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Monday, January 19, 2009

श्रीमन्‌! यूँ ही घिसटने दें...?

 

red tape कार्यालय में रोज की ही तरह सामान्य काम-काज चल रहा था। मैं कुछ देयकों (bills) का परीक्षण करके उन्हें नियमानुसार भुगतान हेतु पारित कर रहा था। बीच-बीच मे अपनी समस्या लेकर आने वाले बुजुर्ग पेंशनर्स की सुनवायी और उनका निपटारा करता जा रहा था। किसी की पेंशन बैंकखाते में नहीं पहुँची तो लाल-पीला होता पहुँच गया। दरियाफ़्त करने पर पता चला कि एक बैंक-स्टाफ के छुट्टी पर जाने से पोस्टिंग में एक दिन विलम्ब हो गया है।

किसी ने जीवित होने का प्रमाणपत्र समय से जमा नहीं किया तो पेंशन रुक गयी। इसकी नाराजगी भी ट्रेजरी पर ही उतारने आ गये। उन्हें हाथ जोड़कर समझाना है कि आपने ‘जिन्दा होने का सबूत’ नहीं दिया इसलिए पेन्शन रोकनी पड़ी। किसी पेन्शनर की मृत्यु हो जाने की सूचना लेकर आने वाले सिर मुड़ाये उनके पुत्र या उदास आँखों में आँसू लिए आकर खड़ी हुई उनकी विधवा जिन्हें ढाढस बँधाते हुए सरकारी कायदे के अनुसार अग्रिम कार्यवाही के बारे में समझाना है,

...वेतन आयोग द्वारा बढ़ायी गयी पेन्शन अब कितनी हो गयी यह जानने कि उत्सुकता लिए भी बहुत लोग आ रहे हैं। इन्हें एक ही जवाब देना था कि ‘अपने बैंक खाते से जाँच लें’। ...लेकिन ऑफिस तक मेहनत करके आ ही गये तो यहीं से जान कर जाएंगे जी। भले ही हमारे लिए पच्चीस हजार की लिस्ट से देखकर बताना कितना भी कठिन हो। कोर बैंकिंग स्कीम (CBS) और कम्प्यूटरीकरण का लाभ उठाने के लिए कोई तैयार ही नहीं दिखता यहाँ। बहुत से बुजुर्ग ट्रेजरी स्टाफ की शिकायत लेकर भी आते हैं ताकि साहब उन्हें समझाकर, निर्देश देकर या डाँट-फटकार कर काम जल्दी करा दें।

...यह सब रुटीन में रोज ही होता रहता है।

लेकिन पिछले दिन एक ऐसे सज्जन आये जिनकी समस्या थोड़ी अलग थी। एक प्रदेश सरकार में चीफ इन्जीनियर के पद से अठारह साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे। देखने में प्रभावशाली व्यक्तित्व था। मुख मुद्रा से सम्पन्नता और सन्तुष्टि का भाव झलक रहा था। कमरे में दाखिल होकर अभिवादन के बाद कुर्सी खींचकर शान्तिपूर्वक बैठ गये। कदाचित्‌ मेरी व्यस्तता को देखकर कुछ कहे बगैर बैठे रहे और मैं अपना कागजी काम निपटाता हुआ बीच-बीच मे ‘घोड़े पर सवार होकर आने वालो’ की सुनवायी कर यथोचित निस्तारण करता रहा।

...उनके पन्द्रह-बीस मिनट के मौन के दौरान मुझे यह याद आ गया कि ये कुछ दिन पहले भी आए थे। किसी महिला पेन्शनर की आयु के सम्बन्ध में कोई कागज दिखा रहे थे जिसे ट्रेजरी के लेखाकार महोदय मानने को तैयार नहीं थे। मैने तब सम्बन्धित पटल सहायक (लेखाकार) को बुलाकर ‘नियमानुसार कार्यवाही’ करने का निर्देश दे दिया था...।

मैने कागजों में से सिर उठाकर उनसे अपनी बात कहने का संकेत किया तो इत्मीनान दिखाते हुए उन्होंने मुझसे अपने हाथ का काम निपटा लेने का इशारा किया और बैठे रहे। इस भाव से कि वे एक छोटी सी बात व्यक्तिगत अनुरोध के रूप में मेरे खाली हो जाने के बाद कहना चाहेंगे। मैने मेज पर रखी सभी फाइलों और देयकों  को निस्तारित किया और फिर उनकी ओर उन्मुख हुआ। मैने पूछा - “आपकी माता जी का प्रकरण सुलझ गया कि नहीं?”

उन्होंने लगभग झेंपते हुए से कहा - “मैं कोई शिकायत लेकर नहीं आया हूँ। बल्कि मैं तो यह अनुरोध करने आया हूँ कि उस मुद्दे पर उस बाबू को आप कुछ भी मत कहिएगा। रुटीन में जैसा भी होगा उसे उसी तरह होने दीजिएगा। ...प्रकरण मेरी माता जी का नहीं बल्कि मेरी भाभी जी का है जिनके लिए दौड़-धूप कर मदद करने वाला कोई नहीं है।”

मैंने इस बात के निहितार्थ को समझ पाने में असमर्थता जतायी तो बोले-“आपने उस दिन उस बाबू की बात काट दी थी और हमारे पक्ष में अपनी सहमति देते हुए उसे कुछ निर्देश दिये थे। ...”

हाँ तो? आपकी बात ठीक रही होगी तो मैने मान लिया होगा।”

“जी हाँ, बात तो यही है लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप उसे अब अलग से ‘प्रेस’ न करें।”

“क्यों?” मैं सचमुच भ्रमित हो गया था।

इसपर वे चुप लगा गये। ...मैं विस्मय से उन्हें देखने लगा। ...इन्हें सिफारिश को वापस लेने की जरूरत क्यों आ पड़ी? इन्हें तो खुश होना चाहिए कि इनका काम ‘असरकारी’ तरीके से होने जा रहा है। लेकिन ये तो उल्टी रीति अपना रहे हैं?

दरअसल छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों में अधिक उम्र के पेन्शनर्स को कुछ अतिरिक्त पेन्शन देने की बात कही गयी है। अस्सी वर्ष से ऊपर की आयु होने पर पेंशन में कुछ प्रतिशत की वृद्धि करने का प्रस्ताव है। इस नये प्राविधान से अब पेन्शनर की जन्मतिथि बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है। यहाँ एक दिक्कत ये है कि अपने पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेन्शन प्राप्त कर रही अनेक बुजुर्ग महिलाओं की जन्मतिथि पेन्शन के रिकार्ड्स में उपलब्ध नहीं है। अबसे अस्सी साल पहले पढ़ाई से कोसों और नौकरी से योजनों दूर रहने वाली महिलाओं की साक्षरता और उनकी जन्मतिथियाँ सहेज कर रखने की प्रायिकता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कार्यालय में ऐसे मामलों पर निर्णय लेने के लिए अभी औपचारिक नीति बनायी जानी है।

ऐसे में यदि किसी महिला के पास जन्मतिथि के विश्वसनीय प्रमाण सरकारी दस्तावेजों में उपलब्ध हैं तो उनके तार्किक परीक्षण के बाद सही पाये जाने पर इस लाभकारी योजना का लाभ उसे दिया ही जाना चाहिए। न कि अन्य के लिए नीति बन जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इसी अवधारणा के अन्तर्गत मैने उनके मूल प्रमाणपत्र देखकर उक्त लाभ देने का निर्देश दे दिया था।

मैने उनके इस विचित्र अनुरोध पर अपनी उलझन शान्त करने के लिए जब उन्हें कुरेदा तो वे बोले - “मैंने सरकारी ‘सिस्टम’ बहुत देखा है। ...यहाँ रुटीन से ही चलना ठीक है।”

मैंने अपने ‘प्रो-एक्टिव एप्रोच’ का उत्साह ठण्डा होता देखकर  फिर जिज्ञासा जाहिर की तो उन्होंने समझाया - “...असल में आज तो आप डाँट-डपटकर मेरा काम करा देंगे लेकिन भविष्य में हमेशा तो उन्हीं से काम पड़ेगा। ...अगर बाबू जी बिदक गये तो कभी न कभी परेशान करने का मौका पा ही जाएंगे। ...फिर तो मेरी बुजुर्ग भाभी जी को लेने के देने पड़ जाएंगे। ...इसलिए पूरे आदर और सम्मान के साथ मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसे ऐसे ही चलने दें।”

मैं असमन्जस में हूँ कि क्या करूँ? इसे ऐसे ही छोड़ दूँ? उस पेन्शनर का काम प्राथमिकता के आधार पर निजी देख-रेख में पूरा करा दूँ? उस बाबू के बारे में सुप्रीम बॉस को बताकर कोई निरोधात्मक कार्यवाही प्रस्तावित करूँ? या उसे खुद ही समझाने का प्रयास करूँ? ऐसे में कहीं सचमुच बुरा मान गया तो? 

कोई मैनेजमेण्ट गुरू मार्गदर्शन देंगे क्या?

[ऊपर का चित्र www.citizenarcane.com से साभार लिया गया है। आपत्ति की सूचना प्राप्त होने पर सहर्ष हटा लिया जाएगा।]

(सिद्धार्थ)

13 comments:

  1. मुझे तो लगा था कि अब तक ट्रेज़री जैसी महत्वपूर्ण कार्यस्थली कम्प्यूटरीकृत हो गई होगी और २५००० रिकार्ड में से एक रिकार्ड खोजने में कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती होगी.

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  2. मैं असमन्जस में हूँ कि क्या करूँ? इसे ऐसे ही छोड़ दूँ? उस पेन्शनर का काम प्राथमिकता के आधार पर निजी देख-रेख में पूरा करा दूँ? उस बाबू के बारे में सुप्रीम बॉस को बताकर कोई निरोधात्मक कार्यवाही प्रस्तावित करूँ

    "इस घटना या समस्या को यहाँ प्रस्तुत करना ही इस बात का संकेत है की आप चैन से नही बैठ पा रहे हैं और इस मामले मे आप उनकी मदद करना चाहते हैं ...अगर आप निजी देख रेख मे कोई कदम उठा सकें तो भी अच्छा होगा वरना अपने बोस को कह कर उनकी कुछ ना कुछ सहायता कर सकतें हैं और आत्म संतुष्टि भी..."
    Regards

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  3. समीर जी, ट्रेजरी पूर्णतः कम्प्यूटरीकृत हो गयी है। सारा काम कम्प्यूटर से ही होता है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर की रीति से सबके बैंख खातों में पेन्शन और वेतन भेंजा जाता है।

    लेकिन हमारे उपभोक्ता यानि पेन्शनर उस खाते को देखकर सन्तुष्ट नहीं होते जब तक ट्रेजरी से मूल फाइल (hard-copy) देखकर तसल्ली नहीं कर लेते।

    ट्रेजरी के पुराने कर्मचारी भी सूचना तकनीक का प्रयोग करने में थोड़ा तंग हाथ रखते हैं। :)

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  4. सच कहूँ तो उन महाशय की चिंता स्वाभाविक है ..हमने भी अपने एक दोस्त के मार्फ़त अपने मकान कला नक्शा पास कराने के लिए सम्बंधित ऑफिस भेजा ....उनके मुताबिक हमें कोई ऊपर के पैसे देने की जरुरत नही पड़ेगी....हमारे अर्कीटेट के यहाँ काम करने वाले लड़के ने कहा ....आपका काम देर से होगा .या होगा भी तो उसमे कुछ कमी दिखलाई जायेगी.....कुछ पैसो की तो बात है दे दीजिये....एक आदमी आपका जानने वाला है पूरा स्टाफ तो नही...... उसने सच कहा था.......
    हरियाणा में मेरे एक प्रिय मित्र ने देवीलाल ओर दूसरी सरकार में अन्तर बताया ....पहले पैसे लेकर केवल जाटो का ही काम वक़्त पर होता था.......अब बाकी लोगो से पैसे भी लिए जाते है पर काम जाटो का भी देरी से होता है.....

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  5. जिस देश के अधिकाँश व्यक्ति अविश्वसनीय हों, हर किसी के पास विश्वास तोड़ने का या किसी द्वारा टूटने का रेकॊर्ड हो, उस देश में समस्या वस्तुत: व्यक्ति की आस्था के क्षरण की है, ऐसे में वे लोग कागज पर अपनी आँख के सामने लिखे को प्रमाण/सबूत/गवाह के रूप में प्रत्यक्ष देखने को ही अपनी आश्वस्ति का आधार पाते/मानते हैं; क्योंकि मशीन के अन्दर क्या आँकड़े हैं, यह उनकी समझ व गवाही से परे की चीज है, जो उन्हें आँखिन देखी-सा आश्वस्त नहीं करता।

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  6. सिद्धार्थ जी
    इस देश की समस्‍या यदि कोई है तो वह है नौकरशाही। राजनेता भी इन्‍हीं गलियारों से गुजरकर ही बेईमान बनते हैं। इंजीनियर साहब जानते हैं कि ऑफिस में बाबू ही सब कुछ होता है अत: डरे हुए हैं। यह प्रतिदिन की समस्‍या है इसे मिटाने के लिए आधुनिक तकनीक ही का सहारा है। जैसे ही हम कम्‍पयूटर से जुड़ जाएंगे सारे ही भ्रष्‍टाचार स्‍वत: ही समाप्‍त हो जाएंगे।
    अजित गुप्‍ता

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  7. बाबु और बड़े बाबुओं के चक्कर में न पड़ना पड़े तो ही भलाई है :-)

    हम क्या सलाह देंगे. एक स्टेट बैंक में तो काम करा नहीं पाते हैं. दो-तीन बार गए अंत में गुस्सा के गरियाते हुए लौट आए. जो एक बार भी बाबूगिरी भुगत चुका है वो तो वही कहेगा जो उन सज्जन ने कहा है.

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  8. दिल बहुत दुखता है, ऎसे केसो पर , लेकिन क्या करे, हां सगर इन सज्जन मे हिम्मत है तो लडे इस सिस्टम से उस बाबू से, ओर अगर आप मे भी हिम्मत है तो आप भी कमर कस के लडे... लेकिन इस लडाई मै आप का नुकसान भी हो सकता है, क्योकि जहां सब एक जेसे हॊ वहा.... न्याय की उम्मीद आंधी मे दीपक जलाने के बराबर होती है....
    इस लिये हम सब की राय के अलावा आप भी अपने ओर उन सज्जन के हालत के अनुसाअर ही काम करे.
    लेकिन अगर सभी ऎसे ही होगे तो देश मै कब ईमान्दारी आये गी, ओर केसे????

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  9. बात उन सज्जन की भी अपनी जगह एकदम वाजिब है और आपकी प्रो-एक्टिव एप्रोच भी। समस्या बस इतनी है कि आम आदमी अपने त्वरित लाभ के लिये कहीं-कहीं सामाजिक कर्तव्यों को ताक पर रख देता है। परंतु इस बात के लिये उन सज्जन को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि आप या आप जैसा कोई और प्रो-एक्टिव अधिकारी टेम्परेरी होता है और ये बाबू परमानेंट प्रजाति के जीव हैं।

    बहुत दिनों बाद पढ़ा। फील-गुड हो रहा है।

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  10. ये विशिष्ट अनुभव नहीं हैं बल्कि सामान्य ढर्रा यही है। सरकारी तौर-तरीका, अति सक्रियता, नियमपालन आदि बातें इस ढर्रे की राह में रोड़े जैसी हैं सो जैसा चलता है, चलने दीजिए की सोच पनपती है। यूं कई बुजुर्गों को, महिलाओं को अपने अधिकारों और नियमपालन के लिए अड़ते भी देखा है। सबकी अलग स्थिति-अलग स्वभाव है।
    वैसे बुजुर्गों को भी बाबूजात परेशान कर सकते हैं, सोच कर ही अजीब लगता है।

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  11. कोर बैंकिंग स्कीम (CBS) और कम्प्यूटरीकरण का लाभ उठाने के लिए कोई तैयार ही नहीं दिखता यहाँ।
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    यह सीन बदलेगा, और अपेक्षा से पहले ही।

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  12. Main to ek baat janata hun ki ladai uske liye ladi jaati hai jo uske liye taiyar ho. Un sajjan ne to pahle hi surrender kar walkover de diya tha to unke liye kyon tanav liya jai. Unka vivran bhi yehi impression deta hai ki woh is system mein tap kar,usa upyog karke, madhyam bana kar hi bade adami bane honge , to aise mein to woh usi ki tarafdaari hi karenge!

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  13. बुजुर्ग भुक्तभोगी हैं, जानते हैं कि बिदके बाबू से काम निकलवाना टेढ़ी खीर होगा।
    घुघूती बासूती

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