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Friday, October 30, 2009

इलाहाबाद की राष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद...

यह पोस्ट सातवें आसमान से लिख रहा हूँ... कारण है आप सभी की जोरदार, शोरदार और बेजोड़दार प्रतिक्रियाओं की सतत्‌ श्रृंखला। वाह, मुझे तो उड़न तश्तरी होने का इल्म हो रहा है... (आदरणीय समीर जी क्षमा याचना सहित)

श्री विभूति नारायण राय जी से २३ अगस्त २००९ को मेरी प्रथम मुलाकात हुई, नितान्त अनौपचारिक और व्यक्तिगत। सत्यार्थमित्र पुस्तक भेंट करने और हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी भाषा और साहित्य से सम्बन्धित पाठ्येत्तर गतिविधियों के सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर अपने को अद्यतन कर लेना  ही मेरा उद्देश्य था।

राय साहब ने मेरी पुस्तक पर प्रसन्नता जाहिर की और तत्क्षण ही अपने लैपटॉप पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी और सत्यार्थमित्र के ब्लॉग पर विहंगम दृष्टि डालने के बाद अपने विश्वविद्यालय की साइट के दर्शन भी कराये। हिन्दी साहित्य के एक लाख पृष्ठों को नेट पर चढ़ाने की परियोजना के बारे में बताया। मैने भी उन्हें बताया कि पिछली मई में हमने इलाहाबाद वि.वि. के निराला सभागार में एक ब्लॉगिंग की कार्यशाला करायी थी जिसमें इन्टरनेट पर ब्लॉग लेखन के माध्यम से हिन्दी के बढ़ते कदमों की चर्चा की गयी थी। उन्होंने उस कार्यशाला सम्बन्धी पोस्ट के लिंक पर जाकर उसे देखा और उसके बाद उन्होंने मुझसे जो प्रस्ताव रखा उससे मैं सकते में आ गया था-

“इलाहाबाद में हिन्दी ब्लॉगों के बारे में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन जिसमें देश के सबसे अच्छे ब्लॉगर्स को बुलाकर इस माध्यम पर दो दिन की चर्चा कराई जाय।” संगोष्ठी स्मृति भेंट

उसके बाद अबतक जो-जो हुआ है वह इतिहास बनता जा रहा है। राय साहब और नामवर जी की व्यस्तता के कारण तिथियों को आगे सरकाए जाने की मजबूरी हो या बर्धा से इलाहाबाद की दूरी और नेट पर सम्पर्क का अभाव रहा हो, विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ इस नवीन माध्यम पर की जा रही संगोष्ठी के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने की जटिल प्रक्रिया रही हो या मेरे मन में उत्साह और सदाशय का प्राचुर्य और अनुभव की न्यूनता रही हो; इन सभी दिक्कतों और खूबियों-खामियों के बावजूद यह संगोष्ठी जिस रूप में सम्पन्न हुई उससे मेरा मन बल्लियों उछल रहा है। अब प्रायः सभी मान रहे हैं कि यह संगोष्ठी अबतक का सबसे बड़ा आयोजन साबित हुई है।

मेरी अप्रतिम प्रसन्नता मात्र इसलिए नहीं कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक का विमोचन नामवर जी के हाथों होने का जुगाड़ हो गया, वह कार्य तो एकेडेमी पहले भी कराती रही है; बल्कि मैं तो इसलिए अभिभूत हूँ कि मात्र डेढ़ साल पहले बिल्कुल नौसिखिया बनकर इस माध्यम से जुड़ने के बाद मुझे ऐसे अवसर और समर्थन मिलने लगे कि इस माध्यम को व्यक्तिगत कम्प्यूटर कक्षों से बाहर निकालकर  अखबारी सुर्खियाँ बनाने, सभागारों में चर्चा का विषय बनाने, पारम्परिक साहित्य के प्रिण्ट माध्यम से इसे विधिवत जोड़ने के जो प्रयास हो रहे हैं उसमें एक माध्यम मैं भी बन गया। इतना ही नहीं, अन्ततः हिन्दी जगत के शिखर पर विराजने वाले एक ख्यातिनाम हस्ताक्षर को जब इस माध्यम पर गम्भीरता से मनन करने और अपनी राय बदलने या अपडेट करने पर मजबूर होना पड़ा तो मैं इस ऐतिहासिक घटना का न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी बना  बल्कि उस हृदय परिवर्तन के प्राकट्य का एक संवाहक भी हो लिया।

मैं इस जोड़-घटाने में कभी नहीं पड़ने वाला कि मुझे इस बात की कितनी क्रेडिट दी गयी है या दी जाती है, लेकिन पिछले एक सप्ताह से जो कुछ घटित हो रहा है उसे देखकर मुझे असीम आनन्द, तृप्ति और आत्मसंतुष्टि ने घेर रखा है। आत्ममुग्ध हो गया हूँ मैं। ...अब इससे किसी विघ्नसंतोषी का दिल बैठा जा रहा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? चुपचाप काम निबटाने के बाद ब्लॉग उदधि में उठने वाली ऊँची तरंगों को सुरक्षित दूरी बनाकर शान्ति और कौतूहल के मिश्रित भाव से देखने और मुक्त भाव से उनमें मानसिक गोता लगाने का जो सुख मुझे मिला है वह जीवन भर सँजो कर रखना चाहूंगा।

मेरे वरिष्ठ मित्रों और आदरणीय अग्रजों ने जो स्नेह, समर्थन और आशीर्वाद दिया उससे मुझे आगे बढ़ने का उत्साह मिला। असीम ऊर्जा मिली। (एक अदना सा ‘धन्यवाद’ देकर मैं उस ऋण से उऋण नहीं हो सकता।) लेकिन जिन लोगों ने पूरी शक्ति लगाकर इस संगोष्ठी का छिद्रान्वेषण किया, अनेक कमियों को ढूँढकर  बताया, और बड़े-बुजुर्गों की ऊटपटांग आलोचना की उससे मेरे मन को कुछ ज्यादा मजबूती मिली। अब मुझे विश्वास हो गया है कि किसी अच्छे और बड़े कार्य के लिए आपके पास बहुत लम्बा अनुभव होना या अधिक उम्र का होना बहुत जरूरी नहीं है। यह कोई गारण्टी नहीं देता। अराजकता, अविवेक, अहमन्यता, अधीरता, अति भावुकता और अनाड़ीपन का प्रकोप वहाँ भी हो सकता है। ऐसा बोध कराने के लिए उन सबको तहेदिल से शुक्रिया...।

हिन्दी ब्लॉग-जगत में मेरी छोटी सी यात्रा को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव द्वारा जिन उद्देश्यों से किया गया था उसे उन्होने पुस्तक के प्रकाशकीय में स्पष्ट किया है। इसके औचित्य पर प्रश्न उठाने वालों को पुस्तक खरीदकर पढ़नी चाहिए और तभी कोई राय बनानी चाहिए। मैं तो बड़ी विनम्रता से हिन्दुस्तानी एकेडेमी के उच्चाधिकारियों से लेकर अपने आस-पास के आम लोगों को जो मेरी विचार भूमि में बीज समान अंकुरित होते रहे हैं; और घर-परिवार से लेकर इस ब्लॉग-परिवार के सुधीजनों के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त कर चुका हूँ जिनका इस पुस्तक के निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी प्रकार का योगदान है। एक बार खरीदकर पढ़िए तो सही...।

आप सोच रहे होंगे कि मैं फिरसे विज्ञापन करने लगा...। तो जरूर सोचिए क्योंकि मैं ऐसा ही कुछ कर रहा हूँ और मैं ऐसा करना बुरा नहीं मानता। पुस्तकों का बाजार कितना कमजोर और उपेक्षित है इसका जिक्र अनेकशः कर चुका हूँ। आगे भी इस चिन्ता को जाहिर करता रहूंगा और पुस्तकों के प्रति लोगों में प्रेम भाव जागृत करने के लिए जो बन पड़ेगा वह भी करता ही रहूंगा...।

संगोष्ठी समाप्त होने के बाद मैने सब काम छोड़कर अन्तर्जाल पर पोस्ट के रूप में आने वाली प्रतिक्रियाओं को टिप्पणियों-प्रतिटिप्पणियों  को पढ़ता रहा, मुझे अपनी ओर से किसी सफाई की जरूरत नहीं पड़ी। (एक जगह केवल यह बताना पड़ा कि नामवर जी उस वि.वि. के कुलाधिपति हैं।) इतने समझदार और जानकार लोग इस मंच को आलोकित कर रहे हैं कि सबकुछ शीशे की तरह साफ होता चला गया। कल समीर जी ने जब पुल के उस पार से इलाहाबाद का दर्शन किया तो हठात्‌ मेरे भावों को निरूपित करती कविता निकल पड़ी-

मैं इसलिये हाशिये पर हूँ क्यूँकि

मैं बस मौन रहा और

उनके कृत्यों पर

मंद मंद मुस्कराता रहा!!

-समीर लाल ’समीर’

 

इस मौन ने मुझे ऐसा घेरा कि इस गोष्ठी की अनेक यादगार तस्वीरें आपको दिखाना भूल गया। आज कुछ ऐसे चेहरे लगा रहा हूँ जिन्हें नये-पुराने सभी ब्लॉगर देखना चाहेंगे। कोई मानक क्रम निर्धारित नहीं किया है, बस एलबम से जो जहाँ मिला वहीं से उठा लिया है:

वी.एन.राय प्रो.नामवर सिंह राकेश जी, OSD
अनूप जी ‘फुरसतिया’  प्रियंकर जी.. रवि रतलामी
सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’ हर्षवर्धन त्रिपाठी  अजित बडनेरकर
गिरिजेश राव विनीत कुमार विजेन्द्र चौहान ‘मसिजीवी’
अफ़लातून भूपेन सिंह इरफान
संजय तिवारी ‘विस्फोट’  यशवन्त ‘भड़ासी’ अविनाश ‘मोहल्ला’
हेमन्त कुमार डॉ. अरविन्द मिश्र हिमांशु पाण्डेय
 वर्धा की शोध छात्रा मीनू खरे  मनीषा पांडेय
समरेन्द्र ‘मोहल्ला’ वाले अखिलेश मिश्र ‘बोधिसत्व’ ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

इस मौके पर कुछ महारथियों ने अपने ‘लोटपोट’ के साथ त्वरित पोस्ट ठेलने का काम किया और अभय तिवारी की लघु फिल्म सरपत का प्रदर्शन भी हुआ। बेहद उम्दा फिल्म है। जरूर देखने लायक।

त्वरित प्रसारण

चिट्ठाकारी की दुनिया में ‘सरपत’

 लघु फिल्म ‘सरपत’ का प्रसारण अन्त में इतना ही कि २३-२४ अक्टूबर के बाद हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया में कुछ नयी बातें होने लगी हैं। मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

24 comments:

  1. राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन के लिए आप को बहुत बधाई। आप के इस संकल्प पर बहुत प्रसन्नता हुई कि जब भी आगे अवसर मिलेगा आप ऐसे कार्यक्रम आयोजित करेंगे। हर काम की अपनी उपलब्धियाँ होती हैं। बड़े आयोजन में कुछ त्रुटियाँ होना भी स्वाभाविक है। हमें उपलब्धियाँ देखनी चाहिए और आगे प्रयत्न करना चाहिए कि पुरानी त्रुटियाँ न हों, नयी के लिए तो फिर भी अवसर बना रहेगा। इस संगोष्ठी ने हिन्दी ब्लाग जगत में बहुत कुछ बदला है। यह भी कि ब्लाग जगत पर अब साहित्य के प्रेमियों का आना भी बढ़ेगा। ब्लागों के पाठक भी बढ़ेंगे।

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  2. वाकई बहुत बड़ा आयोजन और उपलब्धि रहा है ईलाहाबाद सम्मेलन।छोटी-मोटी,खट्टी-मीठी बातों को भूल कर फ़िर से लग जाईये दूसरे सम्मेलन की तैयारियों मे।पिछ्ली बार तो आ नही पाये इस बार ज़रूर आयेंगे।और हां आपका ये प्रयास मील का पत्थर साबित होगा इसमे रत्ती भर भी शक़ नही है।

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  3. इससे बेहतर क्या हो सकता था वो आगे देखेंगे। मगर इसमें खराब क्या था, यह न तो वहां दिखा और न अब खोजेंगे। समाहार बढ़िया रहा। निश्चित ही आयोजन सफल था। अप्रिय कुछ नहीं था। इसकी चर्चा भी खूब हुई। चर्चा के सुरों पर न जाएं, बेसुरे गान की टेक भी वर्धा-इलाहाबाद ही थी और सुरीले गान की भी। सो तमाम चर्चाओं को भी आयोजन की सफलता का ही आयाम मानता हूं।
    आपको फिर बधाई...

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  4. निश्चित रूप से यह आयोजन हिन्दी ब्लागिरी के इतिहास में एक मील का पत्थर है किन्तु जाहिर है अंतिम नहीं है इसलिए बेहतरी की बड़ी गुजायिश है और इस दिशा में सतत सक्रियता श्लाघनीय है -आशा है आयोजन के कुछ दुर्बल पहलुओं को नोट कर उनकी पुनरावृत्ति न हो इसका ध्यान रखा जाएगा -वैसे कोई बहुत हिम्मती या मूढ़ ही जल्दी ऐसा साहस कर सकेगा -और हाँ संयोजन में कैप्टन एक ही तो ज्यादा उचित है -दो कप्तानों वाली पोतें डूबती हैं ,यह तो बड़े भाग्य से किनारे आ लगी -भविष्यगत संदर्भों हेतु चित्रों की संक्षिप्त विवरणिका भी -नाम और ब्लॉग -डालना चाहें .

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  5. अच्छा, रसदार, शानदार कार्यक्रम रहा। कई बातें हैं जो, यहां से निकली हैं ब्लॉगिंग की चर्चा में तो हमेशा यहां की चर्चा जगह बना गई।

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  6. चार दिवसीय इन्टरनेट खराबी के बाद आप आपके ब्‍लाग पर आना हुआ, आज से चार दिन पहले एक पोस्‍ट लिखी थी, आज उसे पोस्‍ट करने का सही समय है भी नही यही सोच रहा हूँ।

    पोस्‍ट पर ज्‍यादा क्‍या कहूँ किन्‍तु अन्तिम के ये वाक्‍य कि अन्त में इतना ही कि ''२३-२४ अक्टुबर के बाद हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया में कुछ नयी बातें होने लगी हैं। मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।'' मुझे प्रभावित कर रहे है। आपके जज्‍़बे को सलाम

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  7. आलोचना और शाबाशी तो चलती रहेगी पर इसमें संदेह नहीं कि यह एक ऐतिहासिक संगोष्टी थी। इसका प्रमाण यही है कि इसकी चर्चा इतने दिन तक चलती रही। कमियां/खामियां निकालने वाले तो तिल का ताड़ बनाते रहेंगे परंतु आशा है कि ऐसी संगोष्ठियां आनेवाले दिनों में अधिकाधिक होंगी... सभी राज्यों के ब्लागर इस से प्रेरणा लेंगे॥ आयोजकों को पुनः बधाई॥

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  8. अरविन्द जी,
    चित्रों पर कर्सर ले जाने पर कैप्शन / नाम दिखाई दे रहा है। कोशिश तो करिये ......

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  9. आपके सुखानुभूति का अनुमान लगा सकती हूँ......जब विवरण पढना ही इतना सुखद लगा तो कार्यक्रम का सञ्चालन और सुखद समापन कितना उत्साह्दायी होगा अनुमानित करना कठिन नहीं...

    आपने यहाँ जो चित्र प्रस्तुत किया है,यदि उसके साथ वक्ता का नाम भी उल्लिखित कर दें तो बड़ा अच्छा रहेगा...

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  10. बहुत सुंदर लगा भाई ,कार्यकर्म मै तो नही आ पाये लेकिन आप के चित्र से ऎसा लगा कि हम भी वही कही थे,धन्यवाद

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  11. बेनामी फोटुओं पर कर्सर ले जाने पर नाम दिख रहे हैं। अंतिम फोटो को भी नाम दे दो।

    गोष्ठी की बातें कब प्रकाशित हो रही हैं? लोगों को पता चलना चाहिए कि वहाँ मौज और मजूरी(क्रय किए गए ब्लॉगर ;) ) के अलावा भी बहुत सी बातें हुई थीं। आखिर दो दिनों तक लगातार सिर्फ मौज तो नहीं हो सकती न !
    __________________
    अब एक सेकुलर लेख दे डालो। मेरा मतलब संगोष्ठी से अलहदा।

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  12. इतने भारी भरकम विवादों और टिप्पणियों के बीच आप जिस तरह सहज और शांत रहे वह प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है सिद्धार्थ जी.आपके हौसलें और कार्य ऊर्जा ऐसे ही बने रहें, यही कामना है.

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  13. ummid kiya tha ki koi aisa din aayega,par socha na tha itna jaldi sambhaw ye sab ho payega,, kafi khushi hui is safal aayojan ki kahani padhkar,lekin hogi khushi kahi aur mujhe aise aayojan ka pratakshdarshi bankar. ummid karta hun ki allahabad me aisa aayojan fir ho aur mai bhi usme samil ho paun. is safal aayojan ke shrey aur prey ke roop me aapko dher sari badhiyan.........

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  14. गिरिजेश भ‍इया, आपके आदेश का पालन हो चुका है, आंशिक ही सही। ‘सरपत’ के प्रसारण की एक और फोटू लगा दी है। :)

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  15. सिद्धार्थ जी,
    आपके इस संकल्प से कि "मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।" बड़ी प्रसन्नता हुई। आशा करता हूँ इस बार आप एक कदम आगे बढ़ कर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करेंगे। हो सकता इस समय यह खामखयाली लगे लेकिन जब होगा तो इसे भी लोग देखेंगे। आपके धैर्य और साहस की प्रशंसा करता हूँ। आदरणीय अरविन्द मिश्र जी यही निवेदन करूँगा कि ’कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती है’
    सादर!

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  16. अरे भई....जब भी कहीं कोई छोटा सा भी आयोजन होता है तो उस पर तमाम तरह की बातें उतरने छितरने लगती हैं..फिर यह तो ब्ल़ॉगिंग का कुंभ संस्करण सा था....नागा ब्लॉगर...बिना नागा ब्लॉगर....

    सभी लोग जब जमा होंगे तो कुंभ के प्रथम स्नान के लिये भगदड तो मचेगी ही।

    यही तो हुआ था शायद पहले दिन....हर कोई पहले बोलना चाहता था...देर तक बोलना चाहता था ( जहां तक मैंने यत्र तत्र पढा है... खुद तो मैं था नहीं वहां) .....इसलिये पहले दिन को नागा साधुओं के स्नान के रुप में ही समझा जाय।

    बाकी सब तो चलता ही रहता है। और हां, इस तरह के आयोजन करना आसान नहीं...तब तो और...जब एक से एक नागा ब्लॉगर हों :)

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  17. बहुत अच्‍छे चित्र हैं .. इसकी सफलता के बाद आपके द्वारा एक और आयोजन किए जानेकी बात सुनकर अच्‍छा लगा .. उसका इंतजार रहेगा .. आपकी पुस्‍तक के प्रकाशन के लिए बधाई !!

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  18. नागा ब्लागरो का शाही स्नान पहले ही दिन रख दिया गया था सो थोडी सी अफरा तफरी हो गयी थी आपके हौसले और जोश को जय हो कहने को दिल कर रहा है जो आपने दिखाई है

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  19. "मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।..सिद्धार्थजी,पूरे आयोजन में आफकी सक्रियता और दिलचस्पी का मैं कायल हूं। इस कार्यक्रम की आलोचना करनेवालों में मैं भी शामिल हूं। वो इसलिए नहीं कि मैं आपलोगों के प्रयासों को नजरअंदाज करके कोई नयी बात करने की कोशिश कर रहा हूं। बल्कि सिर्फ इसलिए कि अगर हमारे इस तरह से लिखे जाने से आनेवाले समय के आयोजन बेहतर हो सकते हैं तो हम सब के लिए बहुत सुखद होगा। हम तमाम बातों के वाबजूद इस बात का श्रेय आप सबों को देना चाहेगे कि आपने इस तरह के आयोजन कराकर हम ब्लॉगरों का मान बढ़ाया है,उत्साहित किया है।
    मैं तो वापस दिल्ली आकर वापस अपने काम में जुट गया,मुझे नहीं पता कि मेरी रिपोर्टिंग और कही गयी बातों को महात्मा गांधी विश्व. और हिन्दुस्तानी एकेडमी के लोगों ने किस रुप में लिया लेकिन इतना जरुर कहना चाहता हूं कि इसी बहाने हम एक स्वस्थ आलोचना पद्धति का विकास कर सकें तो हिन्दी समाज के लिए शायद ही इससे कुछ बेहतर हो सकेगा। आपके सौम्य व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हूं।.
    विनीत

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  20. सेमिनार के सफ़ल आयोजन पर बधाई. मै तो खैर पीछॆ ही बैठ कर चुपचाप सब देखता, सुनता रहा . यह विचार भी आया कि हिन्दी ही नही बल्कि क्या किसी भी भाषा मे ब्लाग पर कोई सम्मेलन विश्व मे कही हुआ है . मेरा अभी भी मानना है कि ब्लाग १८ शताब्दी के ’पिरिआडिकल एसे ’की तरह ही भविष्य मे होगे, और यह सम्मेलन इतिहास मे दर्ज होगा.

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  21. मैं इसलिये हाशिये पर हूँ क्यूँकि

    मैं बस मौन रहा और

    उनके कृत्यों पर

    मंद मंद मुस्कराता रहा!!

    Mein Bhi to do din सेमिनार mein मौन raha.
    Aur blog par bhi is bare mein मौन hoon.

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  22. सिद्धार्थजी मेरा अभाग्य ही रहा की आप से बात करने के बाद हर एक टाइम टेबल ट्राई किया पर ,महासंगम और न्यूयार्क की उडान के बीच सानिध्य ,समागम न बैठा पाया .मन मसोस कर रह जाना पड़ा .रिपोर्टिंग तो करीब करीब विनीत से लेकर सभी की ,इस बीच लगातार पढता रहा ( कुछ एक पर कुढ़ता भी रहा ) पर व्यक्तिगत रूप से जो आनंद आता ,सब से मिल कर ,उस से वंचित होने का अफ़सोस तो बना ही रहेगा .
    खैर यह तो रही व्यक्तिगत भावना.लेकिन आपकी पोस्ट पढ़ और आपकी स्थितिप्रज्ञता देख आनंद हुआ . मन में यही बात आती रही की आयोजन की इतनी मेहनत के बाद पुरस्कार में जो तमगे { :) } मिले वे कहीं आपको उद्धिग्न तो न कर दें. पर लगता है की आपने गीता और बाबा तुलसीदास दोनों को पढ़ा ही नहीं आत्मसात भी कर लिया है ..........और निंदक नीयरे राखिये........वह भी सीख ही है और सहयोग ही है एक प्रकार का .सभी को मन से साधुवाद ही दें और आप तो सब से बड़े साधुवाद के अधिकारी हैं ही .
    ...................................
    [ मुझे ' तड़का ' पर लिखने का कुछ मसाला भी मिल गया है ,यहाँ थोड़ी सी फुर्सत भी ,तो बघारी दाल का थोडा इन्तेज़ार कर लें ,जल्दी ही परोसता हूँ . ये कोलाहल तो ख़त्म हो पहले ,फिर .उम्मीद है आपकी थोड़ी थकान मिट जायेगी :) ]

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