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Friday, November 20, 2009

कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है...?

 

दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्किल सवाल पूछ दिया था। तब सरकारी सेवा में दो साल तक रह लेने के बाद मुझे नेता नामक जीव के बारे में जो अनुभव हुआ था उसके आधार पर मैने कुछ स्पष्ट टिप्पणी न करना ही उचित समझा। अकस्मात् मुझे कोई सटीक अन्तर सूझ भी नहीं रहा था।

...फिर उन्होंने ही बताया कि भारत में राजनीति पेशेवर नहीं है। इसमें एक खास पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोग ही आगे बढ़ पाते हैं। भकुआकर मैं उनकी बात सुनता रहा... कह रहे थे कि यदि आप किसी दूसरे पेशे में लगे हुए हैं तो  आप नेता नहीं हो सकते और यदि आप नेता हैं तो किसी दूसरे पेशे में नहीं जा सकते। लेकिन पश्चिमी लोकतन्त्रों में आप किसी भी पेशे में रहते हुए चुनाव लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं, मन्त्री बन सकते हैं और फिर वापस अपने काम पर लौट सकते हैं।

मुझे उनकी बातें तब बिल्कुल ‘हट के’ लगी थीं लेकिन बाद में जब मैने इस पर विचार किया तो उनकी बात ठीक ही लगी। यहाँ आप अच्छे डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इन्जीनियर, मैनेजर, प्रशासक, कलाकार, फौजी, नर्तक, चित्रकार, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री  आदि हैं तो अच्छी नेतागीरी नहीं कर सकते। सरकारी नौकरी करने वाले तो बाकायदा इस काम से प्रतिबन्धित हैं। यहाँ जो नेता है वह सिर्फ नेता ही है। वह चुनाव लड़ने-लड़वाने, जीतने-हारने, और विधायक, सांसद और मन्त्री बनने या न बन पाने   के अलावा कुछ नहीं कर सकता। अनेक परिवार पूरी तरह इस राजनीति कर्म को ही समर्पित हैं।

मुझे यह सोचकर मन ही मन कोफ़्त सी होने लगी थी कि एक स्वतंत्र पेशा  के रूप में राजनीति का  कैरियर चुनने का विकल्प सबके पास मौजूद नहीं है। अपनी निजी प्रतिभा, अभिरुचि और परिश्रम से अन्य सभी व्यवसाय अपनाए जा सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति में इन गुणों की प्रचुरता के बावजूद राजनीति के क्षेत्र में सफलता की गारण्टी नहीं है।  देश में कितनी प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं लेकिन राजनीति के क्षेत्र में वही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लीड इण्डिया कैम्पेन भी शायद इसी सोच के आधार पर शुरू किया गया था लेकिन अपेक्षित बदलाव दिखायी नहीं दिये।

लेकिन जरा ठहरिए...  पिछले दस बारह साल में राजनीतिक पटल पर जो कुछ घटित हुआ है उसे देखकर आप क्या कहेंगे? अपने देश में एक उच्च कोटि का वैज्ञानिक राष्ट्रपति बना और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री बन गया। विडम्बना देखिए कि यह सब तभी सम्भव हुआ जब इस प्रकार का निर्णय किसी खानदानी राजनैतिक परिवार द्वारा लि्या गया। इन विभूतियों ने अपने जीवन के उद्देश्य तय करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें राजनैतिक सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना है। न ही इन्होंने इस दिशा में कोई स्वतन्त्र प्रयास किया होगा। वस्तुतः इनका राजनीति में आना और टिके रहना इनके असली आका के प्रसादपर्यन्त ही सम्भव हुआ। कलाम साहब को जब पूरा देश चाहता था तब भी वो हटा दिये गये थे। इसलिए इन दो उदाहरणों को अपवाद ही माना जाना चाहिए।

ये सारी बातें आज मेरे मन में आने की एक खास वजह है। मेरी मुलाकात एक ऐसे दुर्लभ प्राचीन कालीन नेता जी से हुई जो उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के माननीय सदस्य जो अत्यन्त गरीब और बदहाल हैं...।

 

पूर्व विधायक श्री रामदेव जी

श्री रामदेव

पुत्र-रामनाथ

ग्राम-पुरा लच्छन

पोस्ट/तहसील-मेजा

कांगेसी बिधायक-मेजा

(१९७४-१९७७)

आजकल एक बार विधायक हो जाने का मतलब  आप सहज ही जान सकते हैं। मधु कोड़ा जी का उदाहरण तरोताजा है। कुल जमा चार पाँच सालों में आर्थिक विकास की जो गंगा उन्होंने बहायी है उसका वर्णन यहाँ करना जरूरी नहीं है। सभी कोड़ा साहब की तरह मधु ही मधु तो इकठ्ठा नहीं कर पाएंगे लेकिन किसी भी विधायक के लिए अब देखते-देखते करोड़ों जुटा लेना सामान्य बात हो गयी है। बड़ी सी चमचमाती गाड़ी में चार-चार बन्दूकधारियों के साथ घूमते, नौकरशाहों पर रोब गाँठते ये जनता के नुमाइन्दे जिस ओर निकल पड़ते हैं उस ओर तीमारदारों की लाइन लग जाती है। एक बार विधायकी का दाँव लग गया तो पूरी जिन्दगी के पौ-बारह हो जाते हैं। पीढ़ियाँ निहाल हो जाती हैं।

ऐसे में यदि आपको एक ऐसा पूर्व विधायक मिल जाय जिसको अपनी रोजी-रोटी के लिए खेत में मजदूरी करनी पड़ रही हो, तहसील में जाकर किसी वकील का बस्ता ढोना पड़ रहा हो और १०-२० रूपए लेकर दस्तावेज नवीसी करनी पड़ रही हो तो क्या कहेंगे? जी हाँ, इलाहाबाद की मेजा विधान सभा का प्रतिनिधित्व १९७४ से १९७६ तक करने वाले विधायक रामदेव जी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले भूमिहीन दलित परिवार के मुखिया हैं। उनके तीन बेटों को शिक्षा नसीब न हो सकी। खेतों में मेहनत मजदूरी करना और बैलों के साथ हल चलाना उनका जीविका का साधन है।

“आपने बच्चों को पढ़ाया नहीं...?”

“कहाँ साहब, हम गरीब आदमी ठहरे... बच्चों का पेट पालें कि स्कूल भेंजें...?”

बात बात में दोनो हाथ जोड़कर अपनी सरलता का परिचय देते  रामदेव जी ने जब अपनी राम कहानी बतायी तो मेरे मन में एक हूक सी उठने लगी। खुद भी मुश्किल से दर्जा पाँच पास कर सके थे। कांग्रेस पार्टी के जलसों में आया जाया करते थे। बहुगुणा जी ने हरिजन सुरक्षित सीट से टिकट दे दिया तो विधायक बन गये लेकिन अपने घर परिवार के लिए कोई संसाधन नहीं जुटा सके। लखनऊ की सत्ता की गलियों में पहुँच जाने के बावजूद बच्चों को गाँव के प्राइमरी स्कूल से आगे नहीं ले जा सके।

तीनो बेटों की कम उम्र में शादी कर दी। स्थानीय अनपढ़ समाज से बाहर कोई रिश्ता नहीं हुआ। बेटों ने खेतों में मजदूरी की और घर में बच्चे पैदा किए। तीनो के मिलाकर बारह लड़कियाँ और एक लड़का। सभी अशिक्षित रहे और मजदूर  बन गये। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर खेत का जो छोटा टुकड़ा मिला उस पथरीली जमीन पर थोड़ी सी ज्वार, बाजरा और मक्का की फसल अपने श्रम से उगा लेते हैं, लेकिन चावल गेहूँ दाल तो खरीदना ही पड़ता है।

“बी.पी.एल. कार्ड बनवा लिए हैं कि नहीं...?” सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से खरीदारी की सुविधा देने वाले इस कार्ड की बावत पूछने पर सकुचा जाते हैं।

“है तो साहब, लेकिन कहाँ मिल पाता है...। राशन का खर्चा बहुत है... वहाँ से कभी-कभार दस-बीस किलो चुपके से ले आता हूँ... थोड़ी लाज भी लगती है साहब... बड़ी कठिनाई है... ” उनके बार-बार हाथ जोड़ने से मुझे उलझन होने लगती है।

“आपका मकान कैसा है?” ब्लॉगर ने साहस करके पूछ ही लिया।

“कच्चा है साहब... हम बहुत गरीब हैं”...चेहरे पर वही संकोच तारी है।

“भूतपूर्व विधायक को तो सरकार अनेक सुविधाएं देती है। आपने कोशिश नहीं की...?” मेरा आशय राजनैतिक पेंशन, मुफ़्त  की यात्रा सुविधा इत्यादि से था।

“साहब ट्रेन और बस का ‘पास’ तो है लेकिन हमें खेत-खलिहान और तहसील तक ही जाना होता है... उसके लिए साइकिल या पैदल से काम चल जाता है। कभी लखनऊ या इलाहाबाद जाना होता है तभी पास का काम पड़ता है।”

“पेंशन तो मिल रही है न...?”

“डेढ़ हजार में क्या होता है साहब?”

“बस डेढ़ हजार...?” मुझे आश्चर्य हुआ।

“असल में साहब, मैं टाइम पर फॉर्म नहीं भर पाया था... सरकार का कोई दोष नहीं है” विनम्रता में हाथ बदस्तूर जुड़ा हुआ है।

मैने सम्बन्धित बाबू को बुलाकर पूछा तो पता चला कि समय-समय पर पेंशन पुनरीक्षण (revision) की प्रक्रिया का लाभ इन्हें मिला ही नहीं है। मई ’९७ से इनकी मूल पेंशन १४५०/- रूपये पर अटकी हुई है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में पहुँच चुके रामदेव जी की खराब माली हालत पर जब यहाँ के सांसद प्रत्याशी की निगाह पड़ी तो उन्होंने विधान सभा सचिवालय में पैरवी करके इनकी पेंशन में सुधार करा दिया था। उसी प्राधिकार पत्र के अनुसार भुगतान शुरू कराने के लिए रामदेव जी ने कोषागार की राह पकड़ी थी।

मैने देखा कि इनकी पेंशन सितम्बर-९८ से १९००/-, अप्रैल-२००४ से २५००/-, अगस्त-२००५ से ३६००/- और दिसम्बर-२००७ से ७०००/- कर दिए जाने का आदेश एक साथ जारी हुआ था। यानि विधायक जी अपनी मेहनत मजदूरी, और तहसील की मुंशीगीरी में इतना उलझे रहे कि अपनी पेंशन भी समय से नहीं बढ़वा सके। मूल पेंशन पर देय महंगाई भत्ता जोड़कर एकमुश्त एरियर की धनराशि लाखों में मिलने की बात सुनकर उनके चेहरे पर जो खुशी उतर आयी उसका बयान करना मुश्किल है। बार बार हाथ जोड़कर ऊपर वाले के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रहे। आँखों की कोर से नमी झँकने लगी थी।

क्या आज का कोई विधायक या टुटपुँजिया नेता भी इस दारुण दशा का शिकार हो सकता है?  किसी विधायक के इर्द-गिर्द चलने वाले लटकन भी ठेकेदारी और रंगदारी का धन्धा चमकाकर मालदार और रौबदार हो लेते हैं। राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाले अब इतना विकास तो आसानी से कर लेते हैं कि उन्हें कभी रामदेव जी जैसे दिन न देखने पड़े। मधु कोड़ाओं के तो कहने ही क्या...।

फिर कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है...? :)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

28 comments:

  1. आपने यह लेख बेहद ईमानदारी से लिखा है, आज ईमानदार व्‍यक्ति की यही हालात हो जाते है, उसे अपना जीवन गई गुजरी दशा में गुजारना पड़ता है।

    ये तो पूर्व विधायक है किन्‍तु आज जब आपके पार्षदो को देखेगे तो इनके रूतबे किसी विधायक से कम नही मिलेगे। इसे ही कहेगे राजनीति कि बदली हुई दशा।

    आज राजनीति का पतन नही हुआ है कुछ नेताओ का ईमान का जरूर पतन हुआ है।

    सार्थक लेख, वंदे मातरम्

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  2. सुबह सुबह कोंच दिए!
    हो गई दिन भर की छुट्टी।

    Ignorance is NOT bliss.

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  3. चलिये खुशी की बात यह है कि इस इमानदार विधायक को कम से कम कोषागार के अधिकारी ने इज्जत तो बक्शी धन्यवाद के पात्र आप है जिनकी नजर इन पर पड गयी अन्यथा कोषागार के गलियारो मे वेतन पुनरीक्षण के लिये धक्के ही खाते रहते
    वैसे आप नजर डालेगे तो पूर्व के कई ईंमानदार अधिकारी कर्मचारीवर्ग जो अपनी जिन्दगी मे कभी भ्रष्टाचार नही किये इमानदारी से रहे वो अन्तिम दिनो मे इस सत्य से कोषगारो मे रू ब रू हो रहे है तथा आपन जीवन व्यर्थ गयाओ का पछ्तावा कर रहे है यह अनुभव बहुत से बुजुर्गो से बात कर मै कह रहा हू आप की सम्वेदन्शीलता सराहनीय है

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  4. विरल उदाहरण दिखाया आपने । अपवाद स्वरूप दिखते हैं विधायक जी के ऐसे रूप ।

    व्यवस्था क्या किसी को नहीं छोड़ती ? विधायक जी को भी नहीं । अतिक्रमण करना ही श्रेयस्कर है शायद । सच कहा आपने - "मधु कोड़ाओं के तो कहने ही क्या."

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  5. हमारे गावं में तीन बार एम एल ए चुने गए यानि पंद्रह वर्षों तक एम एल ए रहे .. और शायद दो बार सरकार के किसी विभाग में मंत्री रहे छत्रुराम महतो जी भी अपनी सादगी और ईमानदारी के मिसाल ही हैं .. पर गांव के लोगों को शिकायत है कि नेता में इतना सीधापन भी ठीक नहीं होता .. इतने दिनों तक मौका देने के बावजूद क्षेत्र का कोई विकास नहीं कर सके .. अभी भी वे बी जे पी के गोमिया क्षेत्र के विधायक हैं .. पर शायद उनके बच्‍चे तेज निकले और अपने जीवनयापन के लिए मुंहताज नहीं .. >इस पृष्‍ठ में विभिन्‍न वर्षों में गोमिया विधान सभा क्षेत्र से चुने गए विधायकों और उनके रनर अप के विवरण हैं .. इसमें 1977 में छत्रु राम महतो जी के बाद मेरे चाचाजी राम विश्‍वास महथा जी को स्‍थान दिख रहा है .. जो 1977 के कांग्रेस विरोधी लहर में कांग्रेस की टिकट पर जीत की उम्‍मीद तो नहीं कर सकते थे .. पर फिर भी अपने बल बूते पर इतने वोट प्राप्‍त कर द्वितीय स्‍थान प्राप्‍त किया था .. वे यहां एडवोकेट हैं और कई बार सबडिविजन स्‍तर पर बार एशोसिएशन के अध्‍यक्ष पद के लिए चुने गए हैं .. अपनी ईमानदारी के बावजूद उन्‍होने धीरे धीरे राजनीति से स्‍वयं ही पैर हटा लिए .. जब राजनीति में आकर भी समाज के हित में कोई काम ही न कर सके तो .. पुन: चुनाव के वक्‍त घर घर जाकर वोट मांगना भी किसे पसंद आ सकता है .. आज की राजनीति में पढे लिखे , किसी अलग क्षेत्र के ईमानदार लोगों की यही मजबूरी है !!

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  6. विचारणीय वक्तव्य लिखा है.
    मैंने भी एक पुराने विधायक की कमोबेश ऐसी ही दारुण हालत अपने क्षेत्र में देख चुका हूँ.

    और भी यह भी देख चूका हूँ. सड़क छाप संस्कारहीन, सायकिल चोर जैसे लोग भी १०-१५ वर्षों की खोखली राजनीति और छुटभैयागिरी करने के बाद. सर्फ १-२ सालों की ठेकेदारी में तीन तल्ला मकान, गाड़ियों की चहल पहल और उनके बच्चों का राजधानी में जबरदस्ती उच्च शिक्षा ग्रहण...

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  7. रामदेव जी जैसे लोग तो अब संग्रहालयों में रखकर टिकट लगाकर देखने की चीज़ हैं...

    वरना आज तो जिसमें कोई नीति नहीं, वहीं राजनीति है...

    जय हिंद...

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  8. पतन ही तो हुआ.. पहले रामदेव जैसे लोग राजनिति करते थे.. आज मधु कोड़ा जैसे..

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  9. हमारे देश की राजनीति की हकीकत यह है कि वो खुद नहीं जानती कि नेता उसके साथ क्या कर रहे हैं? पांच साल के लिए सत्ता का हाथ में आ जाना ही उनके लिए जन-सेवा है।

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  10. रामदेव जी जेसे विधायक आज केसी भी हालत मै हो लेकिन वो सम्मान से इज्जत से रहते है, चाहे पास कोडी ना हो लेकिन दिल के बादशाह है, ओर यह आज के मधु फ़ोडा जेसे लोग चाहे अर्बो पास हो लेकिन किसी नाली के कीडे से बढ कर इन की ओकात नही, सेवा असल मे राम देव जी ही कर रहे है,
    यहां हमारे शहर का मेयर एक जुते की दुकान चलाता है, हम उसे बीस साल से देख रहे है, कोई बाडी गार्ड नही, सडक पर हम जेसे ही घुमता है, कोई नोकर नही, खरीदारी के समय हमारे पीछे खडा है तो कोई बात नही.
    भारत मै नेता गुंडा होता है सेवक नही, ओर जो सच्चा सेवक होता है वो राम देव जी जेसा ही होता है, प्रणाम करता हुं राम देव जी को, ओर आप का धन्यवद

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  11. Aapke is aalekh ka ek ek shabd dil ko gahre chhoo jhakjhor gaya.....sare shabd chuk gaye...kya kahun....

    Bas aapko kotishah aabhar de sakti hun jo aapne is prernadayak prasang ko sabke saamne rakha aur bhootpoorv in vidhayak kee sahayta kee...

    Aaapke is aalekh se shabdsah sahmat hun....sadhuwaad swikaren...

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  12. एक आपवादिक चरित्र ने आखिर ढूंढ ही निकाला आपको -अपने सामने ही लाखो का एरियर निकलवा दीजियेगा ,बिचारे निवर्तमान विधायक जी का !

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  13. Thought-provoking ! But it is also to be pondered over whether the politicians are responsible for the state of things or 'we the people'. Sangita Puri's comment "पर गांव के लोगों को शिकायत है कि नेता में इतना सीधापन भी ठीक नहीं होता" speaks a lot. It is perhaps we who deserve the representatives we get. The representative does not go to the legiglature by himself, but sent by us.

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  14. मेरे हिसाब से ऐसे लोग अब अपवाद स्वरूप ही बचे रह गये हैं। बाकी तो पतनशीलता तो हर पेशे से जुड गई है, राजनीति हो या डॉक्टरी..हर जगह माहौल नकारात्मक ज्यादा दिख रहा है ( सकारात्मक भी होंगे. लेकिन कम)

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  15. नेता बनने के लिये जो बेईमानी की सीढियाँ चढनी पडती है वो भले लोगो के लिये नही बनी होती ।

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  16. राजनीति के पतन का सबसे बडा कारण अच्छे लोगो का राजनीति से परहेज है. अच्छे लोग आज के सिस्टम मे अनफ़िट मह्सूस करते है और लुच्चे लोग कब्जा कर लेते है .

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  17. अच्छा, रामदेव छाप अभी हैं?!

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  18. अच्छी पोस्ट है। वैसे तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि जनप्रतिनिधि से यह अपेक्षा होती है कि वह अपनी जनता को जागरूक करे, उसके अधिकार की रक्षा करे। ईमानदारी का मतलन दीन-हीन हो जाना नहीं है। जो जनप्रतिनिधि खुद जागरूक रहकर अपनी दशा सुधार नहीं पाता वह जनता का सुधार कैसे कर पायेगा। बहुगुणाजी ने क्या सोचकर रामदेव जी को प्रतिनिधि चुना होगा यह वे ही बता सकते हैं। रामदेवजी को उनके अधिकार कौन बतायेगा?

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  19. ऊपर वाली टिपण्णी में काम की बात है.

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  20. बड़ी प्रतीक्षा के बाद कोई ऐसी टिप्पणी आयी जिसे मैं ढूँढ रहा था। रामदेव जैसे लोग प्रशंसा के पात्र कैसे हो गये यह मैं समझ नहीं पा रहा था। विधानसभा के लिए चुने जाने के बाद भ्रष्ट तरीके अपनाकर जनता के पैसे को लूटना और अपनी सम्पत्ति खड़ा कर लेना जितना बुरा है उतना ही खराब निष्क्रिय और अज्ञानी बनकर पड़े रहना भी है। अशिक्षा और पिछड़ेपन के दलदल से यदि एक जनप्रतिनिधि स्वयं को नहीं निकाल सका है तो वह उन लाखों नागरिकों का क्या भला करेगा जो उसे वोट देकर अपना भाग्य विधाता बना रहे हैं। कांग्रेसी सरकारों में ऐसे निस्पृह और निठल्ले लोगों की बहुतायत रही है जो बिना मेहनत के चुनाव जीत जाते थे और उसके बाद भी कोई मेहनत का कार्य नहीं करते थे। मुफ़्त का थोड़ा भी मिल जाय तो संतोष कर लेते थे। ऐसी निरर्थक सादगी से न तो सरकार का भला हुआ, न समाज का, और न ही स्वयं उनका।

    जिन्हें जनता के सामने कर्मठता, जागरूकता, महत्वाकांक्षा और अधिकारों के प्रति सजगता के गुणों का मॉडल होना चाहिए वही यदि अपनी दीनता, दरिद्रता और हीन जीवन शैली के उदाहरण बन जाय तो क्या कहा जाय। जिसे समाज में शिक्षा के प्रसार और रोजगार सृजन की योजना बनानी है वे यदि स्वयं अशिक्षित और बेरोजगार होकर रह जाय उससे आप क्या उम्मीद कर सकेंगे।

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  21. धन्यवाद सिद्धार्थजी ,
    आपने मेरे मन की बात कह दी

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  22. Shuddh ईमानदार विधायक ke darshan kar ke mun Bhari ho gaya. Bataiye. Shastri Ji ke zamne ke netaon ko usi zamane mein mar khap jana chahiye tha. Pade hain Vartmaan rajniti ko kalankit karte huye.
    Inko dekh kar to gaon ka sarpunch bhi sharm se katori bhar pani mein doob mere.

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  23. वे इतने सरल थे तभी तो अब विधायक नहीं. ऐसे नेता 70 के दशक के आगे नहीं बढे. पिछले दिनों श्री अरविंद मिश्रा ने अपने पूज्य पिताजी के विषय में लिखा था कि वे कैसे मूल्य परक राजनीति के कारण उससे विरक्त हो गये. कुछ समय पूर्व मैं भी एक पूर्व सांसद और उनकी पूर्व विधायक पत्नी से मिला था जो अपने छोटे से काम के लिये भटक रहे थे. इन सबने मूल्य नहीं छोडे तो सत्ता छूट गयी.

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  24. गोरखपुर के बाँसगाँव संसदीय क्षेत्र में एक प्रतिनिधि हुए मोलई प्रसाद.. सन याद नहीं लेकिन बहुत पुरानी बात है।

    उनको चुनाव-चिह्न आवंटित हुआ था- खंजड़ी। लोगबाग बताते हैं, कि ददा खाली खँजड़ी बजाकर प्रचार करते थे, और चुनाव जीत गये।

    अगर राजनीति का पतन नहीं हो रहा तो यह कैसे संभव है कि एक बार विधाय्क रह लेने वाला शख्स अगले चार बार चुनाव हारकर भी अय्याशी से रहने का बंदोबस्त कर लेता है??

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  25. pahle to siddharth ji aapko bahut bahut dhanyvaad. vaakai siyasat men jo nishkriy hai vah imaandaar rahte hue bhee apnaa dushman hai. doosre kartikey ji ko yaad dilaa den bansganw men molai nahi molhoo prasaad jeete the aur yah gaate hue jeete- toothi jhopdiyaa mahliyaa se poochhe, kaa hamro dinvaa bahuriye ki naa raam.

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  26. क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
    पर उसे क्या जो दंतहीन ,विशरहित ,विनीत ,सरल हो ..............

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  27. सुच कहने का बूता अब आप जैसे दुर्लभ लोगों में शेष रह गया है.इतनी विस्तृत और मानवीय-स्पर्श की पोस्ट के लिए साधुवाद!

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  28. हाँ जो नेता है वह सिर्फ नेता ही है।

    .... और अगर कुछ और है, तो वह होने का कोई मतलब नहीं है.

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