हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Sunday, August 31, 2008

कुर्सी में धँसकर गान्धी का कत्ल…

अभी-अभी इलाहाबाद में एक गान्धी आये थे। …राहुल गान्धी । चर्चा में ‘गान्धी ’ पर बहस हो गयी… राहुल, वरुण, संजय, राजीव, इन्दिरा, फिरोज़, से होते हुए बात ‘असली गान्धी ’ तक पहुँच गयी।

सत्य, अहिंसा, भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता, गरीबी उन्मूलन, दरिद्रनारायण की सेवा, अस्पृश्यता निवारण का ध्येय, गीता के निष्काम-कर्म का प्रेय; यही तो थी गान्धी की राह! …विदेशी दुश्मन के सामने निर्भीक सीना ताने अडिग अपनी टेक पर स्वराज की चाह!

…साम्प्रदायिकता से लड़ाई अकेले लड़ने की धुन …जब पूरा देश स्वतंत्रता का झण्डा फहरा रहा था …तो भी वह संत इन्सानियत के शीतल जल से नोआखाली में हैवानियत की आग बुझा रहा था …

एक वहशी हिन्दू को यह गान्धीगीरी रास न आयी… उसकी गोलियों ने ‘राम-नाम’ के रस में डूबे उस निर्भीक सीने में जगह बनायी…। कानून ने पूरी चुस्ती और फुर्ती से अपना काम दिखाया …उस दरिन्दे को नियमानुसार फाँसी पर लटकाया। देश के नेताओं ने सबको ढाँढस बँधाया… “गान्धी व्यक्ति नहीं विचार है-जो कभी नहीं मरता…” ऐसा समझाया।

लेकिन यह बात समझने में हमारी आत्मा रोज झिझकती है। मन में बारम्बार यह बात खटकती है… गान्धी की तस्वीर को अपने पीछे की दीवार पर टाँगकर, उसके ‘विचारों’ की जघन्य हत्या करने की दुर्घटना रोज ही घटती है…

अखबार पलटता हूँ तो साफ दिखता है, कि आज कश्मीर में, हो रहा है रोज गान्धी का खून सरेआम… इसे अन्जाम देने वाले पहनते हैं गान्धी आश्रम की खादी… काट रहे हैं सत्ता की चाँदी… और उसी की टोपी पहनकर तिरंगे को करते हैं सलाम…

फैलने देते हैं साम्प्रदायिकता का जहर… बैठे हुए सत्ता की मखमली गद्दी में धँसकर… हिंसा को तबतक चलने देते हैं, जबतक न बन न जाये यह आँधी… भले ही कब्र में करवट बदलते-बदलते उकता कर उठ बैठें इनके बापू गान्धी…

अमरनाथ के यात्री भी हो जाते हैं अस्पृश्य, अपने ही देश में नहीं मिलती दो ग़ज जमीन, हो जाती है दुर्लभ, जहाँ बैठकर सुस्ता सकें… बाबा के दर्शन की थकान, घड़ीभर ठहरकर मिटा सकें…

ये संप्रभु राष्ट्र के शासक, जो बन बैठे अपनी कुल मर्यादा के विनाशक…। गान्धी की निर्भीकता और साहस को दफ़न करके डर से सहमते हैं… उन मूर्ख आततायियों से, जो एक ‘तानाशाह’ देश की शह पर, मज़हबी खूँरेज़ी के रास्ते से ‘ख़ुदमुख्तारी’ की बात करते हैं…।

आजादी दिलाने वाली पार्टी का विघटन करना ही उचित, यह मेरा नहीं उसी गान्धी का था विचार… लेकिन कत्ल इसका उसी क्षण हुआ जब बनी पहली भारत सरकार…।

गान्धी के ही नाम पर सत्ता की दुकानदारी चलती रही… देश में मक्कारी, गरीबी, मज़हब की तरफ़दारी, और जात-पात की लड़ाई बदस्तूर पलती रही…

गान्धी के इस देश में, उनके विचारों का यूँ तिल-तिलकर मरना हमें बहुत अँखरता है… हमारे सामने ही गान्धी के इन वंशजों के हाथों, गान्धी जो रोज मरता है…।



indiatimes.com से साभार



सोचिए, और बताइए… कहाँ है वो कानून, कहाँ अटक गया है? …गोडसे को फाँसी देने के बाद किस अन्धेरे गलियारे में भटक गया है?
(सिद्धार्थ)

Friday, August 29, 2008

पानी में प्यासे बैठे हैं…

मेरा एक घर जहाँ मेरे दादाजी ने अपना अधिकांश जीवन बिताया था, बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में नारायणी नदी (बूढ़ी गण्डक) के किनारे है। वहाँ प्रायः प्रत्येक वर्ष घर के आंगन का पवित्रीकरण उफ़नाती नदी के जल से हो ही जाता है। इन दिनों जब बालमन ने समाचारों में बाढ़ की विभीषिका देखी तो उन्हें अपने वो दिन याद आ गये जब वे एक बार हफ़्तों वहाँ पानी से घिरे रहे:


www.hindu.comसे साभार



पानी के सैलाबों में से, कुछ जगह दिखाई देती है।
कुछ लोग दिखाई पड़ते है, आवाज सुनाई देती है॥
सब डूब गया, सब नष्ट हुआ,कुछ बचा नहीं खाने को है।
बीवी को बच्चा होना है, और भैंस भी बियाने को है ॥

अम्मा जपती है राम-नाम, दो दिन से भूखी बैठी है।
वो गाँव की बुढिया काकी थी,जो अन्न बिना ही ऐंठी है॥
मोहना की मेहरारु रोती, चिल्लाती है, गुस्से में है।
फूटी किस्मत जो ब्याह हुआ, यह नर्क पड़ा हिस्से में है॥

रघुबर काका बतलाते हैं, अबतक यह बाढ़ नही देखी।
सत्तर वर्षों की उमर गयी, ऐसी मझधार नहीं देखी॥
कल टी.वी. वाले आये थे, सोचा पाएंगे खाने को।
बस पूछ्ताछ कर चले गए,मन तरस गया कुछ पाने को॥


www.divyabhaskar.co.in से साभार


पानी में प्यासे बैठे हैं, पर शौच नही करने पाते।
औरत की आफ़त विकट हुई, जो मर्द पेड़ पर निपटाते॥
पानी में बहती लाश यहाँ, चहुँओर दिखाई देती है।
कातर सी देखो गौ-माता, डंकार सुनाई देती है॥

मन में सवाल ये उठता है, काहे को जन्म दिये दाता ?
सच में तू कितना निष्ठुर है, क्यों खेल तुझे ऐसा भाता ?
किस गलती की है मिली सजा,जिसको बेबस होकर काटें।
सब साँस रोककर बैठे हैं, रातों पर दिन - दिन पर रातें॥

हो रहा हवाई सर्वेक्षण, कुछ पैकेट गिरने वाले हैं।
मन्त्री-अफसर ने छोड़ा जो, वो इनके बने निवाले हैं॥
है अंत कहाँ यह पता नहीं, पर यह जिजीविषा कैसी है।
‘कोसी’ उतार देगी गुस्सा, आखिर वो माँ के जैसी है॥



daylife.com से साभार



शब्द-दृश्यांकन: बालमन

Sunday, August 24, 2008

कुछ कचोटते प्रश्न…???

वैसे तो जबसे खबरिया चैनेलों ने समाचार दिखाने के बजाय विज्ञापन बटोरने की होड़ में घटिया तमाशा, भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, और बेडरूम के झगड़े इत्यादि पर कंसेण्ट्रेट करना शुरू कर दिया है तबसे मैने टी.वी. पर समाचार देखना लगभग बन्द सा कर दिया है, लेकिन शनिवार की शाम को भोजन के समय एक न्यूज चैनेल पर मेरी निगाह अटक ही गयी।

आइटम तो वही ‘स्टिंग ऑपरेशन’ वाला ही था; लेकिन यहाँ इस औंजार का शिकार किसी राजनेता, अभिनेता अथवा किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को नहीं बनाया गया था। बल्कि इसके केन्द्र में एक आठ-नौ महीने की बच्ची की देखभाल कर रही नौकरानी थी। इस ऑपरेशन को अन्जाम देने वालों में भी कोई मीडिया वाला नहीं था। बल्कि, उस बच्ची की अपनी माँ थी, जो नौकरीशुदा होने के कारण अपनी दूधमुँही बच्ची को घर पर उस नौकरानी के भरोसे छोड़ कर जाती थीं। पतिदेव भी कहीं बड़े नौकर थे।

उस वयस्क उम्र की नौकरानी को दिखाया गया कि वह सारी ममता और दया को शर्मसार करती हुई किस प्रकार उस मासूम को चुप कराने के लिए थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद करती जाती है, बिलख कर रोती हुई बच्ची की आवाज बन्द करने के लिए उसके मुँह में रबर की निप्पल जबरिया घुसेड़ देती है, और उसको एक मोटी सी चादर से पूरी तरह ढंक देती है। रोती हुई बच्ची उफ़नाकर चादर हटाती है तो फिर मार पड़ती है। प्रतिकार में वह अपने दम भर रोती है लेकिन अन्ततः थक कर सो जाती है। वह क्रूर औरत बच्ची को चुप कराने के बजाय मोबाइल पर बात करने को ज्यादा तरज़ीह देती है…। उस बच्ची की माँ का ये भी कहना था कि इस नौकरानी को घरेलू शिष्टाचार का अच्छा ज्ञान था। वह सबके सामने इसका प्रदर्शन करके विश्वासपात्र भी बन गयी थी। लेकिन माँ तो बस “माँ” होती है। उन्हें जाने कैसे शक हुआ और उन्होने यह हृदय विदारक ऑपरेशन कर डाला। अब उनके पास अफ़सोस है, और आँसू हैं…

यह सब देख-सुनकर मेरी पत्नी तो जैसे थर-थर काँपने लगीं। मेरी आठ वर्षीया बेटी भी उद्विग्न हो उठी। डेढ़ साल का बेटा तो मस्ती से सो रहा था, लेकिन उसकी माँ और दीदी के मन में उसके लिए जो एक डर बैठ गया उसे दूर करने के लिए मुझे काफ़ी परिचर्चा करनी पड़ी। याद दिलाना पड़ा कि मेरे बच्चे इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें माँ-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मौसी आदि से युक्त संयुक्त परिवार का अपार स्नेह मिलता रहा है। घर छोड़कर नौकरी करने से थोड़ी अड़चन जरूर है। लेकिन वेतनभोगी नौकर के हाथ में उन्हे सौंपने की जरूरत नहीं आने वाली है। खैर…

अब, जब वे तीनों सो चुके हैं तो मेरे मन में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब सीधा नहीं आ रहा है। एक सवाल मेरी पत्नी ने भी उठा दिया इसलिए शुरुआत उसी से करता हूँ।

उनका सवाल था कि उस महिला के स्थान पर यदि कोई पुरुष होता तो क्या वह भी उस अबोध के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करता? मेरा जवाब था ‘पता नहीं’ लेकिन उनका मानना था कि कोई पुरुष शायद उस बच्ची को भले ही चुप नहीं करा पाता लेकिन वह ऐसा भी नहीं करता जैसा उस दुष्ट महिला ने किया।

यह विचार थोड़ा सब्जेक्टिव टाइप का है, इसलिए छोड़ते हैं। आप अपना विचार इसपर भी दे सकते हैं। लेकिन जो सवाल मुझे कचोट रहे हैं उनका यहाँ केवल जिक्र कर रहा हूँ। इनका जवाब हम मिलकर ढूँढेंगे:-

१.क्या एक सभ्य समाज के नाते हमें ऐसी व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए कि एक मासूम को उसकी जीती-जागती माँ का वात्सल्य भरपूर मात्रा में मिल सके?

२.क्या पति-पत्नी दोनो का नौकरी करना इतना आवश्यक और अपरिहार्य हो गया है कि उसकी कीमत एक बच्चे को माँ की ममता से हाथ धोकर चुकानी पड़े?

३.जिस औरत को ममतामयी और दयालु कहकर महिमा-मण्डित किया जाता है क्या वह प्यार और ममत्व की सेवा (नौकरी) के बदले मजदूरी (वेतन) लेकर भी अपनी ड्यूटी न निभाते हुए इतनी क्रूर हो सकती है?

४.क्या वह पारम्परिक व्यवस्था जिसमें पति-पत्नी परिवार की गाड़ी के दो पहिए होते थे, जहाँ घर का पुरुष जीविका कमाकर बाहर से लाता था, और पत्नी घर के भीतर का प्रबन्ध संभालती थी; इतनी अनुपयुक्त और अधोगामी हो गयी है कि उसे पूरी तरह से त्याग कर काम के बंटवारे के बजाय काम में प्रतिस्पर्धा का वरण किया जाना अपरिहार्य हो गया है?

५.आज के उपभोक्तावादी समाज में कहा जाता है कि धनोपार्जन से ही सुख के साधन जुटाये जा सकते हैं। लेकिन क्या इस धन को ही सुख का एकमात्र साधन मान लेना हमें हमारे ‘साध्य’ से भटका तो नहीं रहा है? क्या इस आपा-धापी में धन ही हमारा साध्य नहीं होता जा रहा है?

६.नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए उसका धनोपार्जन करना कितना जरूरी है? नारी की बौद्धिक जागृति के लिए नैतिक और मूल्यपरक शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है कि उसकी आर्थिक सम्पन्नता के लिए तकनीकी शिक्षा?

७.स्त्री और पुरुष के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध ठीक हैं कि उनके बीच हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा होना ठीक है। क्या स्त्री और पुरुष का आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रकृति-सम्मत भी है? ताजे ओलम्पिक खेलों में कुछ संकेत खोजे जा सकते हैं क्या?

८.परिवार का गठन कैसे हो? या, यही कि पारिवारिक जीवन कितना जरूरी है?

प्रश्न तो बहुत से बेतरतीब उमड़-घुमड़ रहे हैं, लेकिन अभी बस इतना ही। मैं इनपर आपके जवाब और टिप्पणियों की प्रतीक्षा करूंगा। इस संबंध में अपने मन की धारणाओं से भी आपको जरूर अवगत कराउंगा, अपनी अगली पोस्ट में।
(सिद्धार्थ)

Tuesday, August 19, 2008

कैसे-कैसे नर्क...? ...पुराण चर्चा

भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में पुराणों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। कहते हैं कि पुराणों की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रथम और प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में की थी। ऐसी मान्यता है कि पुराण उचित और अनुचित का ज्ञान करवाकर मनुष्य को धर्म और नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते हैं। ये मनुष्य के शुभ-अशुभ कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें सत्कर्म करने को प्रेरित करते हैं और दुष्कर्म करने से रोकते हैं।

यद्यपि पुराणों की विषय-वस्तु में समय-समय पर कतिपय स्वार्थी व लालची व्यक्तियों (पुरोहितों) द्वारा कर्मकाण्डों व रूढ़ियों की मिलावट भी की गयी है, फिर भी इनमें लिखित अनेक प्रकरण वस्तुतः उच्च मानवीय मूल्यों के पोषक व नैतिक जीवन के लिए पथ-प्रदर्शन का कार्य करने वाले हैं। कुछ अंश तो इतने अद्भुत, रोचक व भावपूर्ण हैं कि इनको पढ़ने से मन में अपने आस-पास के मानव समाज का चित्र सहज ही खिंचता चला जाता है।

मैं यहाँ ऐसा ही एक रोचक विवरण ‘गरुड़ पुराण’ से प्रस्तुत कर रहा हूँ। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु द्वारा अपने वाहन गरुड़ की जिज्ञासा को शान्त करने के लिए दिए गये उपदेशों का उल्लेख किया गया है। महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ ने भगवान विष्णु से प्राणियों की मृत्यु के बाद की स्थिति, जीव की यमलोक यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से सम्बन्धित अनेक गूढ़ प्रश्न पूछे थे। इन्ही रहस्यों से संबन्धित प्रश्नों का समाधान करते हुए इस पुराण में एक जगह बताया गया है कि यमलोक में ‘चौरासी लाख’ नरक होते हैं। मृत्यु लोक में मनुष्य द्वारा जिस-जिस प्रकार के “पापकर्म” किये गये होते हैं, उसी के अनुसार अलग-अलग प्रकार के नरकों का निर्धारण/आबन्टन यमपुरी के अधिकारी (धर्मध्वज, चित्रगुप्त और धर्मराज) उसकी मृत्यु के बाद करते हैं। यहाँ कुछ चुने हुए विशेष प्रकार के “नरकों” और जिन कर्मों के फलस्वरूप ये भोगे जाते हैं उन विशिष्ट प्रकार के “पापकर्मों” का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:-

तामिस्र: जो व्यक्ति दूसरों के धन ,स्त्री और पुत्र का अपहरण करता है, उस दुरात्मा को तामिस्र नामक नरक में यातना भोगनी पड़ती है। इसमें यमदूत उसे अनेक प्रकार का दण्ड देते हैं ।

अंधतामिस्र: जो पुरूष किसी के साथ विश्वासघात कर उसकी स्त्री से समागम करता है, उसे अंधतामिस्र नरक में घोर यातना भोगनी पड़ती है।इस नरक में वह नेत्रहीन हो जाता है।

महारौरव: इस नरक में माँस खाने वाले रूरू जीव दूसरे जीवों के प्रति हिंसा करने वाले प्राणियों को पीड़ा देते हैं ।

कुम्भीपाक: पशु-पक्षी आदि जीवों को मार कर पकाने वाला मनुष्य कुम्भीपाक नरक में गिरता है। यहाँ यमदूत उसे गरम तेल में उबालते हैं।

असिपत्र: वेदों के बताए मार्ग से हट कर पाखण्ड का आश्रय लेने वाले मनुष्य को असिपत्र नामक नरक में कोड़ों से मारकर दुधारी तलवार से उसके शरीर को छेदा जाता है।

शूकरमुख: अधर्मपूर्ण जीवनयापन करने वाले या किसी को शारीरिक कष्ट देने वाले मनुष्य को शूकरमुख नरक मे गिराकर ईख के समान कोल्हू में पीसा जाता है।

अंधकूप: दूसरे के दुःख को जानते हुए भी कष्ट पहुचाने वाले व्यक्ति को अंधकूप नरक में गिरना पड़ता है। यहाँ सर्प आदि विषैले और भयंकर जीव उसका खून पीते हैं।

संदंश: धन चुराने या जबरदस्ती छीनने वाले प्राणी को संदंश नामक नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ उसे अग्नि के समान संतप्त लोहे के पिण्डों से दागा जाता है।

तप्तसूर्मि: जो व्यक्ति जबरन किसी स्त्री से समागम करता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरक में कोड़े से पीटकर लोहे की तप्त खंभों से आलिंगन करवाया जाता है।

शाल्मली: जो पापी व्यक्ति पशु आदि प्राणियों से व्यभिचार करता है, उसे शाल्मली नामक नरक में गिरकर लोहे के काँटों के बीच पिसकर अपने कर्मों का फ़ल भोगना पड़ता है।

वैतरणी: धर्म का पालन न करने वाले प्राणी को वैतरणी नामक नरक में रक्त, हड्डी, नख, चर्बी, माँस आदि अपवित्र वस्तुओं से भरी नदी में फेंक दिया जाता है।

प्राणरोध: मूक प्राणियों का शिकार करने वाले लोगों को प्राणरोध नामक नरक में तीखे बाणों से छेदा जाता है।

विशसन: जो मनुष्य यज्ञ में पशु की बलि देतें हैं, उन्हें विशसन नामक नरक में कोड़ों से पीटा जाता है।

लालाभक्ष: कामावेग के वशीभूत होकर सगोत्र स्त्री के साथ समागम करने वाले पापी व्यक्ति को लालाभक्ष नरक में रहकर वीर्यपान करना पड़ता है।

सारमेयादन: धन लूटने वाले अथवा दूसरे की सम्पत्ति को नष्ट करने वाले को व्यक्ति को सारमेयादन नरक में गिरना पड़ता है। जहाँ सारमेय नामक विचित्र प्राणी उसे काट-काट कर खाते हैं।

अवीचि: दान एवं धन के लेन-देन में साक्षी बनकर झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति को अवीचि नरक में, पर्वत से पथरीली भूमि पर गिराया जाता है; और पत्थरों से छेदा जाता है।

अयःपान: मदिरापान करने वाले मनुष्य को अयःपान नामक नरक में गिराकर गर्म लोहे की सलाखों से उसके मुँह को छेदा जाता है।

क्षारकर्दम: अपने से श्रेष्ठ पुरूषों का सम्मान न करने वाला व्यक्ति क्षारकर्दम नामक नरक में असंख्य पीड़ाएँ भोगता है।

शूलप्रोत: पशु-पक्षियों को मारकर अथवा शूल चुभोकर मनोरंजन करने वाले मनुष्य को शूलप्रोत नामक नरक में शूल चुभाए जाते हैं। कौए और बटेर उसके शरीर को अपनें चोंचों से छेदते हैं।

अवटनिरोधन: किसी को बंदी बनाकर, उसे अंधेरे स्थान पर रखने वाले व्यक्ति को अवटनिरोधन नामक नरक में रखकर विषैली अग्नि के धुएँ से कष्ट पहुँचाया जाता है।

पर्यावर्तन: घर आए अतिथियों को पापी दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति को पर्यावर्तन नामक नरक में रखा जाता है।जहाँ कौए, गिद्ध, चील, आदि क्रूर पक्षी अपनी तीखी चोंचों से उसके नेत्र निकाल लेते हैं।

सूचीमुख: सदा धन संग्रह में लगे रहने वाले और दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने वाले मनुष्य को सूचीमुख नरक में यमदूत सूई से वस्त्र की भाँति सिल देते हैं।

कालसूत्र: पिता और ब्राह्मण से वैर करने वाले मनुष्य को इस नरक में कोड़ों से मारा जाता है; और दुधारी तलवार से छेदा जाता है।


चित्रकृति elfwood.com से साभार


(जाहिर है कि पूर्ण सूची देना इस ब्लागर और इस पोस्ट की सीमा से परे है क्यों कि इनकी कुल संख्या ८४ लाख बतायी जाती है। लेकिन इतने से ही यह तो स्पष्ट होता ही है कि इस संसार में मनुष्य योनि में पैदा होने वाले जीवों के भीतर जो पापकर्म दिखायी देते हैं उनकी पहचान भारतीय सभ्यता के आदिकाल में ही बहुत सूक्ष्मता से कर ली गयी थी।)
(सिद्धार्थ)

Sunday, August 17, 2008

सब ढंक गया.!..


यमुना नदी का सरस्वती घाट,
जिसके हो चले हैं
अब अच्छे ठाट ।
वहाँ पक्की, मजबूत सीढ़ियाँ देखकर
सहसा ठिठक गया ।
नदी किनारे की वो बालू की जमीन,
उस जमीन पर बना
वह दो जोड़ी पैरों का निशान,
सब ढक गया?

वहाँ कभी थी गीली-दलदली जमीन,
जिसके पास ही उसने
सूखी और साफ जगह दिखायी थी।
थोड़ी देर शान्त और एकान्त बैठकर,
अपनी बात सुनाने को,
उसने अपने दुपट्टे की चादर बिछायी थी।

था एक कठिन दौर,
जब वह अपनी कमजोरी
या कहें, कायरता
मिटा न सका था।
घर–परिवार के सपने तोड़कर,
अपने मदमस्त सपने
सच साबित करने का हौसला
जुटा न सका था।

उनके बीच की डोर
तनती जा रही थी।
प्यार के सपनों की राह पर
दुनियादारी की दीवार
बनती जा रही थी।

दुनिया से हारकर दोनो नें
अपनी उस दुनिया को
समेट लिया था।
दूर हो जाएंगे, यह जानकर
एक दूसरे को मन ही मन
भेंट लिया था।

फिर भी
बैठे रहते थे,
ठहरी हुई सी यमुना के किनारे,
उस मुट्ठी भर समय को पकड़कर।
जैसे रोक ले कोई,
पानी से भींगी रेत को
मुट्ठी में जकड़कर।

इस आस में,
कि जब तक पानी है,
यह रेत मुट्ठी से नहीं निकलेगी।
मानो यहाँ की गहरी यमुना
चन्द कदम चलकर,
वेगवती गंगा में नहीं मिलेगी।

बुझती आस को
जिन्दा करने की उम्मीद में,
उन्होंने समय की उस रेत में
आँखों का पानी भी मिलाया था।
लेकिन होनी तो होनी ही थी,
अँधेरा घना हुआ, वे लौट गये,
यमुना का पानी गंगा में जा समाया था ।
(सिद्धार्थ)

Friday, August 15, 2008

पन्द्रह अगस्त पर शुभ कामनाएं...

(१)
देखो भाई आ गया, फिर पन्दरह अगस्त।
आग लगी है देश में, नेता फिर भी मस्त।

नेता फिर भी मस्त, खूब झण्डा फहराया।
जम्मू कर्फ्यूग्रस्त, बड़ा संकट गहराया॥

सुन सत्यार्थमित्र बैरी को बाहर फेंको।
सर्प चढ़ा जो मुकुट, दंश देता है देखो॥


(२)
आज़ादी की बात पर होता नहीं गुमान।
बहुत गुलामी देश में पसरी है श्रीमान्॥

पसरी है श्रीमान् यहाँ बदहाल गरीबी।
जाति-धर्म के भेद और आतंक करीबी॥

घोर अशिक्षा, पिछड़ापन, बढ़ती आबादी।
भ्रष्टतंत्र की भेंट चढ़ी अपनी आज़ादी॥


s3.amazonaws.com से साभार

Wednesday, August 13, 2008

कश्मीर को संभालो...


sachiniti.wordpress.com

हे अमरनाथ के बाबा!
तू क्यों बर्फ़ की तरह जम गया है?
तेरे सामने, देखते ही देखते,
धर्म के नाम पर,
मानवता का रास्ता थम गया है।

तुम्ही ब्रह्मा, तुम्ही विष्णु
तुम्ही हो अल्लाह भी;
और तेरी ही है मसीहाई,
तुम्हारी इस बात पर
सबको है भरोसा,
कि यह धरती तुमने ही बनायी।

जंगल, जानवर और वहाँ का कानून
सब तुम्हारी ही करनी है।
तो क्या इस ख़ौफनाक ख़ता की सजा,
हम इन्सानों को भरनी है?

तुमने तो,
इन्सान के भीतर अपना अंश
डाला था!
तेरी किताबें कहती हैं,
इन्सान को
तूने बनाके अपना वंश
पाला था!

हे परम पिता परमेश्वर, तारणहार,
ऐ रसूल अल्लाह, परवरदिग़ार!
तेरी फितरत हम समझ क्यों नहीं पाते?
क्या है तेरा दीन-धरम,
खुलकर क्यों नहीं बताते?


graphics8.nytimes.com

ये तसद्दुद, ये खूँरेज़ी,
ये रंज़ो-ग़म।
ये ज़मीन की लड़ाई, ये बलवा
क्या यही है धरम?

रोक ले इसे,
सम्हाल ले, अभी-इसी वक्त!
नहीं तो देख ले समय,
निकला जा रहा है कमबख़्त।

डरता हूँ,
कहीँ तेरा दामन,
उसकी पाक़ीज़गी
दागदार न हो जाये।
करने को तुझे सज़दा,
तेरी पूजा, तेरी अर्चना,
कोई
तमीज़दार न रह जाये।
(सिद्धार्थ)


www.timesrelieffund.com

ये तस्वीरें इण्टरनेट से खोजकर उतारी गयी हैं। यदि इसमें किसी कॉपीराइट का उल्लंघन निहित है तो कृपया सूचित करें, (साभार)

Monday, August 11, 2008

चंदन सा बदन... यानि इत्र-चर्चा

मैं अपने ऑफ़िस में बैठा मेज पर पड़ी बिलों और चेकों पर हस्ताक्षर करने में व्यस्त था कि अचानक मेरे नथुने फड़फड़ा उठे। चंदन की जोरदार ख़ुशबू पूरे कमरे में भर गयी थी। मेरा ध्यान बरबस कमरे में आए उन सज्जन की ओर चला गया जो हाथ में एक दरख़ास्त लिए मेरे सामने खड़े थे। वे एक बुजुर्ग पेंशनर थे। माथे पर सफेद चंदन का गोल टीका बरबस ध्यान आकृष्ट कर रहा था। साधारण किन्तु साफ़-सुथरी वेश-भूषा, करीने से सजे हुए दुग्ध-धवल बाल, चेहरे पर अनुभव का गाम्भीर्य और सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की दीनतापूर्ण भंगिमा। इन सबको पीछे छोड़ती उनके शरीर से आती असली चंदन की सुगंध इतनी विशिष्ट थी कि मैं उनके काम के निपटारे के बाद उनसे इस विलक्षण शौक के बारे में पूछने का लोभ-संवरण नहीं कर पाया।


श्री कैलाशनाथजी

उन्होंने पूछने पर बताया कि वे चंदन का टीका तो लगाते ही हैं, नियमित रूप से इसके इत्र का प्रयोग भी करते हैं जो उनके दामाद जी रतलाम (मध्यप्रदेश) से विशेष तौर पर लाकर देते हैं। ...झट मुझे रवि रतलामी जी याद आ गये। सोचता हूँ उनसे अपनी दोस्ती प्रगाढ़ कर लूँ। खैर...

एक स्थानीय कार्यालय में बाबू की नौकरी से शुरुआत करके अनुभाग अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होने वाले श्री कैलाश नाथ त्रिपाठी का शौक जानकर मुझे भी इत्र के बारे में कुछ जानने की इच्छा हो गयी। हाँलाकि इसका प्रयोग करना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। एक तो यह धारणा कि इसमें अनेक नुकसानदेह रासायनिक पदार्थ होते होंगे और दूसरा यह कि इसे विलासिता का प्रतीक माना जाता होगा। अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना आसान नहीं होता चाहे हम जितना पढ़-लिख जाँय। फिलहाल इधर-उधर से कुछ जानकारियाँ इकठ्ठा कर ली हैं जो यहाँ बाँट रहा हूँ।

यूं तो भारत में इत्र वैदिक काल से है लेकिन गुलाब से बने इत्र का इस्तेमाल पहली बार मुगलकाल में शुरू हुआ। मुगल बेगम नूरजहां ने खासतौर से गुलाब इत्र के लिए पश्चिम एशिया के कारीगरों को बुलवाया। ये कारीगर कन्नौज में आकर बसे और कन्नौज इत्र उद्योग का गढ़ बन गया।

कहते हैं महक में इतनी ताकत है कि वह हमें जिन्दादिल, ख़ुशमिज़ाज, और तरोताजा बना देती है। इसका प्रयोग महकने के अलावा दूसरों को रिझाने और स्फूर्ति पाने के लिए भी होता है। बारात में आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए इत्र छिड़कने की मशीनें अब एक अनिवार्य आइटम हो गयी हैं। मेरा अनुभव है कि ये प्रायः ठीक काम नहीं करती हैं। नाच-नाचकर पसीने से तरब़तर बाराती जब मण्डप में प्रवेश करते हैं तो वहीं स्वागत द्वार पर ख़ुशबूदार पानी का फुहारा उन्हें और भिगो देता है। लोग उससे बच कर निकलने की कोशिश करने लगते हैं।


देवी-देवताओं की पूजा अर्चना में इत्र के प्रयोग से तो सभी परिचित हैं। राजस्थान के एक ‘गोविन्द जी मन्दिर’ में 10-12 हजार का इत्र रोज़ ही खर्च किया जाता है। जयपुर में रोज़ाना हिन्दू और मुस्लिम आस्था-केन्द्रों में औसतन 50 हजार का इत्र अर्पित किया जाता है। एक आँकड़े के मुताबिक केवल राजस्थान में प्रतिदिन करीब 08 लाख का इत्र हवा में ख़ुशबू बिखेरने की भेंट चढ़ जाता है जो त्यौहारों के मौसम में 12 लाख तक पहुँच जाता है। यहाँ से करीब 40 करोड़ का निर्यात भी प्रतिवर्ष होता है, जिसमें अजमेर का हिस्सा 03 करोड़ का है। ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर भी इत्र की अच्छी खपत होती है। वैसे भारत में इसका कुल कारोबार करीब 730 करोड़ का हो गया है।


इत्र की अनेक किस्में होती हैं। अदर ऊद, कस्तूरी, जफ़रान, गुलाब, खस, चमेली, मोगरा, चंदन, केसर, सुहाग आदि किस्में अधिक लोकप्रिय हैं। परंपरागत भारतीय इत्र में गुलाब, केवड़ा, बेला, चमेली, मेंहदी, कदम, गेंदा, केसर और कस्तूरी शामिल हैं। इसके अलावा शमामा, शमाम-तुल-अंबर और मस्क अंबर जैसे हर्बल इत्र भी बाजार में मिल जाएंगे। अदर ऊद इत्र सबसे महंगा है जो असम में पायी जाने वाली लकड़ी ‘आसामकीट’ से तैयार किया जाता है। इसकी कीमत 09 लाख रुपये प्रति किलो है। जबकि गुलाब का इत्र 12 हजार से लेकर साढ़े-तीन लाख रुपये प्रति किलो की दर से मिल जाता है। इसकी गुणवत्ता में अन्तर समझना और पहचानना भी सबके बूते का नहीं है।



कन्नौज स्थित सुगंध एवं सुरस विकास केन्द्र (एफएफडीसी) के प्रधान निदेशक गोरख प्रसाद के अनुसार इत्र उद्योग संभावनाओं से भरा हुआ है। विदेशों में इन उत्पादों का बहुत बड़ा बाजार है, जहां कारोबारियों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इत्र कारोबारियों को खरीदार खोजे नहीं मिल रहे हैं। वे बताते हैं कि मानकीकरण के अभाव में निर्यात बाजार में कन्नौज की हिस्सेदारी तेजी से घट रही है। ज्यादातर इकाइयों में आज भी पुराने तरीकों से ही इत्र तैयार किया जा रहा है। भारतीय मानक ब्यूरो ने चंदन तेल के लिए मानक बनाए हैं, लेकिन दूसरे उत्पादों के लिए कोई मानक नहीं है।

आजकल लोग रासायनिक सौंदर्य प्रसाधनों और रासायनिक दवाइयों की जगह हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों और हर्बल औषधि के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहे हैं। हर्बल उत्पादों की इस माँग का ही असर है कि मध्यप्रदेश के सैकड़ों किसानों ने औषधीय पौधों और सुगंधित पौधों की खेती बड़े पैमाने पर करनी शुरू कर दी है। सबसे ज़्यादा माँग कोलियस, सफ़ेद मुसली, आम्बा हल्दी, लाल चंदन, मुलेठी, सर्वगंधा, नीम, जामुन गुठली, सोठ, ब्राम्ही और शंख पुष्पी की है।


डॉ. महेश परिमल चर्चा करते हैं कि हमारे बीच कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें कुछ ख़ुशबुओं से एलर्जी होती है। इसका कारण यही है कि उन्हें श्वसनतंत्र या फिर फेफड़ों में तक़लीफ है। कृत्रिम सुगंध ही शरीर पर दूरगामी असर डालती है। प्रकृति-प्रदत्त सुगंध कुछ और ही होती है। विदेशी परफ्यूम जहाँ अल्कोहल के साथ कृत्रिम रसायनों से बनते हैं, वहीं भारतीय इत्र चंदन के तेल और विविध प्रकार के फूलों के अर्क से बनते हैं। इसकी सुगंध का तो जवाब ही नहीं है। इस सुगंध से किसी को भी एलर्जी नहीं हो सकती। ऐसा मानना है द एनर्जी रिसर्च इंस्टीटयूट (TERI) के वैज्ञानिकों का।
(सिद्धार्थ)

Wednesday, August 6, 2008

ब्लॉगरी ने ज़िन्दगी बदल दी है...

जबसे ब्लॉगरी शुरू हुई है, ज़िन्दगी बदल गयी है। कम्प्यूटर आने के बाद इसपर लिखना पढ़ना शुरू करते वक्त हर्षजी ने इसकी सम्भावना से आगाह तो किया था, लेकिन मुझे अपने ऊपर पूरा भरोसा था कि मैं अपने प्यारे से परिवार के हक़ में कोई कटौती नहीं होने दूंगा। जब खतरे ने पहली बार दरवाजा खटखटाया तो मैने अपनी मनःस्थिति यहाँ बयान की थी। संतुलन की कोशिश चलती रही। लेकिन, जाने कैसे और क्यूँ, चढ़ता रहा ब्लॉगरी का नशा भी। इसकी मदहोशी ने कब हमें पूरी गिरफ़्त में ले लिया, यह तो हम जान ही नहीं पाते अगर मेरी साँसों की सहचरी, …वही मेरी धर्मपत्नी, ने यह चिठ्ठा न लिखा होता। लीजिए, आप भी पढ़कर चेक कीजिए, कहीं आपने भी इस बेरहम ब्लॉगिंग की बुरी संगत में अपना रूटीन खराब तो नहीं कर लिया है…

हर एक दिन वही रुटीन...रोज सुबह पाँच बजे उठना… उठते ही कम्प्यूटर की सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाना..सीपीयू ऑन होता है.. अगड़म-बगड़म… चोखेरबाली… ज्ञानजी का ब्लॉग… और भी बहुत सारे ब्लॉग…करीब एक घन्टे का प्रोग्राम। आवाज आती है, “जी, चाय बन गई है”
“हाँ, ब्रश कर तो रहा हूँ” फ़िर कुर्सी पर।
“चाय आ गई जी…”
“बस हो गया…”
चाय सामने मेज पर… थोड़ी देर बाद पीछे से एक बार फ़िर “चाय ठंडी हो रही है जी”
“…हाँ सुन लिया, …अभी बहुत गरम है… पी लुंगा।”
थोड़ी देर बाद आवाज आती है- “आज मैने चाय पिया है क्या जी?” “ज़रा मुझे भी एक गिलास पानी या एक कप चाय मिल जाती...”
“…अरे, अभी तो पिये थे। फ़िर बना दूं?”
“…ओ हो, मै तो भूल ही गया था …जरा फ़िर एक कप बना दो।”
कम्प्यूटर पर ब्लॉगिंग जारी है …धकाधक …एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग पर कमेण्ट जारी है...
“साढ़े-नौ बज गया जी, स्नान कर लीजिए।”
“…जाता हूं यार, बहुत चिल्लाती हो।”
यह कहने-सुनने में भी पाँच से दस मिनट लग ही जाते हैं… बाथरूम से झाँकते हुए, “…आज तौलिया बाहर ही छूट गया”
…जैसे रोज लेके ही जाते हैं!
“…अच्छा तो भोजन जल्दी निकालो, देर हो रही है, …वर्ना बिना खाए जाना पड़ेगा…”
जल्दी-जल्दी खाना लगता है। उतनी ही जल्दबाजी में खाया जाता है। अब चश्मा, पेन, मोबाइल जुटाते समय भी…, जाते-जवाते भी, निगाहें स्क्रीन पर ही आ-जा रही हैं… काश दस मिनट और कम्प्यूटर पर…।
“ज़रा जूता साफ़ करवा दो…”
“कौन सा…?” छाँटना मुश्किल है… चार जोड़े तो काले चमड़े वाले, चार जोड़े सफ़ेद स्पोर्ट शू, वुडलैंड… दो चार और क्यों नहीं ले आते?… “अरे भई कुछ बोलेंगे? …एक बार पीछे मुड़ कर देख तो लीजिए…।”
चार बार बोलने पर एक बार… “हाँ दे दो…”
“कौन सा?”
“क्या?…” “अरे वही वुडलैंड दे दो …या तुम्हारी जो मर्जी…”
अचानक उठ जाते हैं - “चलता हूं जी! देर हो रही है…”
बेटा पीछे-पीछे चिल्लाता है- ‘डैडी टाटा… टाटा… टा…आ…आ…ए…ए…ओ…ओ…ऊँ… ऊँ ऽऽऽ’ शुरु …पीछे मुड़ कर देखने की फ़ुरसत तक नहीं …
गेट बंद करके अंदर आने पर कमरा अव्यवस्थित… गीला तौलिया बिस्तर पर… आलमारी के फाटक छितराये हुए… दो चार गन्दे कपड़े इधर-उधर और इन सारे कामों से निवृत्त होने के बीच भी एक उम्मीद पाँच बजने की…
इस बीच बेटी का स्कूल से आना, उसके कपड़े बदलवाना, खाना खिलाना, होमवर्क कराना… और इनके बीच एक उम्मीद पाँच बजने की। …पाँच बजने से कुछ देर पहले ही मैं और मेरे बच्चे बाहर के बरामदे में निकलते है… बेटा और बेटी अपनी-अपनी साइकिल लिए मस्त, मेरा ध्यान कभी बच्चों पर तो कभी गेट पर…
गेट खुलता है। बच्चे चिल्लाते हैं- डैडी आ गये… डैडी आ… मै भी खुश। इनके हाथ में अपने लिखे हुए कुछ लेख के प्रिन्टआउट्स हैं। हम सबको क्रॉस करते हुए अपने छोटे भाई के कमरे में जाते हैं… “नन्हें देखो, सबको छाप लाया, आज आफ़िस में काम कम था, इसलिए थोड़ी देर कम्प्यूटर का कुछ काम कर लिया… और, आज किसी का कोई नया पोस्ट आया कि नहीं?
आते ही फिर वही कम्प्यूटर चेयर… वही ऑफिसियल ड्रेस… एक बार फ़िर चाय-पानी सामने टेबल पर… बेटा डैडी के लिए ब्याकुल है… डैडी, गोद-गोद… डैडी, चाभी… डैडी, गाड़ी…
…अरे यार, कोई पकड़ेगा इसको? …तभी से परेशान किए जा रहा है …जाओ बेटा, अपनी मम्मी के पास…
मैने बोला थोड़ी देर गोद में ले लेते… जब देखो तब कम्प्यूटर कम्प्यूटर… अरे कम से कम कपड़ा तो चैंज कर लेते… थोड़ा आराम कर लेते…
तुम क्या समझोगी.. अनपढ़ गवाँर की तरह बात करती हो


चौकिए नहीं, यह दृश्य ‘अन्तर्जाल’ से साभार लिया गया है



अन्दर ही अन्दर झल्लाहट होती है …फ़िर भी एक अच्छी पत्नी का कर्तव्य… जैसा कि इन्होंने ही समझाया है …पति घर में आये तो उसका मुस्करा कर स्वागत करना चाहिए… लेकिन जबसे कम्प्यूटर आया है उसका भी मौका नहीं… लगातार कम्प्यूटर पर… कभी इस ब्लॉग से उस ब्लॉग पर… कभी कमेंट्स पढ़ना तो कभी लिखना…। इस बीच अगर कोई मिलने भी आता है, तो इनके पीछे एक दो कुर्सियां और लग जाती हैं। वो भी वहीं बैठ लेते हैं…। यानि, आते-जाते इनके साथ, पीछे से ही सही, जो भी एक-आध टुकड़े बात हो जाती थी, उसकी भी गुन्जाइश खत्म…
“नौ बज गया जी, खाना लगवाएं?”
“अभी फ़्रेश होना है…”
“जल्दी करिए… ”
आखें कम्प्यूटर पर… जूते उतार कर वहीं चेयर के नीचे, मोंजे उतार कर कहां फेंके इसका अन्दाजा ही नहीं, कपड़े उतार कर बिस्तर पर, एक हाथ कमर पर, गर्दन मोड़े हुए बाथरुम की तरफ़… कुछ देर बाद फ़िर वही कुर्सी…
“खाना लग गया जी…”
थाली में गुब्बारे की तरह रखी गर्मा-गरम रोटी पिचककर धीरे धीरे थाली की सतह को छू लेती है…
“रोटी ठंडी हो रही है जी… क्या करते रहते हैं… कम से कम भोजन तो चैन से कर लीजिए…”
“आता हूँ जी, तुम तो हमेशा सिर पर सवार रहती हो… खा लुँगा अभी…।” बदलकर दूसरी रोटी आ गई…।
“अब तो आ जाइए…”
उठते हैं। कम्प्यूटर की तरफ़ देखते हुए भोजन भी हो जाता है।
“सुनते हैं, थोड़ी देर बाहर टहल आते हैं; बहुत अच्छा मौसम है आज का… चलिए ना..”
“हाँ तुम चलो, मै आता हूँ…” …थोड़ी देर बाद वापस आ जाती हूँ…
“अरे चली आई क्या?” “…बस मैं आ ही रहा था…चलो फ़िर चलते हैं” मैं गुस्से में बच्चों के साथ बेड पर…
“तुम्हारा तो गुस्सा नाक पर ही रहता है…” मैं एक दम चुप… धीरे-धीरे नींद आ ही जाती है…
करीब एक बजे- “अजी सुनती हो, सो गई क्या?”
…आखिर इन्तजार कब तक?(रचना)

नोट:
मैं कान पकड़कर ग़लती मान चुका हूँ और संभलने का प्रयास कर रहा हूँ। फलस्वरूप सत्यार्थमित्र पर नयी पोस्टों की आवृत्ति में कुछ कमीं और ताबड़तोड़ टिपियाने के टाइम में कटौती हो ली है। लेकिन यह कटौती ऑफिस में अंतर्जाल की सुविधा बहाल होने के बाद थोड़ी कम हो जाएगी। आप सब की पोस्टें ‘पढ़ने’ का लोभ-संवरण फिर भी नहीं कर पाता हूँ।

Friday, August 1, 2008

हिन्दी ब्लॉग जगत का नारीवाद

हिन्दी ब्लाग जगत में अनेक नारीवादी चिट्ठे पढने और उनपर आने वाली गर्मा-गरम टिप्पणियों और प्रति-टिप्पणियों को पढ़ने के बाद मन में हलचल मच ही जाती है। ‘चोखेरबाली’ और ‘नारी ’ ब्लाग के क्या कहने…। समुद्र मंथन में एक से एक अमूल्य रत्न-सुभाषित निकल कर आ रहे हैं। बीच-बीच में कभी-कभार दोनो ओर से “विष रस भरा कनक घट जैसे” विचार भी प्रकट हो जाते हैं। अभी इस प्रक्रिया के ठोस निष्कर्ष आने बाकी हैं, फिर भी मन कभी- कभी उद्विग्न हो ही जाता है। डा.अनुराग की शब्दावली में कहूँ तो- ऐसे ही बवंडर के बीच कुछ लफ़्ज हवा में लड़ते से दिख गये जिन्हें पकड़कर काग़ज (सफ़्हे?) पर चिपका दिया और यह तुकान्त कविता बन गई-



चित्रकृति www.sulekha.com से साभार



प्रगतिशील स्वातन्त्र्य-प्रेम की लौ जलती है,
समता के अधिकारों की इच्छा पलती है।
इस समाज ने डाल दिये हैं जो भी बन्धन
छिन्न-भिन्न करने देखो,‘नारी’ चलती है॥

घर की देवी, पुण्य-प्रसूता, कुल की रानी,
ममतामयी, सहचरी, प्रिया, बात-बेमानी।
अब दुर्गा, काली का रूप धर रही माया;
करुणा छोड़ ध्वंस करने की इसने ठानी॥

वैवाहिक बंधन अब बेड़ी सा लगता है,
है नर का वर्चस्व, भाव ऐसा जगता है।
इस अन्याय भरी दुनिया के खण्डन से ही;
इनके मन से क्षोभ-कलुष देखो भगता है॥

जंगल के बाहर मनुष्य का वो आ जाना,
नर-नारी के मिलन-प्रणय का नियम बनाना।
घर, परिवार, समाज, देश की रचना करके
कहतीं, “नर ने बुना स्वार्थ का ताना-बाना”॥

पढ़ी ‘सभ्यता के विकास’ की गाथा सबने,
इन्सानी फ़ितरत को अर्स दिया था रब़ ने।
इन कदमों को रोक सकेगी क्या चिन्गारी;
जिसे हवा देती हैं नारीवादी बहनें॥

क्या लम्बी यात्रा पर निकला पुरुष अकेला?
बिन नारी क्या सृजित कर लिया जग का मेला?
इस निसर्ग के कर्णधार से पूछ लीजिये,
जिसने देखी प्रथम-प्रणय की वह शुभ बेला॥

प्रकृति मनुज की है ऐसी, ‘होती गलती है’,
पर विवेक से, संयम से यह भी टलती है।
है ‘सत्यार्थ मित्र’ को पीड़ा चरमपंथ से;
छिन्न-भिन्न करती नारी मन को खलती है॥

(सिद्धार्थ)