हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Friday, November 28, 2008

उफ़्‌... ये क्या हो रहा है?


ॐ शान्तिः।

कोई शब्द नहीं हैं...।
बस...।
अब बहुत हो चुका...।

Tuesday, November 25, 2008

यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है?

आलोक पुराणिक जी ने इस रविवार को अगड़म-बगड़म में भारत की शिक्षा व्यवस्था की तृस्तरीय दशा को अमेरिका, मलेशिया और बांग्ला देश के समतुल्य समानान्तर क्रियाशील बताते हुए एक अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। एक ही देश में अनेक तरह की समानान्तर व्यवस्थाओं का चित्रण इस विडम्बना पर सोचने को मजबूर कर देता है। शिक्षा प्रणाली में व्याप्त एक और विडम्बना की ओर मेरा ध्यान बरबस जाता रहता है जिसे मैं आप सब के समक्ष रखना चाहता हूँ।

यह प्रश्न मेरे मन में अपने व्यक्तिगत अनुभव और अपनी आँखों-देखी सच्चाई से उद्भूत हुआ है। शायद आपने भी ऐसा देखा हो। यदि आपकी नजर में वस्तुस्थिति इससे अलग हो तो उसे यहाँ अवश्य बाँटें।

मुझे अपनी पढ़ाई के दिनों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के सरकारी प्राइमरी स्कूल (प्राथमिक पाठशाला), निजी प्रबन्ध तंत्र द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मन्दिर, राजकीय अनुदान प्राप्त अशासकीय (निजी प्रबन्ध) विद्यालय, पूर्णतः राजकीय इण्टर कॉलेज और (स्वायत्तशासी) इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन करने का अवसर मिला है। नौकरी में आने के बाद बारी-बारी से प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा की सरकारी मशीनरी के भीतर काम करने का मौका भी मिला है। इस दौरान अपने आस-पास के निजी क्षेत्र की शिक्षण संस्थाओं में भी जाना हुआ है।

यह सब बताने का कारण सिर्फ़ ये है कि अपने निजी अनुभव के आधार पर मेरी यह धारणा पुष्ट होती गयी है कि “शिक्षा के क्षेत्र में जो ‘सरकारी’ है वह ‘असरकारी नहीं’ है।” आप अपने आस-पास नजर दौड़ाइए तो सहज ही इसकी सच्चाई सामने आ जाएगी। मेरी बात ‘अमेरिका टाइप’ संस्थानों के बजाय मलेशिया, बांग्लादेश और ‘सोमालिया टाइप’ संस्थानों तक सीमित रहेगी, जिनकी इस देश में बहुतायत है।

आप गाँव-गाँव में खोले गये प्राथमिक स्तर के सरकारी स्कूलों की तुलना गली-गली में उग आये प्राईवेट नर्सरी स्कूलों या तथाकथित साधारण ‘कान्वेन्ट स्कूलों’ से करके देखिए। एक सरकारी अध्यापक को जो वेतन और भत्ते (१० से २० हजार) सरकार दे रही है उसमें किसी साधारण निजी नर्सरी स्कूल के आठ-दस अध्यापक रखे जा सकते हैं। लेकिन शिक्षण कार्य के घण्टों की गणना की जाय तो स्थिति उल्टी हो जाएगी। एक सरकारी प्राथमिक शिक्षक एक माह में कुल जितने घंटे वास्तविक शिक्षण का कार्य करता है, प्राईवेट शिक्षक को उससे आठ से दस गुना अधिक समय पढ़ाने के लिए आबन्टित है।

सरकार की ओर से नौकरी की सुरक्षा की गारण्टी मिल जाने के बाद सरकारी शिक्षक अपने मौलिक कार्य (शिक्षण) से विरत हो जाते हैं। इसमें एक कारण तो तमाम ऐसी सरकारी योजनाओं को जिमका शिक्षक से कोई संबन्ध नहीं होना चाहिए उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने की कवायद में उन्हें शामिल कर लेने की नीति है, लेकिन जिन्हें कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं दी गयी होती है वो भी इसी बहाने कामचोरी करते रहते हैं।

उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के जिन निजी विद्यालयों के वेतन बिल का भुगतान सरकारी अनुदान से होने लगता है, वहाँ शैक्षणिक गतिविधियों में हालिया सेंसेक्स की तरह गिरावट दर्ज होने लगती है। स्कूल के निजी श्रोतों से वेतन पाने वाले और निजी प्रबन्धन के अधीन कार्य करने वाले जो शिक्षक पूरे अनुशासन (या मजबूरी) के साथ अपनी ड्यूटी किया करते थे, सुबह से शाम तक स्कूल में छात्र-संख्या बढ़ाने के लिए जी-तोड़ मेहनत किया करते थे; वे ही सहसा बदल जाते हैं।

सरकार द्वारा अनुदान स्वीकृत हो जाने के बाद सरकारी तनख्वाह मिलते ही उनकी मौज आ जाती है। पठन-पाठन गौण हो जाता है। उसके बाद संघ बनाकर अपनी सुविधाओं को बढ़ाने और बात-बात में हड़ताल और आन्दोलन करने की कवायद शुरू हो जाती है। मुझे हैरत होती है कि एक ही व्यक्ति प्राइवेट के बाद ‘सरकारी’ होते ही इतना बदल कैसे जाता है। उसकी दक्षता कहाँ चली जाती है?
विडम्बना यह है कि सरकारी स्कूलों में उन्ही की नियुक्ति होती है जो निर्धारित मानक के अनुसार शैक्षिक और प्रशिक्षण की उचित योग्यता रखते हैं; कहने को मेरिट के आधार पर चयन होता है; लेकिन उनका ‘आउटपुट’ प्राइवेट स्कूलों के अपेक्षाकृत कम योग्यताधारी शिक्षकों से कम होता है। ऐसा क्यों?

उच्च शिक्षा का हाल भी कुछ इसी प्रकार का है। मैने कुछ ऐसे महाविद्यालय (degree college) देखे हैं जहाँ सरकार से मोटी तनख्वाह पाने वाले प्राध्यापक महीनों कक्षा में नहीं जाते, छात्रों को परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण दस-पाँच प्रश्न नोट करा देते हैं और बाजार में मिलने वाली कुंजी से उनका बेड़ा पार होता है। एक बार नौकरी मिल जाने के बाद इनका अध्ययन पूरी तरह छूट जाता है, और अध्यापन की जरूरत महसूस ही नहीं कर पाते। मैने तो ३०००० वेतन पाने वाले ऐसे ‘रीडर’ देखें हैं जो किसी भी विषय पर ०५ मिनट बोल पाने में अक्षम हैं। वह भी किसी विद्वत-सभा में नहीं बल्कि अपने ही छात्रों के बीच साधारण गोष्ठी के अवसर पर।

उच्च शिक्षा के सरकारी संस्थानों में प्रवेश और शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर परीक्षा की प्रणाली तक सबकुछ घोर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता जा रहा है। अब तो विश्वविद्यालयों के माननीय कुलपतिगण भी भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों की जाँच का सामना कर रहे हैं और दोषी पाये जाने पर बाक़ायदा बरखास्त किये जा रहे हैं।

इनकी तुलना में, या कहें इनके कारण ही निजी क्षेत्र के संस्थान जबर्दस्त प्रगति कर रहे हैं। यह प्रगति शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्टि से चाहे जैसी हो लेकिन मोटी फीस और दूसरे चन्दों की वसूली से मुनाफ़ा का ग्राफ ऊपर ही चढ़ता रहता है। बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ प्राइवेट स्कूल-कॉलेज का धन्धा बहुत चोखा तो हो ही गया है; लेकिन सरकारी तन्त्र में जगह बना चुके चन्द ‘भाग्यशाली’ (?!) लोगों की अकर्मण्यता और मक्कारी ने इस समानान्तर व्यवस्था को एक अलग रंग और उज्ज्वल भविष्य दे दिया है।

आई.आई.टी., आई.आई.एम. और कुछ अन्य प्रतिष्ठित केन्द्रीय संस्थानों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी रोटी तोड़ रहे अधिकांश शिक्षक और कर्मचारी-अधिकारी अपनी कर्तव्यनिष्ठा, परीश्रम, और ईमानदारी को ताख पर रखकर मात्र सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं। इनके भ्रष्टाचार और कर्तव्य से पलायन के नित नये कीर्तिमान सामने आ रहे हैं। जो नयी पीढ़ी जुगाड़ और सिफारिश के बल पर यहाँ नियुक्ति पाकर दाखिल हो रही है, वह इसे किस रसातल में ले जाएगी उसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

इस माहौल को नजदीक से देखते हुए भी मैं यह समझ नहीं पाता कि वह कौन सा तत्व है जो एक ही व्यक्ति की मानसिकता को दो अलग-अलग प्रास्थितियों (status) में बिलकुल उलट देता है। अभावग्रस्त आदमी जिस रोजी-रोटी की तलाश में कोई भी कार्य करने को तैयार रहता है, उसी को वेतन की गारण्टी मिल जाने के बाद वह क्यों कार्य के प्रति दृष्टिकोण में यू-टर्न ले लेता है?

मैने देखा है कि प्राथमिक विद्यालय में १५००० वेतन पाने वाला अध्यापक चौराहे पर बैठकर गप करने और नेतागीरी में समय काटता है, और ३००० संविदा वेतन पाने वाला अस्थायी शिक्षामित्र एक साथ ३-४ कक्षाओं को सम्हालने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा होता है। इंटरमीडिएट कॉलेज का प्रवक्ता प्रतिमाह २०००० लेकर प्रतिदिन दो घण्टे से अधिक नहीं पढ़ाना चाहता, और उन्हीं कक्षाओं को पढ़ाने के लिए ५००० के मानदेय पर नियुक्त अस्थायी ‘विषय-विशेषज्ञ’ लगातार छः घण्टे पढ़ाने को मजबूर है।

मैं आलोक पुराणिक जी समेत तमाम बुद्धिजीवियों और मनीषियों से यह जानना चाहूंगा कि हमारि आर्थिक प्रास्थिति हमारी सोच को इतने जघन्य तरीके से प्रभावित क्यों कर देती है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Saturday, November 22, 2008

“नहीं, ये सरासर झूठ है…”

“अजी सुनती हो।”

“हाँ जी, बोलिए!”

“लगता है, आज भी कुछ पोस्ट नहीं कर पाउंगा।”

“तो …!?”

“तो…, ये कि मेरी गिनती एक आलसी, और अनियमित ब्लॉगर में होनी तय है…।”

“क्यों? आप क्या खाली बैठे रहते हैं?”

“नहीं ये बात नहीं है… लेकिन ब्लॉग मण्डली को इससे क्या? उसे तो हमारी हाजिरी चाहिए नऽ…”

“इतना टाइम तो देते हैं, ...अभी भी कम पड़ रहा है क्या? ...अब यही बचा है कि हमसब कहीं और चले जाँय और आप नौकरी छोड़कर ब्लॉगरी थाम लीजिए। ...बस्स”

“नहीं यार, वो बात नहीं है। …मेरा मतलब है कि दूसरे ब्लॉगर भी तो हैं जो रेगुलर लिखते भी हैं, नौकरी भी करते हैं और परिवार भी देख रहे हैं…।”

“हुँह…”

“ये सोच रहा हूँ कि ...मेरी क्षमता उन लोगो जैसी नहीं हो पाएगी। यह मन में खटकता रहता है।”

“मैं ऐसा नहीं मानती”

“तुम मेरी पत्नी हो इसलिए ऐसा कह रही हो …वर्ना सच्चाई तो यही है”


“नहीं-नहीं… सच्चाई कुछ और भी है।”

“वो क्या?”

“वो ये कि जो लोग रोज एक पोस्ट ठेल रहे हैं, या सैकड़ो ब्लॉग पढ़कर कमेण्ट कर रहे हैं, उनमें लगभग सभी या तो कुँवारे हैं, निपट अकेले हैं; या बुढ्ढे हैं।”

“नहीं जी, ऐसी बात नहीं हो सकती…”

“हाँ जी, ऐसी ही बात है… जो शादी-शुदा और जवान होते हुए भी रेगुलर ब्लॉगर हैं, उन्हें मनोचिकित्सा के डॉक्टर से मिलना चाहिए”

“नहीं ये सरासर झूठ है…”

“नहीं, यही सच्चाई है, आप शर्त लगा लो जी…।”

(इसके बाद दोनो ओर से नाम गिनाए जाने लगे, …ब्लॉगर महोदय हारने लगे, ...फिर जो तर्क-वितर्क हुआ उसका विवरण यहाँ देना उचित नहीं।थोड़ा लिखना ज्यादा समझना….) :>)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Tuesday, November 18, 2008

संगम तट पर विष्णुमहायज्ञ सम्पन्न...।

तीर्थराज प्रयाग में संगम तट पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन (पिछले वृहस्पतिवार को) एक बहुत बड़े विष्णुमहायज्ञ की पूर्णाहुति हुई। कौशलेन्द्र जी महाराज द्वारा आयोजित इस वृहत्‌ यज्ञ अनु्ष्ठान के लिए पूरे देश से बाल-ब्रह्मचारी यज्ञकर्ता पुरोहितों को आमन्त्रित किया गया था। कुल १०८ यज्ञ मण्डपों की रचना की गयी थी। यज्ञ मण्डप के चारो ओर परिक्रमा पथ पर असंख्य श्रद्धालुओं के बीच चलते हुए मैने अपने मोबाइल कैमरे से कुछ तस्वीरे लीं। आप भी देखिए:-

परिक्रमा पथ पर नर-नारी की अच्छी संख्या थी।

गंगा जी के तट पर फैली पवित्र रेत में फूस से बने पंक्तिबद्ध मण्डप अनुपम छटा बिखेरते हैं।

यज्ञ मण्डप के हवन कुण्ड से उठता धुँवा

परिक्रमापथ पर चहलकदमी

महिलाओं का उत्साह देखने लायक था।

भारी भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिए पुलिस की कोई आवश्यकता नहीं थी।


सभी यज्ञ मण्डप एक ही आकार के कुछ इस तरह के बनाये गये थे।

सभी यज्ञ मण्डपों में एक साथ आहुति के लिए अग्निप्रज्ज्वलित की गयी।



यज्ञ मण्डप के दूसरी ओर दो बड़े
पांडाल बने थे। एक में सैकड़ो आचार्य /पुरोहित रामचरितमानस का अखण्ड पाठ कर रहे थे। दूसरे में व्यास गद्दी से भागवत कथा चल रही थी।

अनुशासित आचार्य व पुरोहित


बताते हैं इस अवसर पर पूरी दुनिया से लाखो श्रद्धालु यहाँ पधारे । अद्‌भुत संगम था। सनातन भारत का एक छोटा रूप गंगा के किनारे उतर आया था। कदाचित्‌ यह भारतीय वैदिक ऋषि परम्परा को आगे बढ़ाने वाला था। काश इस यज्ञ के प्रभाव से गंगाजी की पवित्रता सभी प्रकार के सन्देहों से परे पुनः लौट आए।
(सिद्धार्थ)

Friday, November 14, 2008

कितने सन्तान पर जाओगे मान...?

बात उन दिनों की है जब मैं नेपाल सीमा से सटे पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिले सिद्धार्थनगर में शिक्षा विभाग में तैनात था। कार्यालय में बैठा हुआ एक संस्कृत विद्यालय के आचार्यजी बात कर रहा था। सरकारी काम से निपटने के बाद धर्म-कर्म, संस्कार, परिवार और पुरुषार्थ पर चर्चा शुरू हो गयी। इसी में सन्तान सुख की बात करते हुए मैने अपनी एक साल की बेटी के साथ खेलने से मिलने वाले अनुपम आनन्द का जिक्र कर दिया। पण्डित जी ने अजीब भावुक सा मुँह बनाया और बोले;

“साहब, मुझे तो अपने विवाह के पन्द्रह साल बाद सन्तान के सुख की प्राप्ति हो सकी। वह भी मैने बड़ी तपस्या और जप-तप किया तब जाकर यह दिन देखने को मिले।”

मैने भी सहानुभूति में कहा- “चलिए, देर से ही सही आप बाप तो बन गये न!”

“नहीं-नहीं साहब, वो बात नहीं है…। ‘भवानी’ तो मेरी ‘पाँच’ पहले से ही थीं। मैं तो ‘सन्तान’ की बात कर रहा हूँ”

पहले तो मैं चकराया, कुछ समझ नहीं पाया; या जो कुछ सुना उसपर विश्वास नहीं हुआ; लेकिन जब उसने यह साफ किया कि ‘सन्तान’ की श्रेणी में केवल पुत्र ही आते हैं तो मेरा खून खौल गया। मैने उसे कठोरतम शब्दों में डाँटते हुए फौरन उठ जाने और कमरे से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया। वह तो दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ; लेकिन ऑफिस वाले ऊँची आवाज सुनकर दरियाफ़्त करने मेरे कमरे तक आ गये थे।

आज भी हमारे समाज में ऐसी अधम सोच वाले लोग बचे हुए हैं जो अपने अधकचरे ज्ञान से भारतीय वैदिक साहित्य और ऋषि-परम्परा को बदनाम कर रहे हैं।

यह सब लिखने का तात्कालिक कारण यह है कि सतीश पंचम जी ने सफेद घर पर एक रोचक वाकया पोस्ट किया है। एक महिला अपनी बेटी की शादी में जाने के लिए पहली कक्षा में पढ़ रहे अपने बेटे को स्कूल से छुट्टी दिलाने का कारण बताने में शर्मा रही है। झेंप इस बात की है कि एक के बाद एक पाँच पुत्रियाँ पैदा करने के बाद छठी सन्तान के रूप में बेटा प्राप्त हुआ। इसमें उम्र काफी आगे निकल गयी। नतीजा ये कि बेटे को स्कूल भेंजते-भेंजते बेटी के हाथ पीले करने का वक्त आ पहुँचा।

यह जिस जगह की (मुम्बई?) घटना है वहाँ इसपर लोगों को हैरत है, और कौतूहल भी; लेकिन इधर की गंगा पट्टी (गोबर-पट्टी?) में तो ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। जो क्षेत्र जितना ही पिछड़ा हुआ है वहाँ इस प्रकार के ‘फलदार’ वृक्ष बहुतायत में मिल जाएंगे।

मैं अपने गाँव (जनपद-कुशीनगर, उत्तरप्रदेश) का ही, बल्कि बिल्कुल पड़ोस के घर का उदाहरण बताता हूँ-

इस परिवार को पैतृक सम्पत्ति के रूप में मिली जमीन-जायदाद बँटवारे के बाद बहुत अधिक तो नहीं रह गयी थी; लेकिन फिर भी इसके मालिक श्रीमान् अभी भी अच्छे खेतिहर कहलाते है।

इनकी पहली पत्नी की असामयिक मृत्यु विवाह के कुछ समय बाद ही हो गयी थी। कोई बच्चे नहीं हुए थे। दूसरी शादी हुई तो कमाल ही हो गया…। इस जोड़े की उर्वरा शक्ति आज भी एक किंवदन्ती बनी हुई है। क्यों…? आइए जानें-

विवाह के बाद इनकी धर्मपत्नी पहली सन्तान लड़की हुई तो नाम रखा गया ‘रजनी’; लेकिन सभी उसे प्यार से ‘मण्टी’ बुलाते थे। दूसरी बेटी हुई तो ‘रानी’ कहलायी। तीसरी पर मन थोड़ा चिन्तित होना शुरू हुआ। बे-मन से नाम रखा गया-‘बबली’। फिर चौथी आयी तो सबने सोचकर फैसला किया कि अब बस…! तदनुसार नाम रखा गया- ‘अन्तिमा’। लेकिन पीछे से पाँचवी भी दाखिल हो गयी तो माँ-बाप ने कलेजा मजबूत करके उसे ‘क्षमा’ कह दिया।

इनके मन में बेटे की चाहत थी तो रुकते कैसे? कोशिश जारी रखने का फैसला हुआ। अगली बार भी बेटी ही आयी तो भावुक हो गये… नाम रख दिया- ‘कविता’। उसके बाद एक और प्रयास… लेकिन नतीजा फिर भी वही। भगवान भी इनके धैर्य की परीक्षा लेने पर उतारू थे। इस सातवीं का नाम पड़ा- ‘अनन्ता’। मानो यह सन्देश था कि इनके भीतर आशा, धैर्य, और पुरुषार्थ की कोई कमी नहीं है, यह अनन्त है।

इन सात कन्याओं का पालन-पोषण पूरे स्नेह, वात्सल्य, श्रद्धा, भक्ति और सेवा के भाव से किया गया। कदाचित् इसी से प्रसन्न होकर भगवान ने आँठवें क्रम पर एक पुत्र की कामना पूरी कर दी। फिर क्या था… घर तो घर, सारे इलाके में हर्ष व्याप्त हो गया। दूर-दूर से लोग बधाइयाँ देने पहुँचे। महीनों जश्न मनाया गया। गाँव के जो लोग बाहर रहते थे उन्हें भी बुलाकर दावत दी गयी। मैं भी उनमें से एक था।

पर कहानी यहीं खतम नहीं होती है…। यह साहसी जोड़ा उमंग और उत्साह में इतना मगन हुआ कि खुशी मनाने में ही नौवें की बारी लग गयी। उसका पता चलते ही इन्होंने क्या किया? …कोई ‘ऐसा-वैसा गलत काम’ नहीं किया। …विधाता की इस मर्जी को भी बड़े शौक से इस धरा-धाम पर उतारा गया। एक बार फिर ‘कन्याधन’ में ही बढ़ोत्तरी हुई थी। इसका नाम रखा गया है – ‘सोनालिका’।

आज स्थिति यह है कि ‘मण्टी’ और ‘रानी’ की शादी हो चुकी है; लेकिन ‘सोनालिका’ अभी स्कूल नहीं जा रही है। बताता चलूँ कि यह वही परिवार है जिसकी पिछली पीढ़ी के एक विलक्षण व्यक्तित्व पर मैने ‘ठाकुर-बाबा’ नामक पोस्ट लिखी थी।




लेकिन अभी ठहरिए, इस मसले में कीर्तिमान बनाने के प्रयास में मेरे एक अन्य पड़ोसी (पट्टीदार) थोड़ा और आगे निकल गए हैं। यह बात दीगर है कि ईश्वर ने आखिरी समय तक इनपर वैसी कृपा नहीं की। ये रिश्ते में मेरे बाबा लगते हैं। इन्होंने भी पहली ब्याहता के मर जाने के बाद दूसरी शादी की थी। उससे इन्हें पहले एक पुत्र भी हुआ, लेकिन अकाल मृत्यु का शिकार हो गया। फिर एक के बाद एक पाँच बेटियाँ आ गयीं।

पाँच के बाद उम्र ढलती गयी तो कदाचित् सन्तोष कर गये। लेकिन किसी ज्योतिषी ने ‘पचपन’ की उम्र में बता दिया कि पुत्र-योग बन रहा है। उम्मीद जग गयी कि इस बार बेटा ही होगा। फिर क्या था… सबसे छोटी बेटी दस साल की हो चुकी थी, बड़ी बेटी तीन साल पहले ससुराल जा चुकी थी… लेकिन आशा इतनी बलवती हुई कि फिर सन्धान कर डाला। आधुनिक तकनीक का कोई सहारा लिए बगैर ही मान लिया कि बेटा आ रहा है। मन ही मन स्वागत की ढेरों तैयारियाँ कर डाली।

लेकिन, हाय रे दुर्भाग्य! सबकी आशाओं पर पानी फेरते हुए ‘अनन्या’ ने जन्म लिया। लगभग साठ साल की उम्र में इस छठी पुत्री को पाकर उनका मन कैसा हुआ होगा यह सहज अनुमान का विषय है।

बड़ी संख्या में फैले इन उदाहरणों को देखकर आप क्या कहेंगे? हसेंगे, मुस्कराएंगे या सिर पीट लेंगे। हमारे यहाँ तो इसे भगवान की मर्जी के नाम पर सहज स्वीकार कर लिया जाता है।

मेरे विचार से यह एक तरफ़ तो घोर पिछड़ेपन की निशानी लगती है; लेकिन बेटे की चाह के चक्कर में कोंख में आने वाली बेटियों को भी पैदा करके पालने-पोसने को तैयार ये ‘पिछड़े’ माँ-बाप उन पढ़े-लिखे, आधुनिक और ‘प्रगतिशील’ दम्पतियों से तो बेहतर ही हैं जो गर्भ में आते ही भ्रूण की जाँच कराते हैं, और परिणाम ‘सकारात्मक’ (positive result?) नहीं होने पर उसकी हत्या गर्भ में ही करा देते हैं।

इसी आधुनिक समाज में वे पेशेवर डॉक्टर और तकनीशियन भी हैं जो इस कार्य के बदले मोटी रकम कमाकर आभिजात्य धारण कर लेते हैं। समाज के प्रतिष्ठित लोगों में इनकी गणना होने लगती है।

ग्रामीण भारत के अत्यन्त गरीब, भूमिहीन और कमजोर तबके में बच्चों की पैदाइश का एक अलग समाजशास्त्र है, जो घर की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसकी चर्चा फिर कभी।

यहाँ आपके विचारों का स्वागत है।

पुछल्ला
आज बाल दिवस पर मेरे एक मित्र ने यह मजेदार sms भेजा है:
जाने लोग १४ फरवरी (वेलेन्टाइन डे) को ऐसा क्या करते हैं कि ठीक नौ महीने बाद १४ नवम्बर कोबाल दिवसमनाना पड़ता है…? :)


(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Wednesday, November 12, 2008

“नहारी” …यूँ अचानक ही!

यूँ तो मैं पिछले सोलह वर्षों से मंगल व्रत प्रायः अनवरत रहता आया हूँ, लेकिन कभी भी इसका उद्देश्य भूखा रहकर हनुमान जी की उपासना करना नहीं रहा। बस बजरंग बली के बहाने रुटीन से थोड़ा अलग, हल्का और नमक रहित मीठा भोजन करने और कम से कम एक दिन मनसा, वाचा, कर्मणा सात्विक व्यवहार का अभ्यास हो जाता है। किसी खास पर्व, त्यौहार, या पारिवारिक आयोजन में आवश्यक होने पर व्रत भंग करने की अनुमति भक्तशिरोमणि अंजनीकुमार से ले ही लेता हूँ।

कल मंगलवार को भी सुबह-सुबह अपने पिछवाड़े से तोड़े हुए पपीते और अमरूद का भरपेट नाश्ता करने के बाद मेयो हाल (स्पोर्ट्स स्टेडियम) गया था। वहाँ से लौटकर आने के बाद इतना ही समय बचता है कि जल्दी-जल्दी नहा-धोकर ऑफिस चला जाऊँ। लेकिन अखबारों में भारत की आस्ट्रेलिया पर टेस्ट श्रृंखला की विजय के समाचार, लेख और विशेषज्ञों की राय पढ़ने में उलझ गया। क्रिकेट की खबरें पढ़ना मेरी कमजोरी रही है। उसपर भी, यदि मामला भारतीय जीत का हो तो क्या कहना…!

श्रीमती जी ने दर्जनों बार याद दिलाया; “जल्दी तैयार होकर ऑफ़िस जाइए… आपके बुजुर्ग (पेंशनर) इन्तजार कर रहे होंगे। …लगता है, आज ‘सुन्दरकाण्ड’ फिर छोड़ देंगे”

अन्ततः हड़बड़ाकर उठता हूँ… जल्दी-जल्दी शरीर पर गुनगुना पानी उड़ेलता हूँ… नहाने की रस्म पूरी करके तौलिया लपेटे मन्त्र बुदबुदाते हुए पूजा स्थल पर जाकर हाथ जोड़ लेता हूँ…

क्लीं मर्कटेश महोत्साह सर्व व्याधि विनाशन।
शत्रून् संहर माम् रक्ष श्रियंदापय देहिमे क्लीं ॐ॥

पूजा का ‘मीनू’ एडिट हो लेता है… पवनसुत से ‘सुन्दरकाण्ड’ न पढ़ पाने के लिए क्षमा मांगते हुए ‘हनुमान-चालीसा’ से काम चलाने की विनती कर लेता हूँ। …खूँटी पर से जो कपड़ा पहले प्रयास में हाथ लग जाता है उसे ही देह पर चढ़ाते हुए पत्नी को पुकार लगाता हूँ-

“सुनती हो जी, मुझे एक रुमाल दे दो, बहुत देर हो गयी है।”

“सुन रही हूँ जी, …लेकिन पहले फलाहार तो ले लीजिए …मेज पर लग गया है।”

मेज पर रखी प्लेट में छितराये हुए सिंघाड़े के हलवे से उठती भाप देखता हूँ…। उई… इतना गर्म है कि मुँह जल जाय, और ठण्डा करके खाने में तो पन्द्रह मिनट लग जाएंगे…। तबतक तो वहाँ ऑफिस में घमासान हो जाएगा… दादाजी लोग मेरे चैम्बर को अपनी छड़ियों पर उठा लेंगे। …और इधर आजका ये हलवा भी कितना बेस्वाद और गीला दिख रहा है।

…जबसे मैने श्रीमती जी को आराम देने के लिहाज से एक भोजन बनाने वाली रख लिया है, तबसे उनके हाथ की ‘स्पेशल डिशेज’ खाने के लिए तरसना पड़ता है। खाना तो यह भी ठीक ही बनाती है, लेकिन उनके हाथ का जायका फिर भी नहीं मिलता है। और व्रत के लिए स्पेशल वैसा हलवा तो दूसरा कोई बना ही नहीं सकता। अच्छी तरह भुना हुआ, ब्राउनिश कलर का शुष्क, मीठा और सुगन्धित… देखते ही खाने को जी ललचाए।

…एकाएक मेरा मन चिढ़ गया। क्या एक दिन के लिए भी ‘किचेन’ में नहीं जाना चाहिए इन्हें? मैने तुनककर कहा-
“ये हलवा तो मैं नहीं खाऊंगा। कितना गीला और बदरंग लग रहा है… छिः”

मैं जल्दी-जल्दी जूते का फीता बाँधने लगा। श्रीमती जी के चेहरे पर परेशानी के भाव स्पष्ट उग आये थे, करें तो क्या करें…। नन्हे ‘सत्यार्थ’ ने इतना समय ही नहीं दिया था कि ‘किचेन’ में जाकर देख लें कि हलवा ठीक बन रहा है कि नहीं। मैं उठकर चलने को हुआ तो रास्ता रोककर खड़ी हो गयीं-

“हटो,… मुझे जाने दो, देर हो चुकी है।”

“खाकर जाना पड़ेगा… मेरे हाथ से”

नहीं-नहीं, मैं ये नहीं खा पाऊंगा… देर हो रही है”

“देर हो रही है, या हलवा खराब है?”

“…जो भी समझ लो”

“नहीं, आप खा लीजिए… आपको भूख लग जाती है।”

“नहीं लगेगी, पपीता खाया था सबेरे नाश्ते में”

“ना…, खाना ही पड़ेगा… बस दो चम्मच”

“छोड़ो भी, …मुँह का स्वाद खराब हो जाएगा…”

“प्लीज, बस दो चम्मच…”

अब लगता है, छुटकारा नहीं मिलेगा। बेबस होकर दो बार मुँह से हलवे का चम्मच लगा लेता हूँ…। मन में सन्तुष्टि नहीं आ पाती है… हम दोनो के ही…।

मैं लगभग भागता हुआ दफ़्तर में दाखिल होता हूँ। घर से मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर ऑफिस है। …मुझे अपने ही कक्ष में घुसने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। पूरा कमरा पेंशनरों से भरा हुआ है। सभी के हाथ में जीवित होने का प्रमाण-पत्र है। सबको मेरी प्रतीक्षा है। कुछ ऐसे भी हैं जो खड़े नहीं रह सकते, इसलिए फर्श पर ही बैठ गये हैं। अर्दली उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा करने में असफल हो चुका है।

मुश्किल से रास्ता बनाकर अपनी कुर्सी तक पहुँचता हूँ… बैठकर कलम खोलता हूँ… सबको लाईन से आने के लिए कहता हूँ… सभी एक साथ अपना-अपना पर्चा मुझे पकड़ाने के लिए उमड़ प्ड़ते हैं… मैं कलम बन्द कर लेता हूँ।

“जबतक आपलोग लाईन नही बना लेंगे, तबतक मैं किसी का कागज नहीं लूंगा।”

दो मिनट के भीतर मेरी दाहिनी ओर दो पंक्तिया आकार ले लेती हैं- एक महिलाओं की, और दूसरी पुरुषों की। तेजी से काम शुरु होता है। एक वरिष्ठ कर्मचारी मेरे सहयोग में आ चुका है। लाईन अनुशासित होकर सरक रही है।


तभी मेरे पीछे से चक्कर काटकर मेरी बायीं ओर आयी एक महिला का स्वर उभरता है-
“सर! … …”

मुझे सिर उठाने की फुरसत नहीं है। मन में झुझलाहट होती है। थोड़ी देर बाद फिर वही आवाज…
“अरे साहब, इधर भी देख लीजिए…”

मैं अचकचा कर उधर देखता हूँ। “अरे! …तुम यहाँ?”

मेरी निगाह झेंप जाती है। अपनी पत्नी को इस रूप में दफ़्तर में सबके सामने देखकर समझ नहीं पाता कि क्या करूँ। लेकिन पलक झपकते ही वे एक डिब्बा मेज पर रखकर कमरे से ओझल हो जाती हैं। मेरा अर्दली भी माजरा समझ नहीं पाता है।

मेरे आगे कई परचे बूढ़े हाथों में लटके दिख रहे हैं। मेरी कलम फिर अपना काम आगे बढ़ाने लगती है।

हाथ यन्त्रवत् अपना काम कर रहे हैं… लेकिन मन में पुरानी फिल्मों का ग्रामीण दृश्य घूम जाता है…। खेतों में हल चला रहे किसान की पत्नी दोपहर में ‘नहारी’ लेकर खेत में आती है। कपड़े में बँधी रोटियों की थाली और घड़े का पानी…। …गोबर और धनिया। …यहाँ परिवेश आधुनिक है ...पर सोचने में अच्छा लगता है तो हर्ज ही क्या है?

लाईन धीरे-धीरे छोटी होती जाती है। आखिरी बुजुर्ग को निपटाने के बाद डिब्बे पर हाथ रखता हूँ। अभी भी गरम है…। शायद ‘एल्यूमिनियम फ़ॉएल का प्रयोग हुआ है। अर्दली इशारा पाकर पीछे वाले कमरे (retiring room) में पानी लगा देता है।

डिब्बे का ढक्कन खोलने पर वहाँ फैलने वाली सुगन्ध बता देती है कि इसे रचना ने जरूर अपने हाथों से बनाया होगा…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Thursday, November 6, 2008

स्वागत करें इनका... मैने तो आहुति बनकर देखा है इन्हें।

मुझे आज वर्ष १९९९ में हुई अपनी शादी के बाद का अगला दिन याद आ गया, जब मैं ससुराल के आँगन में बैठा हुआ अपनी पत्नी की सहेलियों से घिरकर औपचारिक और अनौपचारिक परिचय के दौर को झेल रहा था। साले-सालियों और घर के अन्य सदस्यों से परिचय का दौर बीत चुका था। चुटकुलों और गीतों की फरमाइशों का आदान-प्रदान बेनतीजा समाप्त हो चुका था। मुझे वहाँ कोई रुचिकर विषय नहीं मिल रहा था, जो मुझे बोर होने से बचा ले। वह भी तब जब बोर करने के लिए सबके निशाने पर मैं ही था।

तभी मुझे एक उम्मीद की किरण एक बच्चे में दिखी। बिलकुल सफेद गोरा, बेहद दुबला-पतला और देखने में कमजोर। उम्र करीब १०-११ साल। आवाज धीमी लेकिन बिल्कुल स्पष्ट। बार-बार मुझे ‘जीजा जी’ कहकर छेड़ने की कोशिश करता। मैने पहले तो उसे बच्चा समझ कर अनदेखा कर दिया, लेकिन जब उसके कुछ मजाक बड़ों के कान काटने वाले सुनायी पड़े तो मेरी रुचि उस ‘बड़े बालक’ में जाग्रत हो गयी।

मैने मौज लेते हुए कहा; “चलो अच्छा हुआ मेरी कोई छोटी साली नहीं थी, अब तुम इस कमी को बखूबी पूरा करते दिखते हो, ...बल्कि ‘दिखती’ हो।”

“हाँ-हाँ, आज से मैं ही आपकी साली रहूंगी... लेकिन बाद में अपनी जबान से पलट मत जाइएगा।”

हमारे बीच इस नये समझौते को मैने डरते-डरते स्वीकार तो कर लिया, इसका प्रचार-प्रसार भी हो गया; लेकिन आगे चलकर उस ‘छप्पन छुरी’ को सम्हालना मेरे लिए मुश्किल होता गया। अलबत्ता मुझे उसके बाद कभी बोर नहीं होना पड़ा। दूसरों के लिए ‘गोलू’ मेरे लिए ‘गोली’ बन गयी, चेहरे पर भोलेपन की चादर लपेटे मेरी नयी साली ने उसके बाद जो करतब दिखाये, उससे वहाँ कोई भी मुस्कराए बिना नहीं रह सका। मेरी तो विनोद-प्रियता परास्त होने लगी। जीजा जी से जो मजाक और चुहलबाजी ‘गोली’ ने तब किये वो अच्छे-अच्छों को मात करने वाली थी।

वही गोलू जब हाई स्कूल में पूरे प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में चौथा स्थान हासिल करके अखबारों की सुर्खियाँ बटोर रहा था, तो हम यों प्रसन्न थे कि उसकी विलक्षण प्रतिभा और सुनहरे भविष्य की हमारी भविष्यवाणी सबके सामने आ रही थी। बेहद सम्वेदनशील और सृजनात्मक क्षमता से ओत-प्रोत बहुमुखी प्रतिभा का धनी गोलू अब ‘कार्तिकेय’ के नाम से एक किंवदन्ती बन गया था। पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट खेलने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों व वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और मेडल व पुरस्कार जीतते जाने की तो एक आदत ही बन गयी थी।

वही ‘कुमार कार्तिकेय मिश्र’ जब मुझे आज ब्लॉग की दुनिया में कदम रखते हुए दिखायी पड़े, तो मेरा मन बल्लियों उछलने लगा। उनकी मस्ती का आलम ये है कि इस बड़े कदम को भी इतनी सहजता से उठाया है, जैसे इस लाइन में वर्षों से लगे रहे हों। बस चले आये टहलते हुए... मुझे समय से बताने की जरूरत भी नहीं समझी। वह तो भला हो ऑर्कुट वालों का जिन्होंने इनके जन्मदिन की खबर मुझे दी और स्क्रैप पर गया तो जनाब इसी गली के चक्कर काटते मिले। ऑर्कुट में ये जिहाल-ए-मिस्कीन के नाम से जाने जाते हैं। इसका अर्थ तो मैं आज तक नहीं जान पाया हूँ।:)

इनके बारे में जो टिप्पणी हम वर्षों से करते आये उसे बड़ी ईमानदारी से ये खुद ही बता रहे हैं कि ज़िंदगी के जुम्मा-जुम्मा बीस-एक साल जिए हैं, लेकिन बातें बूढ़ों की तरह करने का शौक है. शायद बेवकूफी इसी को कहते हैं.....”

लेकिन इन्हें बेवकूफ़ मानने की गलती हम तो कर ही नहीं सकते। पहले भी धोखा खा चुके हैं। भोलेपन, विनम्रता और समृद्ध शब्दकोश से लैस कार्तिकेय की जबान कैंची की तरह चलती है और पानी की तरह प्रवाहशील है। अब लेखनी की धार आप खुद देखिएगा। मेरे तो इनसे पुराने मधुर सम्बन्ध हैं, इसलिए इनके पक्ष में ‘बायस’ रखना स्वाभाविक है; लेकिन मेरी इच्छा है कि मेरे आदरणीय व स्नेही ब्लॉगर बन्धु एक बार इनके ब्लॉग पर अवश्य जाँय।

इनकी शीर्षक विहीन पहली पोस्ट भी जरूर पढ़ें। इसके बाद आपका आशीर्वाद इन्हें जरूर मिलेगा, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Sunday, November 2, 2008

हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है… (एक गजल?)

नवम्बर का महीना शुरू होते ही कोषागार कार्यालय (Treasury Office) में चहल–पहल बढ़ जाती है; बल्कि यूँ कहें कि पेन्शन भोगियों का मेला लग जाता है। वैसे तो कोषागार द्वारा पेन्शन का भुगतान हर महीने पेन्शनर के बैंक खाते में भेंज करके किया जाता है, लेकिन साल में एक बार उन्हें कोषागार में आकर यह लिखित रूप से बताना पड़ता है कि वे अभी `जीवित' हैं। एक साल बाद यदि यह प्रमाणपत्र दुबारा नहीं प्रस्तुत होता है तो पेन्शन रोक दी जाती है।

इसी जीवित रहने के प्रमाणपत्र (Life Certificate) को जमा कराने का कार्य मेरे कार्यालय सहित प्रदेश के सभी कोषागारों में पहली नवम्बर से प्रारम्भ किया गया है। शनिवार को ऐसा पहला दिन था।

शुक्रवार देर रात तक जागकर मैने पंकज सुबीर जी की ग़जल की कक्षा के कुछ पाठ पढ़ रखे थे। सुबह जब ऑफ़िस पहुँचा तो पेन्शनरों की भीड़ लग चुकी थी। साठ साल से लेकर अस्सी-नब्बे साल तक के बूढ़े और ‘जवान’, विनम्र या रौबदार, दुबले-पतले या थुलथुले, भारी-भरकम या कृषकाय, जीर्ण-शीर्ण या चाक-चौबन्द, या मध्यम श्रेणी के ही ; हर प्रकार के बुजुर्गों का जमघट था। कुछेक कम उम्र की विधवा औरतें भी थीं, तो एकाध अलपवयस्क लड़के-लड़कियाँ भी आये थे।

मैने उनकी पहचान करने और लाइफ़ सर्टिफिकेट पर उनके हस्ताक्षर लेकर प्रमाणित करने का सिलसिला शुरु किया; जो शाम तक चलता रहा। बीच-बीच में ग़जल की कक्षा का पाठ भी मन में चहल कदमी करता रहा।

चित्र: tribuneindia.com से साभार

मेरे मन-मस्तिष्क में विचरण कर रही इन दो धाराओं को मेरे दिल ने जाने कैसे एक साथ जोड़ दिया; और इस संगम का जो नतीजा मेरे हृदय से बाहर निकलकर कागज पर उतरा, उसे मेरी पहली आधिकारिक ग़जल कहना उचित होगा।

पेश है ये ग़जल:-
(पसन्द आए तो दाद जरुर दीजिएगा, नौसिखिया जो ठहरा)

हम हैं जिन्दा ये बताने का वक्त आया है।
हूजूम -ए- पेंशनर ने ये हमें दिखाया है॥

ये नवम्बर के महीने में कोषागार का दफ्तर।
जैसे सरकार ने मेला इधर लगाया है॥

कोई सत्तर, कोई अस्सी, है कोई साठ बरस का।
सबकी गुजरी है जवानी, बुजुर्ग काया है॥

कमसिनी में ही चल बसा है जिसका पालनहार।
उसे बेवक्त यहाँ वक्त खींच लाया है॥

कोई मुन्सिफ, कोई हाकिम, तो कोई पेशकार था
वक्त ने सबको बराबर यहाँ बनाया है॥

देख ले हाल सिद्धार्थ उन बुजुर्गों का।
जिनकी आँखों में बागवाँ का दर्द छाया है॥