँ। गाँव के कुछ लड़के जा भी रहे हैं, इससे हमें कोई paddy sowingपरेशानी नही होगी। चन्दर ने अपने मन की बात माँ से बतायी तो वह दुःखी हो गयी। रोने लगी, “अरे! बाहर जाकर क्या करेगा…? यहीं मेहनत करके कुछ पैसा कमा सकता है। …मुनीम जी से कर्ज़ के लिये हाथ-पैर जोड़ कर कुछ और समय माँग लिया जायेगा…।”

लेकिन चन्दर को पंजाब जाकर ज्यादा पैसा कमाने का जुनून था। वह माँ को किसी तरह भविष्य के सपने दिखाकर मना ही लेता है।

लेकिन बूढ़ी माँ को रात भर नींद नहीं आयी, “…इस बुढ़ापे में अकेले कैसे रहूँगी।”

चन्दर का पंजाब जाने का समय आ गया। कल शाम को उसे शहर जाना था। चन्दर की माँ काम पर गयी तो मालकिन से थोड़ा तेल माँगकर लायी। चावल का ‘भूजा’ बनाया और तेल के पराठे बनाकर चन्दर के रास्ते के लिये गठिया दिया। चन्दर ने भी अपने कपड़ों को बहुत रगड़-रगड़कर धोने की कोशिश की। फ़िर भी चमक क्या आती…। चन्दर अपने बाहर जाने वाले कपड़े पहन दिन भर बहुत खुश होकर गाँव में घूमता रहा। सबसे अपनी माँ की देखभाल को कहता रहा।

बैलों से कमाया हुआ कुछ पैसा चन्दर किराये और राहखर्च के लिये रखता है। बाकी माँ को देता है। घर छोड़ने से पहले मोती-ज्योती को गले लगा कर प्यार करता है, “मोती-ज्योती! मै जल्दी ही कमाकर आऊंगा तो तुम लोगों के लिये ‘बरसीम’ लगाऊंगा। तब तक तुम लोगों को भी काम पर नहीं जाना पड़ेगा।”

शाम हुई तो चन्दर के जाने का समय आ गया। माँ कहती है, “बेटा, धान की कटाई के समय जरूर आ जाना… नहीं तो अकेले हमसे नहीं हो सकेगा।” चन्दर माँ से पूरी तरह से वादा करता है कि धान की कटाई के पहले ही आ जाएगा। चन्दर काम की तलाश में शहर की ओर चल दिया। माँ रात भर भगवान से यही प्रार्थना करती रही कि उसका बेटा सकुशल पहुँच जाय। अब तो बूढ़ी माँ के ऊपर बैलों की जिम्मेदारी भी आ गयी। अब वह सारे घरों का चौका-बर्तन भी नहीं कर पाती। केवल बड़का मालिक के घर में काम करके जो मिल जाता उसी से कुछ खा पी लेती। वह अब रोज बैलों का चारा लाने के लिये खेत में जाती और वहाँ अपनी फसल की देखभाल भी करती।

factory workers चन्दर लुधियाना में एक फ़ैक्ट्री में काम करने लगा। उसे हमेशा अपने बैलों के कर्ज़ चुकाने की चिन्ता बनी रहती। उसने दिन रात मेहनत करके पैसा इकट्ठा कर लिया। अपनी माँ के लिए कुछ साड़ियाँ और अपने लिये कई जोड़े कपड़े भी बनवाये। जाड़े के लिए कम्बल भी खरीदा और सारा सामान ले जाने के लिए टिन का एक बक्सा भी खरीदा और सारा सामान उसमें भर लिया। चन्दर जब गाँव आने के लिए तैयार हुआ तो साथ के सारे लड़कों ने उसे रोक लिया। समझाया कि आए हो तो कुछ और पैसा कमा लो… यहकि एक महीने बाद सभी साथ चलेंगे। …कुछ और पैसे। चन्दर रुक गया।

इधर चन्दर की माँ परेशान थी…। धान पक गये थे और मुनीम भी अपने पैसे माँग रहा था। वह अपने बेटे का इन्तजार करती हुई रोज शाम को रास्ते पर बैठी रहती। मुनीम को धान की फ़सल देखकर लालच लग रही थी… वह बार-बार कर्ज़ चुकाने के लिए कहता। आखिरकार… मुनीम नहीं माना और चन्दर के बैल खोल ले गया। माँ को धमकी भी देकर गया कि अगर इस महीने पैसे नहीं मिले तो धान भी कटवा लेगा।

बैल चले जाने के कारण वह रात भर रोती रही…। बेटे का इन्तजार करते-करते यह महीना भी बीत गया। सबके धान कट गये…। अन्ततः वही हुआ जिसका डर उसे खाये जा रहा था। मुनीम खेत से धान कटवा ले गया। बूढ़ी अकेली औरत के बार-बार हाथ जोड़ने पर भी उसे दया नहीं आयी।

बुढ़िया अब विक्षिप्त सी हो गयी। उसे दिन और रात का पता नहीं रहता। वह कभी खेत में जाकर रोती तो कभी बैलों के खूटें के पास। धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगी वह एक कपड़े में सिमटी ठिठुरती कहीं भी सो जाती। किसी को दया आ जाती तो कुछ खाने को दे देता। वह दिन भर पगली बनी इधर-उधर घूमती रहती। एक दिन वह चलते-चलते पास के शहर तक आ पहुँची।

शाम का वक्त था। सब लोग मोटर गाड़ियों, स्कूटर, मोटरसाइकिलों और दूसरे साधनों से अपने-अपने घर जा रहे थे। शाम का घना कुहरा और बढ़ता ही जा रहा था। शहर की स्ट्रीट-लाइट में भी कुछ स्पष्ट नही दिख रहा था। धीरे-धीरे सब दुकाने बन्द हो गयीं और सड़कें सूनी हो गयीं।

जब ठंड से बचने के लिए लोग गरम रजाइयों मे सो रहे होंगे उसी समय चन्दर की बूढ़ी माँ दिशाहीन निराश्रय भटक रही थी। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। क्या करे, कहाँ जाय? वह डरते-डरते एक दुकान के शटर के पास पड़ गयी। उसके तन पर केवल एक फ़टी सी साड़ी थी। वह रात भर पत्थर की बुत बनी एक ही करवट पड़ी रही।

धीरे-धीरे सुबह हुई। सड़क पर कुछ लोग दिखाई देने लगे। दुकान वाला अपना शटर खोलने आया तो चौक पड़ा। बार-बार बुढ़िया को आवाज देने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला। फिर एक लकड़ी से वह उसे ढकेल कर जगाने लगा। थोड़ी सी सुगबुगाहट हुई…। उसने आँखें खोली तो वहाँ इकट्ठा भीड़ देखकर डर गयी। रात भर में ठण्ड से उसके हाथ-पैर अकड़ गये थे। बहुत कोशिश करने पर वह उठ पायी। दुकानदार ने उसे वहाँ से हटने को कहा। उसने देखा सामने आग जल रही थी। बड़ी मुश्किल से वह हिलती हुई उस चाय की दुकान तक पहुँची। चायवाले ने उसे चाय पीने को और कुछ खाने को दे दिया।karz

इधर चन्दर को पैसा कमाने की धुन और लालच इतनी बढ़ गयी थी कि उसे पाँच महीने कब बीत गये इसका पता ही नहीं चला। एक दिन गाँव से आने वाले कुछ लड़के उसे वहाँ मिले तो माँ का हाल सुना। घर उजड़ जाने, दरवाजे से बैलों के चले जाने, फसल गँवा देने और माँ की दिमागी हालत बिगड़ जाने की खबर से वह दहल उठा। अब उसे सारे पैसे बेकार लगने लगे और घर वापस आने के लिए निकल पड़ा। उसका एक-एक पल बहुत बेचैनी में बीत रहा था। घर के रास्ते में उसने देखा कि सब के खेतों में धान कट चुके हैं। वह अपनी माँ की बात को याद कर रहा था… “बाबू! धान कटे से पहिले जरूर चलि ‌अइहऽ…।” चन्दर अपनी गलती पर बहुत पछता रहा था। ट्रेन धीरे-धीरे घर की मंजिल तक पहुँच रही थी…। उसे लगता जैसे समय लम्बा खिंचता जा रहा है।

इधर चन्दर की माँ चाय पीकर थोड़ी गर्माहट पाने के बाद फ़िर अन्जाने रास्ते पर चलने लगी। चलते-चलते वह स्टेशन की तरफ़ मुड़ गयी। ट्रेन अब आने ही वाली थी। वह स्टेशन से बहुत दूर बैठी आने-जाने वालों को देखती रहती। ‘जननायक एक्सप्रेस’ ट्रेन आकर रुकी… चन्दर ने जल्दी से अपना सामान उतारा और चलने लगा। माँ की आँखों ने अपने बच्चे को पहचानने में गलती नहीं की…

माँ को इस हालत में अचानक यहाँ देखकर चन्दर हतप्रभ रह गया। उसे जैसे काठ मार गया था। माँ से लिपट गया…। आँखों में अपराध भाव लिए आँसू उमड़ पड़े। वह फूट-फूटकर रो पड़ा। अपने को धिक्कारने लगा। भगवान को कोसने लगा…।

माँ ने उसके मुँह पर हाथ रखकर चुप कराया। कलेजे से चिपका लिया…। उसकी सूनी आँखों में चेतना लौट आयी थी, “चुप कर बेटा! तेरी माँ अब बिल्कुल ठीक हो गयी है…। अब तू आ गया है न… अब सारा कर्ज मिट जाएगा।

-रागिनी शुक्ला

नोट: ऊपर लगाए गए चित्र अन्तर्जाल से लिए गये हैं जिनका पता उनमें अन्तर्निहित है। यदि चित्रस्वामी द्वारा किसी कॉपीराइट के उल्लंघन की सूचना दी जाती है तो इन्हें सहर्ष हटा लिया जाएगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Monday, February 9, 2009

संगम से यमुना पुल तक नौका-विहार

 

माघ की पूर्णिमा का स्नान सम्पन्न होने के बाद प्रयाग का माघ मेला अपने अवसान पर पहुँच गया है। कल्पवासी भी संगम क्षेत्र का प्रवास पूरा करके अपने घर की राह पकड़ रहे हैं। साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी भी ठंडक समाप्त होने के बाद अपने देश को लौटने वाले हैं।

वसन्त का आगमन हो ही चुका है। इस सुहाने मौसम में संगम क्षेत्र की छटा निराली हो जाती है। हल्की गुनगुनी धूप में खुली नाव में बैठकर यमुना के गहरे हरे पानी पर अठखेलियाँ करते प्रवासी पक्षियों के बीच सैर करना अद्‌भुत आनन्द देने वाला है। गत दिनों सपरिवार इस सुख का लाभ उठाने का अवसर मिला।

आप जानते ही हैं कि इलाहाबाद में यमुना नदी गंगा जी में मिलकर परम पवित्र संगम बनाती है। संगम पर मिलने से ठीक पहले यमुना पर जो आखिरी पुल बना है वह अभी बिलकुल नया (सन्‌ २००४ ई.) है तथा आधुनिक अभियान्त्रिकी का सुन्दर नमूना भी है। दो विशालकाय खम्भों से बँधे तारों ले लटकता हुआ (Cable-stayed bridge) यह ६१० मीटर लम्बा पुल संगम क्षेत्र में आने वाले लोगों के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

Structure: Allahabad Yamuna River Bridge
Location: Allahabad, Uttar Pradesh, India
Structural Type:
 

Cable-stayed bridge
H-pylon, semi-fan arrangement

Function / usage:
 

Road bridge

eight-lane highway
Next to: Allahabad Yamuna River Bridge (1911)
main span 260 metre
total length 610 metre
girder depth 1.4 metre
deck width 26 metre
deck slab thickness 250 millimetre

मोटर चालित नौका पर बैठकर जब हम संगम से यमुना जी की ओर धारा की विपरीत दिशा में इस पुल की दिशा में बढ़े तो मेरे मोबाइल का कैमरा आदतन सक्रिय हो उठा:

पुल ११ नाव पर से नया पुल ऐसा दिखता है- पीछे पुराना पुल
पुल १४ किनारे के बाँध से दिखती पुल के नीचे जाती नाव
पुल ९ पुल के नीचे से लिए गये चित्र में इन्द्रधनुष ...?
पुल १ एक दूसरी नाव से क्रॉसिंग भी हुई
 पुल ५यहाँ यमुना की गहराई की थाह नहीं है
पुल २ किला-घाट : बड़े हनुमान जी पास में ही लेटे हुए हैं
पुल ८अकबर का किला यमुना जी को छूता हुआ खड़ा है 
पुल ४ यमुना जी की सतह पर कलरव करते विदेशी मेहमान
पुल १३ यमुना तट पर वोटक्लब जहाँ ‘त्रिवेणी-महोत्सव’ होगा 
पुल ७पुराना यमुना पुल (निर्माण सन्‌ १९११ई.)

नाव से हम संगम के निकट बने घाट पर उतरे। यमुना का गहरा हरा और साफ पानी गंगाजी के मटमैले किन्तु ‘पवित्र’ जल से मिलता हुआ एक अद्‌भुत कण्ट्रॉस्ट बना रहा था।

पुल ६

बदलता रंग:  संगम पर गंगाजी से मिलती हुई यमुनाजी

कुछ तस्वीरें बाल-गोपाल की इच्छा पर यहाँ देना जरूरी है:

Image051 सारथी पुल १० दादी और बाबा जी
Image063 माँ-बेटा पुल १७
अभी क्यों उतार दिया नाव से?

अनावश्यक सूचना:)

अगले सप्ताह से (१५ से २१ फरवरी तक) त्रिवेणी महोत्सव शुरू हो रहा है। लगातार सात शामें यमुना तट पर गुजरेंगी। उस दौरान अपनी ब्लॉगरी को विराम लगना तय है।:)smile_cry

(सिद्धार्थ)

Thursday, February 5, 2009

गुलदस्ते के बहाने... एक स्त्री विमर्श

 iindin woman

यह बात तो मुझे भी खटकती रही है। जब भी मैने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि को गुलदस्ता भेंट करने के लिए किसी स्त्री-पात्र की ‘खोज’ करते आयोजकों को देखा तो मन खिन्न हो गया। क्या गुलदस्ता पेश करने का आइटम इतना जरूरी है कि मुख्य कार्यक्रम का समय काटकर भी बड़े जतन से इसे अन्जाम देने की व्यवस्था की जाती है। कभी कभी तो बाहरी कलाकारों की ‘आउटसोर्सिंग’ तक की जाती है। यद्यपि माननीय मन्त्री जी या कोई वी.आई.पी. शायद ही गुलदस्ता देने वाले अपरिचित चेहरे पर ध्यान देने की फुरसत में होते होंगे। गुलदस्ता भी क्षणभर में उनके पी.ए. के हाथों से होता हुआ अर्दली और फिर ड्राइवर के पास विराम पाता है। लेकिन इस चारण प्रथा के क्या कहने?

इस निहायत गैर जरूरी प्रथा को अस्वीकार्य बताते हुए सुजाता जी ने चोखेर बाली पर एक पोस्ट लिखी है। शुरुआती बात एकदम दुरुस्त है लेकिन इस एक बात के अलावा जो दूसरी बातें लिखीं गयी हैं, और उनपर जो प्रतिक्रियाएं आयी हैं, उन्हें पढ़ने के बाद मन में कुछ खटास आ गयी है। मेरा मन कुछ और सोच रहा है...।

मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक छोटे से कस्बे के एक सरस्वती शिशु मन्दिर से प्रारम्भिक शिक्षा पायी है। भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर आधारित शिक्षा देने का छोटा सा प्रयास वहाँ होता था। विद्यालय के आचार्य (पुरुष और महिला ) हमें राष्ट्रीय पर्वों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी कराते थे। इसके अतिरिक्त वसन्त पंचमी पर हम वार्षिक शिविर में तीन दिन और दो रातें विद्यालय प्रांगण में ही सामूहिक निवास करते हुए विविध पाठ्येतर क्रियाकलापों में सहभागी होते थे। वहाँ हम एक दूसरे को भैया-बहन सम्बोधित करते थे। हमने वहाँ गुलदस्ता भेंट कार्यक्रम नहीं देखा। मुख्य अतिथि के आने पर लड़कियों द्वारा सरस्वती वन्दना व स्वागत गीत, लड़कों द्वारा सलामी और स्वागत गान, लड़के-लड़कियों द्वारा सामूहिक गायन व नृत्य, नाटक, एकांकी, देशगान। मुख्य अतिथि का शिक्षकों द्वारा माल्यार्पण। इस सबके बीच ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी लड़की या शिक्षिका को उसकी गरिमा को ठेस लगाने वाला कोई कार्य सौंपा गया हो।

02-Air Hostessमेरा मानना है कि भारतीय परम्परा और संस्कृति के बारे में जानना हो तो महानगरों की लकदक दुनिया से निकल कर छोटे कस्बों और गाँवों की ओर जाना चाहिए। जहाँ पाश्चात्य शैली की भौतिकवादी हवा अभी नहीं पहुँच सकी है। वहाँ की औरतें भी अतिथि सत्कार करती हैं लेकिन गुलदस्ता थमाकर नहीं। अतिथि से पर्दा रखकर वे उसके खाने-पीने के लिए अच्छे पकवान बनाती हैं, खिलाते समय एक ओट लेकर पारम्परिक व विनोदपूर्ण गीत (गारी) भी गाती हैं। बच्चों के माध्यम से बात-चीत भी कर लेती हैं। घर परिवार में स्त्री-पुरुष के बीच का सम्बन्ध केवल पति-पत्नी का नहीं होता। भाई-बहन, बुआ-भतीजा, चाचा-भतीजी, बाप-बेटी, ससुर-बहू, जेठ-अनुजवधू, देवर-भाभी, जीजा-साली, सलहज-ननदोई, आदि अनेक रिश्तो का निर्वाह उनकी विशिष्टताओं के साथ पूरी गरिमा और बड़प्पन से होता है। मालिक-नौकरानी, या मालकिन-नौकर का सम्बन्ध भी एक मर्यादा में परिभाषित होता है।

आजकल भी जहाँ थोड़े सभ्य और समझदार लोग होते हैं वहाँ स्वागत कार्यक्रम में अतिथि का माल्यार्पण जरूर किया जाता है। लेकिन माला पहनाने का कार्य कभी भी विपरीत लिंग के व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाता है। किसी पुरुष को महिला द्वारा या किसी महिला को पुरुष द्वारा माला पहनाने का सिर्फ़ एक ही स्थापित सन्दर्भ और प्रसंग भारतवर्ष में मान्यता प्राप्त है। वह है वैवाहिक अवसर जहाँ स्त्री-पुरुष एक दूसरे का वरण कर रहे होते हैं। इसके अतिरिक्त किसी परपुरुष या परस्त्री को फूलों की भेंट देना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। प्रेमी जोड़े भी आपस में इसका आदान-प्रदान एक हद तक सामाजिक स्वीकृति के बाद करने लगे हैं।

तो फिर किसी अतिथि पुरुष के लिए नारी पात्र के हाथ में यह गुलदस्ता कहाँ से आया। मेरा मानना है कि यह फैशन उसी पश्चिमी सभ्यता से आयातित है जो कथित रूप से मनुष्य की स्वतन्त्रता, समानता और न्याय का स्वयंभू अलम्बरदार है। जहाँ पिता-पु्त्री, माँ-बेटा और भाई-बहन के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष के बीच सभी रिश्ते लैंगिक सन्दर्भ में समान रूप से देखे जाते हैं। दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों के बीच होने वाला स्वाभाविक आकर्षण वहाँ की व्यवहार संहिता (etiquettes) को निरूपित करता है। शायद वहाँ इसको बहुत बुरा नहीं माना जाता है। नारी देह के आकर्षण को भुनाने की रीति वहाँ स्थापित और जगविदित है। यदि प्रस्तोता उसमें सहज है तो उसके स्निग्ध स्पर्श और कोमल वाणी से किसे आपत्ति हो सकती है। आप यह तो मानेंगे ही कि सहजता कभी आरोपित नहीं की जा सकती।

बड़े-बड़े जलसों में स्वागत-सत्कार, मेहमानों  की सेवा, पुरस्कार का थाल सजाकर लाने-लेजाने और बिना बात मुस्कराने के लिए भाड़े पर कमनीय काया की धनी नवयौवनाओं की भर्ती जलसा-प्रबन्धकों  (event managers) द्वारा की जाती है। यह सब पश्चिम से ही इधर आया है। गुलदस्ता थमाने कि नौटंकी वहीं से आयातित है। लेकिन वहाँ इस विमर्श पर कान देने वाला कोई नहीं है।

विमान परिचारिका, फैशन व विज्ञापन मॉडेल्स, फिल्मी कलाकार, सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, टीवी और इंटरनेट चैनेल्स तथा चमकीली रंगीन पत्र-पत्रिकाओं में अपना कैरियर तलाश करती लड़कियों का यू.एस.पी. क्या है? ...एक पेश करने लायक व्यक्तित्व ( a presentable personality) या कुछ और? [कुछ लोग इसे ‘दिखाने लायक शरीर’ पढ़ और समझ लें तो मुझे उनकी सोच पर दया ही आएगी।] इन क्षेत्रों में लड़कों के साथ लड़कियों की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होती। जबकि ये सारे कार्य लड़के भी कर सकते हैं। कहीं कहीं तो अघोषित रूप से शत-प्रतिशत आरक्षण लड़कियों के लिए ही है। जहाँ प्रतिस्पर्धा ही नहीं होती। लेकिन मैने इसे लेकर कहीं असन्तोष का स्वर नहीं सुना।

तो क्या अब स्त्री-विमर्श की नयी विचारभूमि इन सौन्दर्य और आकर्षक व्यक्तित्व पर आधारित व्यवसायों पर ताला लगवाने के उपाय ढूँढेगी? क्या यह मान लिया जाय कि यह सब स्त्री की गरिमा के विरुद्ध है क्योंकि इससे पुरुष आनन्द और सुख प्राप्त करते हैं। क्या यह निष्कर्ष भी निकाला जाय कि ऐसी लड़कियों को देखने वाला पुरुष उसे पत्नी या माशूका के रूप में कल्पित करता है? छिः...। कम से कम मैं ऐसा मानने को तैयार नहीं हूँ।

मुझे हैरानी है कि लेखनी की स्वतन्त्रता का ऐसा दुरुपयोग इस ब्लॉगजगत में हो रहा है। हम किस दिशा में जा रहे हैं?

और अन्त में...

मेरी पिछली पोस्ट में प्रकाशित कहानी की लेखिका श्रीमती रागिनी शुक्ला ने अपनी प्रतिक्रिया चिठ्ठी लिखकर भेंजी है। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हुए पत्र यहाँ आपके लिए प्रस्तुत है:

LETTER BHABHI JI सिद्धार्थ जी, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से पाठकों से मेरा परिचय करवाया। और आज ‘दुलारी’ की कहानी आपके ही द्वारा सभी तक पहुँची। सही मायने में दुलारी की डोली को आपने ही सजाया है। दुलारी की कहानी पिछले आठ सालों से घर के कोने में पड़ी धूल फाँक रही थी। यह कहानी पहले भी कई पत्रिकाओं में मैंने भेजी थी और सभी ने इसे कूड़ेदान में ही स्थान दिया। लेकिन आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से इसे सम्मान दिया। आज दुलारी हमारे बीच नहीं है, लेकिन आपके माध्यम से वह फिर जीवित हो गयी है।

हमारे जैसे बहुत से लोग होंगे जो दुलारी जैसी न जाने कितनी कहानियाँ लिख कर अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोए होंगे लेकिन सही माध्यम न मिलने के कारण वह पाठकों तक नहीं पहुँच पाती, और अपने मन की भावनाओं को कागज में लिखकर किसी कोने में डाल देते हैं। इसलिए मेरी भगवान से प्रार्थना है कि जो लोग किसी की पीड़ा को जानते हों और उसे लिखते हों तो उन्हें भी आपके जैसा माध्यम मिले जिससे उन्हें और लिखने की प्रेरणा मिल सके। और जैसे मेरी दुलारी की, उसी तरह सभी की भावनाओं की डोली सजे।

                        -रागिनी शुक्ला