हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, July 28, 2008

उड़ाया हुआ एक पत्र - पत्नी के नाम

आजकल चिठ्ठाजगत में दूसरों के लिखे व्यक्तिगत पत्र सार्वजनिक करने का दौर जोर पकड़ रहा है। पंगेबाज अरुण जी ने अपने किसी डॉक्टर मित्र का प्रेमिका को लिखा पत्र उसकी डायरी से उड़ाकर बाँचने की कोशिश की तो शिवकुमार जी ने उसके अनुवाद की आउटसोर्सिंग कराके अपने ब्लॉग पर ठेल दिया। यह सब पढ़-सुनकर मैने भी अपने तहखाने से एक ‘उड़ाया हुआ पत्र’ ढूँढ निकाला।

उत्तराञ्चल के अलग होने के बाद उ.प्र. सरकार के अधिकारियों की ट्रेनिंग की अकादमी (ए.टी.आई.) नैनीताल के साथ उधर ही चली गयी। आनन-फानन में लखनऊ के निकट ‘बख्शी का तालाब’ में नयी प्रशासनिक अकादमी की स्थापना की गयी। यहाँ जो पहला बैच ट्रेनिंग के लिए आया उसमें मुझे भी बुलाया गया था। कई दूसरे अधिकारी भी नौकरी के बीच से बुला लिए गये थे। वहीं हॉस्टेल के बरामदे में फेंका हुआ यह ‘रफ़’ का टुकड़ा मुझे मिला तो मैने इसे सहेज़ कर रख लिया। तब मुझे क्या पता था कि एक दिन यह ब्लॉग पर ठेलने के काम आ जाएगा…।






प्रिय सहधर्मिणी,
ओह! आज यह संबोधन लिखते हुए पहली बार कुछ अटपटा सा लग रहा है। तुम भी पढ़ो तो शायद बेतुका लगे। दो महीने बीत गये। हमें अलग-अलग रहते हुए। मैं यहाँ प्रशिक्षु-धर्म निभाने का प्रयास कर रहा हूँ, और तुम वहाँ अकेले गृहस्थी सम्भाल रही हो।

लेकिन यार, सच बताऊँ? इसका भी अपना एक अलग मजा है। जबसे हमारी शादी हुई, हम रोज सुबह उठकर एक ही मुँह देखते थे, एक ही तरह की बातें और रोज़ एक ही तरह का काम। ऊबन सी होने लगी थी। अब यहाँ आकर थोड़ा अलग माहौल मिलने लगा है। अलग-अलग किस्म के लोग हैं। काम भी ज़रा हट के है। एक से एक दिग्गज हमें पढ़ाने आते हैं।

कभी-कभी लगता है कि यूनिवर्सिटी की लाइफ वापस आ गयी है। बस तुम्हारी कमीं है। दिन में लेक्चर अटेण्ड करना, हम-उम्र दोस्तों के बीच कहकहे लगाना और रात में सोने से पहले… … (क्या सोचने लगी?)… थोड़ा बहुत पढ़ाई कर लेने का रुटीन फिर से चालू हो गया है। कितना अलग सा है न?

तुम तो जानती हो, सरकारी नौकरी की आदत पड़ जाने के बाद कार्य-कुशलता, सृजनशीलता, समयबद्धता और लक्ष्य के प्रति समर्पण की भावना बनाये रखना कितना कठिन हो जाता है। अब मुश्किल यह है कि यहाँ यही सब सिखाया-पढ़ाया जा रहा है। इतना ही नहीं, यहाँ की हमारी दिनचर्या में भी इन बातों का समावेश कराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन तुम चिन्तित मत होना। हमारी भरसक कोशिश यही है कि कम से कम तक़लीफ उठायी जाय।

जिस बात के लिए तुम मुझे सदैव कोसती रही हो, आखिरकार यहाँ आकर मुझे वह कठिन काम करना ही पड़ रहा है। यहाँ एक ‘धस्माना’ साहब कड़ी ठण्ड में भी लखनऊ से मुँह-अंधेरे ही योग कराने चले आते हैं। गर्म-गर्म कम्बल से निकलकर योग-कक्ष में जाना पड़ता है। कष्ट तो होता ही है। ठीक वैसा ही जैसा कष्ट तुम देती थी। …सुबह-सुबह ऊपर से रज़ाई उलटकर, ट्रैक सूट पहनाकर टहलने के लिए बाध्य कर देने में तुम्हें बड़ा मजा आता था न…। अब यहाँ का हाल जानकर तो तुम्हे बहुत खुशी हो रही होगी…।

लेकिन ज्यादा खुश भी मत होना। मैं यहाँ अपनी स्वतंत्रता का लाभ भी उठा रहा हूँ। जैसे- मुझे यहाँ ब्रेड पर ज्यादा मक्खन लगाने से रोकने वाला कोई नहीं है। पनीर और ‘स्वीट-डिश’ भी तुम्हारे द्वारा लगायी गयी सीमा को तोड़कर काफ़ी आगे निकल गये हैं। …सोचता हूँ स्वतंत्र हवा में साँस लेने के इस अंतिम अवसर का भरपूर लाभ उठा लूँ।

वैसे ‘मक्खन लगाने’ से याद आया कि यहाँ इस कार्य को एक कला का रूप दे दिया गया है। मक्खन ‘खाने’ के बजाय ‘लगाने’ के विभिन्न तरीकों की खोज यहाँ की गयी है। अधिकारियों ने कुछ ‘टिप्स’ भी बताये हैं। इस विधा में सभी प्रशिक्षुओं के बीच जबर्दस्त होड़ लगी है। खैर, यह तो सरकारी नौकरी से संबन्धित बात है। तुम्हे जानने की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है।

तुम्हारे मतलब की बात यह है कि तुम्हे मेरे अकेलेपन से चिन्तित होने की बिलकुल जरूरत नहीं है। हम इकतीस प्रशिक्षणार्थी आपस में काफी सहयोग की भावना से कार्य कर रहे हैं। विशेषतः मुझे यहाँ एक ऐसा मनोहारी साथी मिल गया है जिसके साथ घण्टों मजेदार interaction होता रहता है। एक से एक गुदगुदाने वाले चुटकुले, सुन्दर से सुन्दर तस्वीरों का आदान-प्रदान, देश-दुनिया की ढेर सारी नयी-नयी बातें, कभी विशुद्ध ज्ञान-विज्ञान तो कभी रोमांस की दुनिया में हम इतना खो जाते हैं कि समय का पता ही नही चलता है। उसके संसर्ग में आकर मैं तो चित्रकार हो गया हूँ।

कल देर शाम को जब चौकीदार ने आकर बताया कि “बाबूजी मेस का समय हो गया है” तब हमें पता चला कि शाम साढे पांच बजे से रात के नौ बजे तक हम लोग कमरे में अकेले ही मशगूल थे। मेस में किसी ने यह बताया कि शाम साढ़े-आठ बजे तुम्हारा फोन भी आया था। मगर मैं कहीं मिला नहीं। माफ करना। …I am really sorry…। अच्छा, बाकी चिट्ठी पढ़े बिना फाड़ मत देना। मैं पीसीओ जाकर घण्टों तुम्हे फोन मिलाता रहा लेकिन शायद लाइन अचानक खराब हो गयी है। इसीलिए यह पत्र लिख रहा हूँ।

अब सोचता हूँ लौटकर आऊँ तो एक ‘मोबाइल’ का जुगाड़ कर ही लूँ। यहाँ दो प्रशिक्षु अधिकारियों के पास मोबाइल है। बेचारे ठण्डी रात में ग्यारह बजे दौड़कर छत की ओर भागते हैं। टावर से सिग्नल पकड़ाने के लिए। बाकी लोग उनकी बेचैन ‘हेलो-हेलो’ सुनने के लिए बाहर निकल आते है। जब वे आधी-अधूरी बात करके ‘उषा’ वालों को गाली देते हुए नीचे आते हैं तो बाकी लोग विस्मय से देखकर मुस्कराते हैं। वैसे इस नयी सुविधा का भविष्य बड़ा उज्ज्वल प्रतीत होता है।

और बताओ, बेटी का क्या हाल है? देखो न, अभी मात्र एक महीने की थी कि उसे छोड़कर यहाँ आना पड़ा। काश, वह मेरी ट्रेनिंग के दौरान पैदा हुई होती। कितना अच्छा होता? जानती हो, हमारे दो प्रशिक्षु साथी ट्रेनिंग के दौरान बाप बने। सबने मिलकर बधाई दी और खुशी मनायी। खूब मिठाई खायी गई। सच, बड़ा मजा आया। मैं तो बस एक महीने से ‘मिस’ कर गया। इतना ही नहीं, इसी बहाने हफ़्ते भर की छुट्टी भी मिल गयी होती। यार, अपना तो ‘बर्थ-डे’ या ‘मैरेज एनीवर्सरी’ भी इस बीच नहीं पड़ रही है। नहीं तो तुमको यहीं बुलाकर सबके साथ ‘सेलीब्रेट’ करते।

अभी एक और चूक हो गयी। नववर्ष के अवसर पर हमारे कुछ साथी अपनी पत्नी लेकर आये थे। उनको जोड़े में नाचते और खुशियाँ मनाते देखकर तुम्हारी बहुत याद आयी। जानेमन, कसम से। अपने ‘डियर’ को सबलोगों के सामने ‘हैप्पी न्यू इयर’ बोलने का आनन्द ही कुछ और है। खैर….।

तुम्हें एक अच्छी बात और बता दूँ। हम लोगों ने बड़ी मेहनत से एक रंगारंग कार्यक्रम तैयार किया, नाम था ‘गुंजन’। एक शाम सारे बड़े अधिकारियों के साथ मिलकर नाटक, प्रहसन, गीत, कविता व ‘कौव्वाली’ का बेजोड़ प्रदर्शन किया गया। हमारे निदेशक श्री चौबे के भोजपुरी गीत ने तो शमाँ बाँध दिया। …मैं अपने रोल के बारे में बताऊँगा तो हंसोगी। इसलिए रहने देता हूँ। …वीडियो कैसेट लाउँगा तो देख लेना। शायद मुझे पहचान न सको। …एक मात्र सीन में मैं आगे से चौथी लाइन के बीच में खड़ा होकर ताली बजा रहा हूँ। उसी की रिकार्डिग आ पायी है।

अच्छा तुम कुछ बताओ, वहाँ कैसे चल रहा है। अब तो काफ़ी सूना-सूना लग रहा होगा? मेरे यहाँ आ जाने के बाद हफ़्ते भर तो काफ़ी खुश थी, अब क्या हो गया? अच्छा-अच्छा….घर में काम अकेले करना पड़ता होगा। घबराओ नहीं, अब कुछ ही दिन शेष बचे हैं। वैसे यहाँ तीन महीने ‘बैठकर’ खाने के बाद मैं दुबारा उसी तन्मयता से काम नहीं कर पाऊँगा।

और हाँ, अब तो मुझे अपने उस नये, लुभावने साथी के साथ समय बिताने की आदत भी पड़ गयी है। यह आदत मैं घर आकर भी छोड़ना नहीं चाहूँगा। चाहे इसके लिये मुझे आफ़िस से एक ‘कम्प्यूटर’ घर ही क्यों न लाना पड़े और ‘इण्टरनेट’ के लिये पैसा ही क्यों न खर्च करना पड़े।

जानती हो। मेरे ‘ई-मेल आईडी’ का पासवर्ड क्या है? वही, जो मैं तुम्हे प्यार से पुकारकर कहता हूँ। असल में इसे भूलना ठीक नहीं होता है ना। अच्छा, अब बस।

जल्द ही लौटने को अनिच्छुक किन्तु मजबूर
तुम्हारा- सहधर्मी (उफ़)

(कॉपीराइट के उल्लंघन का दोष मुझे नहीं लगेगा क्यों कि क्लास-रूम में इसे दिखाने के बाद किसी प्रशिक्षु ने इसपर अपना दावा प्रस्तुत नहीं किया था।)

Thursday, July 24, 2008

पेण्ड्युलम के सवाल


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ब्लॉग लेखन प्रारंभ करने के बाद मुझे जिन लोगो के लिखने से प्रेरणा मिलती रही है और जिनका सम्बल मिलता रहा है उनमें घुघूती बासूती जी एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। पिछले दिनों घुघूती जी ने एक कविता पोस्ट की 'पैन्ड्यूलम' शीर्षक से। मैं इसपर तत्काल टिप्पणी नहीं कर सका क्योंकि एक बार पढ़कर इसपर कुछ कह सकना मेरे वश में नहीं था। मैने इसे प्रिण्ट किया, दो-तीन बार पढ़ा और कुछ प्रतिक्रिया लिखने की कोशिश की। इनका भावुक लेखन कभी-कभी विचलित कर देता है। मुझे नहीं मालूम कि मैने इस कविता को कहाँ तक समझा है, लेकिन इस पेण्ड्यूलम के बहाने 'मुझे' जो महसूस हुआ उसने एक लम्बी कविता का रूप ले लिया है। इसे ज्यों का त्यों पेश कर रहा हूँ। इसकी कुछ पंक्तियाँ मूल कविता से सादर व साभार उधार ले ली गयी हैं। उम्मीद है आप इसे पढ़कर जिस लायक समझें खट्टी-मीठी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे:-

पेण्ड्युलम की चाल
या लोलक के दोलन का सवाल
मैंने शिशु-मन्दिर में पढ़ा था
सिर्फ़
पूछे गये प्रश्नों के उत्तर
याद कर आगे बढ़ा था

आज,
घुघूती जी की प्रेरणा से
एक गोले को रस्सी के सहारे
खूँटी से बाँधकर लटकाता हूँ।
फ़िर स्थिर गोले को
धीरे से पकड़कर
एक किनारे पर छोड़ जाता हूँ।

यह गोला
पहली बार में अपने-आप
किनारे नहीं जाता है
डुलाये बिना, मृत सा पड़ा यह
खुद को लटका ही पाता है।

जब कोई हाथ
या हवा का झोंका
इसे बलपूर्वक धकेलता है
तब उसी शक्ति का संचय कर
यह उमंग से
दोलन का खेल खेलता है


यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
इस छोर से उस छोर तक
उस छोर से इस छोर तक
आता और जाता, जाता और आता
अधिक समय बीच में रहता
कम समय छोरों पर जाता

दोनों छोर हैं अतिरंजित
एक छोर रंगा उमंगों में
दूजा रंग है काला मातम सा
बीच का हिस्सा है शेष जीवन
अहा! क्या साम्य है

सोचता हूँ लेकिन,
यह दोलन चक्र चलता कैसे है?
ऊपर वाली खूँटी से?
उससे बँधी डोरी से?
या धरती के गुरूत्व की बर-जोरी से?

विज्ञान कहता है
तीनो लग जाते हैं
इस गति को चलाने में
दोलन की आवृत्ति,
गति और आयाम बनाने में

तब तक यह जीवन है
जब तक साँसे हैं
इसके टूट जाने के बहाने
तो बस जरा से हैं
हमारी साँसो की डोर बँधी है
उस अद्वैत परमात्मा से
जो सत्-चित्त-आनन्द है
और इस दुनिया की सारी माया,
सारा प्रपञ्च
उसकी ही मुठ्ठी में बन्द है

यह धरती है स्थूल प्रकृति
मिट्टी, आग, पानी, हवा व आकाश
ये मिलकर बनाते हैं
प्राणी का स्थूल रूप
जिसे दिखाता है प्रकाश

चलते हुये पेण्ड्युलम की तीन अवस्थाएँ
यह साफ़-साफ़ बताती हैं
बचपन, जवानी और बुढापा
इन सबकी बारी
बारी-बारी से आती है

पूछता हूँ तब,
बचपन और जरावस्था
कैसे हुए अतिरंजित?

एक में छिपी है
अन्जान सम्भावना
जो भविष्य में आकार लेगी
दूजे में बैठी है
चुक गये होने की कसक
जो चुपचाप मन मार लेगी

क्या यही है ‘अनुभूति का शिखर’
परम सुख या परम दुःख
खौलना या हिम सा जम जाना
कि एक छोर पर जाकर
शक्तिहीन सा ठहर जाना
उल्टे पाँव
वापस हो जाना नीचे की ओर
जहाँ कोई ठहराव नहीं है
निराशा, दारुण्य, अन्धेरा
या मासूम, निश्छ्ल, अबोध बचपन का
भाव नहीं है

धरती का यथार्थ
सबसे निकट तभी आता है
जब पेण्ड्युलम अपने यात्रा-पथ के
बीचो-बीच
सबसे गतिमान चरण में जाता है।

यहीं से शुरू होती है
गुरुत्व से विपरीत
ऊपर उठने की कवायद
जो सामर्थ्य के हिसाब से
ले पाती है अपना आयाम,
गति और आवृत्ति,
फ़िर भी किनारे से लगकर
ठहर जाने से
बच नही सका कोई शायद

फिर चरम की ओर जाने को
और वहीं ठहर जाने को
मन उतावला क्यों है?
बीच के यथार्थ से पलायन को
यूँ बावला क्यों है?

यथार्थ में,
अच्छा लगता है गुनगुना पानी
या गुनगुनी धूप
जब सर्दी का जोर हो
अच्छा लगता है
धरती का ठण्डापन
जब प्रचण्ड गर्मी चहुँओर हो

हमें तो,
इस चरम पंथ से डर लगता है
इसलिए इस पेण्ड्युलम का मध्यमार्ग
एक सुहाना सफ़र लगाता है।
(सिद्धार्थ)

Tuesday, July 22, 2008

डॉ अनुराग की सलाह और उससे उपजा नैराश्य…

मेरी पिछली पोस्ट में टिप्पणी देते हुये डा.अनुराग ने अपने बेटे के जन्मदिन पर हवन कराने , एक आश्रम में सपरिवार जाकर कुछ समय बिताने और फ़िर शाम को आधुनिक तरीके से “birthday” मनाने का जिक्र किया था । यह पढ़कर मुझे भी प्रेरणा मिली। मंदिर जाकर माथा टेकने , प्रसाद बाँटने तथा घर में परिजनों के साथ बैठकर केक कटवाने, मोमबत्तियाँ बुझाने, happy birthday कहकर तालियाँ बजाने और विशेष दावत कराने का इन्तजाम तो हर साल के ‘मीनू’ में शामिल ही रहता था लेकिन इसबार मैने आश्रम जाने का मन भी बनाया।

तत्काल प्रेरित हो जाने के दो कारण थे – पहला यह कि 20 जुलाई को छुट्टी का दिन रविवार था, तथा दूसरा यह कि इलाहाबाद के त्रेतायुगीन भारद्वाज मुनि के आश्रम की दूरी मेरे घर से मात्र 1.5 किमी. होने के बावज़ूद मैं पहले कभी वहाँ जा नहीं सका था।



भारद्वाज आश्रम, इलाहाबाद



छात्र जीवन में भी इस आश्रम के पड़ोस में ही यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रहता था तथा गाहे-बगाहे ‘आनन्द-भवन’ की नक्षत्रशाला तक जाया करता था। उसके पास ही स्थित ‘भारद्वाज पार्क’ में भी घूम लिया करता था… और इसी के एक सिरे पर स्थित ‘स्विमिंग पूल’ में ही मैने तैराकी का क,ख,ग… सीखा था। किन्तु पास ही मौज़ूद आश्रम में जाने की कभी उत्कंठा नहीं हुई। कोई कारण नहीं… बस यूँ ही नहीं जा पाया था। बेटी के जन्मदिन पर आये अवसर का सदुपयोग करने की मंशा लिये मैं भारद्वाज आश्रम चल पड़ा।

अपनी माँ, पत्नी, बेटी वागीशा, पुत्र सत्यार्थ, दो भाइयों व एक भतीजे के साथ जब मैं वहा गाड़ी से उतरा तो आश्रम के मुहाने पर फैली गंदगी और कूड़े की बदबू ने स्वागत किया। हम अभी पैदल आगे बढ़ने को सोच ही रहे थे कि हमारी ओर दर्जनो जोड़ी आँखें इस उम्मीद में निहारने लगीं कि हम उनकी चादर पर सजाकर रखे हुए कुछ सिक्के खरीद लें। दस रूपए में आठ सिक्के… …ये दुकानें अधिकांशतः बूढ़ी औरतों ने बिछा रखी थी। ..हमें सिक्कों की जरूरत नहीं थी सो हम आगे बढ़ लिये। हमारे आगे-पीछे सभी दुकानों से सिक्के खरीद लेने की पुकार तेज होती गयी।

वहाँ मेरी आँखें कोई आश्रम जैसा स्थल ढूँढ रहीं थीं जहाँ कोई ज्ञानी, संत, महात्मा या साधु- सन्यासी मिल जाय, लेकिन हमें मिला बिलकुल उल्टा।



हम तेजी से चलते हुए सीढ़ियों तक पहुँचे। हम ऊपर चढ़ने का उपक्रम करते इससे पहले ही एक औघड़नुमा पुजारी जी हमें सड़क किनारे के मंदिर की ओर आकर्षित करने के लिए ऐसे बोल पड़े जैसे कोई दुकानदार अपने शो-रूम का सामान दिखाने का आग्रह करता है। हमने उनके देवता की ओर दूर से ही सिर नवाया और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आ गये।

ऊपर बड़े से प्लेटफॉर्म पर गेरुए रंग का प्राचीन मुख्य मंदिर है जिसमें पुरातन शिवलिंग स्थापित है। इसके चारो ओर अनेक छोटे-छोटे दूसरे देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों के मंदिर हैं। इनके बीच-बीच में वहाँ के पंडों और पुजारियों के परिवार निवास करते हैं। घरेलू कूड़ा और प्रयुक्त जल की गंदगी यत्र-तत्र बिखरी हुई मिली।

वहाँ मेरी आँखें कोई आश्रम जैसा स्थल ढूँढ रहीं थीं जहाँ कोई ज्ञानी, संत, महात्मा या साधु- सन्यासी मिल जाय, लेकिन हमें मिला बिलकुल उल्टा।

वहाँ सभी छोटे बड़े मंदिरों के दरवाजों पर चादर बिछाये या दानपात्र पर टुच्चा सा ताला लटकाये दर्शनार्थियों की बाट जोहती प्रौढ़ा स्त्रियाँ बैठी थीं जो अपने स्थान से ही एक साथ अपने-अपने मंदिर का दर्शन करने के लिए बुलाने लगीं। मैले-कुचैले कपड़ों में दो अनाहूत अधेड़ उम्र के पुरुष प्रकट होकर ये बताने लगे कि किधर जाएं और किधर न जाएं। कहाँ-कहाँ माथा नवाएं, कहाँ दक्षिणा चढ़ाकर पुन्य कमाएं और कहाँ माथे पर टीका लगवाएं। उनकी काँव-काँव के शोर में हमारी शान्ति की कामना दम तोड़ने लगी।

मंदिरों के भीतर रखी देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की मूर्तियाँ मानो सरकारी अव्यवस्था और अपने रखवालों के हाथों घोर उपेक्षा और गंदगी का दंश झेलते हुए उनकी लोलुप वृत्ति पर कुपित थीं। एक कक्ष में तो अनेक पुराने शिवलिंग लावारिस और अस्त-व्यस्त हालत में ढेर बनाकर रखे मिले।

हम जिधर कदम बढ़ाते उधर ही कुछ ऐसा सत्संग सुनने को मिलता- “आय हौ तौ कुछ धरम करि जाव… ई बत्ती क खर्चा कहाँ से आई? हम गरीबन क पेट कइसे भरी... ?” "आवऽ–आवऽ, ईहाँ भी आजाऽ, बड़का सेठ-साहुकार लागऽथ्हा, तोहार बएपार बढ़ी राजाऽ… मालिक तौहें अउरी दीहेंऽ, …कुछ ‘धरम’ करि जाव… … ऐ मल्किन! ई महासती अन्सुइया आ अत्री मुनी क अस्थान हौ, कुछ ‘धरम’ करि जाव… तोहार सोहाग बढ़िन् जाई…"


कान पर चोट कर रहे ये याचना के शब्द मेरी पत्नी को उद्वेलित कर रहे थे। हमने यथा सामर्थ्य कुछ दान-पात्रों में ‘धरम’ किया, लेकिन सबके साथ नहीं कर पाये। संख्या बड़ी थी… उनकी प्रतिस्पर्धा में सबको जिता पाना संभव नहीं हुआ। …हम कहीं बैठ नहीं पाये। घबराकर नीचे आ गये। मन में यही चल रहा था कि अब इस जगह दुबारा आने लायक नहीं है।


गाड़ी पर वापस पहुँचने तक वही आवाजें हमारा पीछा करती रहीं।… एक औरत पीछे-पीछे हमारी गाड़ी तक आ गयी। करुण आवाज़ में अपने अकेलेपन और निराश्रित होने का दुखड़ा रोने लगी तो पत्नी ने पूछा- “मेरे घर चलोगी? …वहाँ काम करोगी तो खाना कपड़ा और पैसा भी मिलेगा…” इतना सुनते ही उसका स्वर बदल गया- “असल में मुझे बीमारी है। पेट में…। काम नहीं कर पाती हूँ। ऐसे ही माँग कर काम चल जाता है।”

बच्चे तबतक गाड़ी में बैठ चुके थे। रेस्तराँ में जाने को देर हो रही थी…। वहाँ मेरी बेटी सबको अपने जन्मदिन की मिठाई खिलाने वाली थी। गाड़ी के भीतर से शोर होने लगा। हमने जल्दी से बची हुई रेज़गारी उस औरत के हवाले किया और गाड़ी में बैठकर चल दिए। मन में नैराश्य-भाव उग आया था।

Sunday, July 20, 2008

‘रोज़ का उठौना’ और मेरी बेटी का जन्म-दिन

आजकल ब्लॉग जगत में नारी की दशा और दिशा पर बहस का दौर चल रहा है। इसमें हम दोनो, यानि मेरी पत्नी और मैं शामिल हो लिए हैं। उन्हें कम्प्यूटर पर अपने विचार डालने में थोड़ी तकनीकी बाधा है इसलिए सारा आवेश मुझे ही भेंट कर देती हैं। इसलिए मेरी बैटरी ‘ओवरचार्ज’ हो लिया करती है। शुक्र है कि हम दोनो के विचारों में पर्याप्त समानता है, इसलिए घर का झगड़ा अन्दर ही सुलझा लिया जाता है। ये बात दीगर है कि कभी-कभी ज्यादा मशक्क़त करनी पड़ती है विचारों की समानता को ढूँढ कर निकालने में। ऐसी ही एक बहस के सत्र में मेरी धर्मपत्नी ‘रचना’ ने अपने मायके के एक परिवार का जिक्र किया था जहाँ नारी ब्लॉग को पहुँचने में शायद सौ साल लग जाँय। उसकी एक झलक इस शब्द-चित्र में प्रस्तुत है:-




इनका भविष्य क्या है?

अपने गाँव में यह कहानी रोज़ दुहरायी जाती देखती हूँ। मेरे पड़ोस की वह गरीब मजदूर औरत… चार बच्चे हैं उसके जो पाँच साल की ही उपज हैं। सबसे छोटा गोद में है। उससे छोटा शायद पेट में हो…। सुबह सोकर उठने के बाद जब हमारे बच्चे धूप निकलने से पहले दरवाजे पर खेलने निकलते हैं तो वह सुबह का सारा काम निपटाकर अपने मर्द के साथ खेत में काम करने निकल रही होती है।
बच्चों के लिए रोटी, भैंस के लिए चारा, और मर्द की नहारी यह सब इनके सोकर उठने से पहले तैयार कर लेती है क्योंकि जगने के बाद वे करने नहीं देंगे। मर्द तो गाली भी देगा।

…खेत से वह दोपहर बाद सिर पर चारे या फसल का बड़ा सा गठ्ठर लादे दुलुकिया चाल से भागती आती है। उसके पीछे-पीछे उसका मर्द भी आता है… थोड़ा बड़ा गठ्ठर सिर पर लादे हुआ। लेकिन उसकी चाल धीमी और स्थिर है।

वह गठ्ठर पटक कर चारपायी पर धड़ाम से बैठता है ताकि उसके आने की सूचना घरवाली को हो जाय। बताना न पड़े। वह उसके खाने के इन्तजाम में लग जाती है। बीच में भागकर आती है और गुड़-पानी रख जाती है। पति की थकान से कातर है। …वह तो जैसे थकती ही नहीं है।

बच्चे माँ के आने पर खुश हैं। कटोरा लेकर चुल्हे को घेर के बैठे हैं। अपने-अपने झगड़े की पंचायत करवाना चाहते हैं। किसी की नाक बह रही है तो किसी का कुर्ता अभी-अभी फट गया है।

…बड़कुआ ने झिंगना का कान उमेंठ दिया …जोतिया बाबा के आम तोड़ने पेड़ पर चढ़ गयी थी, पकड़ाने के डर से कूद कर भागी तो एड़ी में चोट आ गयी …सुरसतिया पोखरा में घुसी थी…कमल तोड़ने… इन बातों के बीच भी सबकी निगाहें चूल्हे पर बदक रहे भात पर लगी है।

वह जल्दी-जल्दी तरकारी काट रही है। गोद में बच्चा दूध पी रहा है। पहँसुल पर उसका हाथ तेजी से चल रहा है। वैसे ही जैसे बाहर बैठा उसका मर्द हथेली पर तेजी से सुर्ती मल रहा है।

…जलता हुआ भोजन परोस कर बच्चों को देती है। मर्द भी आसन जमा कर भात का पहाड़ जीम रहा है। बटुली की तलहटी से पल्टा लड़ रहा है। टन्…टन्। मतलब उसके हिस्से का थोड़ा ही बचा है… कोई बात नहीं। बच्चे और मरद का तो पूरा हो गया…।

तभी जोर से चीखने की आवाज़ हमारे घर तक पहुँच आती है। मर्द ने फिर उसे मारा है। भद्दी सी गाली के बीच यह सुनायी देता है कि आज फिर नमक ज्यादा डाल दिया सब्जी में।…
रोज ही …कभी नमक ज्यादा …तो कभी मिर्चा कम, कभी चावल जल गया तो कभी रोटी कच्ची रह गयी।

बहाने बदलते हैं लेकिन नहीं बदलती है तो उसकी नियति… रोज गाली और मार का उठौना …और बटुली की तलहटी से बजने वाली पल्टे की टन-टन… रोज़-ब-रोज़।

सोचता हूँ मत्स्य-न्याय को समुद्र के भीतर तक सीमित कर दूँ। …पर कैसे?


और हाँ, मेरी बेटी वागीशा २० जुलाई को अपना आठवाँ जन्मदिन मना रही है। उसे आपके स्नेह और आशीर्वाद की प्रतीक्षा है। अपने लिए आपका आशीर्वाद और शुभकामना संदेश वह अपने ई-मेल पर पाना चाहती है जिसका पता है- vagisha.tripathi@gmail.com उसके चेहरे पर ढेरों मुस्कान देखने के लिए आप सबके आशीर्वाद की मांग कर रहा हूँ। (सिद्धार्थ)

Wednesday, July 16, 2008

बची-खुची पेंशन के लिए प्राप्त प्रार्थना-पत्र

हमारे यहाँ सरकारी दफ़्तरों में जब दूर-दराज से गाँव-देहात के लोग अपना कोई काम कराने आते हैं तो उनकी अज्ञानता को भुनाने के लिए अनेक पढ़े-लिखे लोग दुकान सजाये मिल जाते हैं। अमुक काम किस दफ़्तर से होगा, किस जुगाड़ से होगा, और ‘खर्चा-बर्चा’ क्या लगेगा यह सब कुछ सहर्ष बताने और करा देने को तैयार लोग कचहरियों और सरकारी कार्यालयों के आस-पास घूमते या अड्डा बनाकर बैठे हुए आसानी से पहचाने जा सकते हैं। अशिक्षा और पिछड़ेपन के अंधकार में रास्ता तलाशते लोगों के लिए ये एक टिमटिमाते दिए का काम करते हैं।


किसी भी ‘साहब’ के दफ़्तर में जाने पर सबसे पहले एक अदद दरख़्वास्त की ज़रूरत पड़ती है। बहुत लोग ऐसे हैं जो केवल दूसरों की दरख़्वास्त लिखकर और उसे सम्बन्धित अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर अपनी जीविका चला रहे हैं। इसमें कुछ ऐसे जूनियर वकील भी हैं जिनकी प्रैक्टिस गोते लगा रही है। शुरू-शुरू में जब मुझे एक ही लिखावट और भाषा-शैली के प्रार्थना-पत्र अलग-अलग फरियादियों की ओर से मिलते थे तो मुझे आश्चर्य हुआ था, लेकिन बाद में आदत पड़ गयी। बल्कि इससे एक सुविधा यह हो गयी कि पूरा कागज पढ़ना नहीं पड़ता। काम की बात कहाँ लिखी है, यह कागज हाथ में लेते ही पता चल जाता है।

इन प्रार्थना-पत्रों के अवयव(contents) उनकी तुलना में अलग तरीके से लिखे गये होते हैं जो फ़रियादी द्वारा स्वयं तैयार किए जाते हैं। फीस देकर लिखाये गये पत्रों में विस्तार का अभाव होता है तथा भाषा सरकारी टाइप की होती है, जबकि स्वयं प्रार्थी द्वारा तैयार प्रार्थना पत्रों में अनावश्यक विस्तार, बातों की पुनरावृत्ति और दीनतापूर्ण आग्रह का समावेश होता है। कोषागार में आमतौर पर बुजुर्ग पेन्शनभोगियों या उनके आश्रितों द्वारा भुगतान से संबंधित पत्राचार पढ़ने को मिलता है जो प्रायः नीरस और उबाऊ ही होता है। लेकिन कल मुझे एक ऐसा प्रार्थना पत्र मिला जिसे पढ़कर मुझे यहाँ बताने लायक ज्ञान की प्राप्ति हो गयी।

जिलाधिकारी को लिखे गये इस पत्र के माध्यम से प्रार्थी ने अपने दिवंगत दादा-दादी की पेंशन की कुछ बची-खुची धनराशि(life-time arrears LTA) के भुगतान में विलम्ब की शिकायत करते हुए तत्काल भुगतान की गुहार लगायी है। यह एक पढ़े-लिखे अतृप्त लेखक की कलम से लिखी गयी गाथा है जिसे सरकारी दफ़्तर में बैठे हुए एक क्लर्क से घोर शिकायत हो गयी है क्योंकि वह उसका चचेरा भाई भी है। करीब छः पृष्ठों में तैयार यह प्रार्थना-पत्र पूरा का पूरा पढ़ने लायक है लेकिन मैं यहाँ इसका मुश्किल से संपादित किया हुआ वह अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें उन्होने अपनी पहचान (identification) के लिए कोषाधिकारी के कार्यकक्ष में उपस्थित होने की आवश्यकता को खारिज़ करने का प्रयास किया है:-

[यथासम्भव उनका आलेख हूबहू देने का प्रयास कर रहा हूँ इसलिए वर्तनी और पैराग्राफ (अ)परिवर्तन में कुछ खटके तो मेरा दोष मत मानिएगा]
“…काउण्टर नम्बर-एक पर तैनात dealing klerk के पिता और मेरे पिता दोनो चचेरे भाई हैं। इनके पितामह(grand father) और मेरे पितामह दोनो सगे भाई हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मेरे पिताजी गवर्नमेण्ट प्रेस में एक सरकारी मुलाजिम थे। वहाँ से on deputation इलाहाबाद हाईकोर्ट के coping section के S.O. रहे और तत्पश्चात नायब तहसीलदार। किन्तु मेरे पिताजी ने ब्रिटिश ब्योरोक्रेसी की नौकरी करने की अपेक्षा मातृभूमि की सेवा करना अधिक श्रेयस्कर समझा। अतः सन १९४२ के महात्मा गान्धी के ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया फलतः तीन बार जेल गये। जिनमें से दो बार नज़रबंद (security prisoner) रहे। स्वतंत्रता बाद, यह वर्ष १९५० से ५७ के मध्य की बात है कि उनकी लिखी हुई एक पुस्तक ‘ज्ञानालोक’ उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कक्षा-आठ में स्वीकृत थी। जब ‘भूदान’ के जनक आचार्य विनोबा भावे (संभवतः वर्ष१९५५ में) पहली बार इलाहाबाद आये तो जो ‘जिला भूदान समिति-इलाहाबाद’ गठित की गयी थी उस समिति का प्रथम मंत्री बनने का गौरव मेरे पिताजी को मिला। बहुमुखी प्रतिभा के धनी होने के कारण मेरे पिताजी के व्यक्तित्व, प्रगति, उत्थान तथा बुलन्दियों से इनका परिवार ईर्ष्या, द्वेष जलन रखता था। सच बात यह है कि ‘विभीषण’ हर युग में पैदा हुए हैं, हर युग में रहते हैं। विभीषण में कई विशेषण थे- १.विभीषण अपने भाई की प्रतिभा, योग्यता, प्रगति और बुलन्दियों पर गर्व नहीं करता वरन्‍ वह अपने भाई से ईर्ष्या, द्वेष जलन रखता है। २.विभीषण की दूसरी विशेषता यह रही कि भाई के शत्रु उसे मित्र, शुभचिन्तक, हितैषी लगते हैं। ३.विभीषण की तीसरी विशेषता यह रही कि अपने भाई के शत्रुओं से मिलकर उनकी सहायता से अपने ही भाई से लड़ता है। यहाँ भी यही हुआ कि वर्ष १९७० में इनका पूरा परिवार इनके पिता, इनके सगे चाचा तथा ये चारो भाई मेरे पिता व मुझसे तथा मेरी माता से लड़ पड़े। और तबसे मेरा व इनके परिवार का उठना बैठना, दुआ सलाम (राम रहारी), खाना पीना सब छूट गया, सब समाप्त हो गया। विभीषण के तन, मन, धन की सहायता तथा अथक प्रयास से कालजयी, अपराजेय, महाबली, महापंडित रावण का बध हो जाता है।…”
…“मुझे यह लिखने में, यह बताने में कोई संकोच नहीं कि मेरे पिता के उन सभी शत्रुओं की मदद लेकर यहाँ इस ‘विभीषण काका’ ने मेरे पिताजी की हत्या कर दी। किन्तु यह जीतकर भी, विजयी होकर भी अपने को हारा हुआ महसूस करते हैं। अतः ऐसे में अगर यह कुछ न करें तो इनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है”…
…“विभीषण की चौथी विशेषता को बग़ैर बताए मुझे यह प्रकरण अधूरा –अधूरा सा लगता है। विभीषण की चौथी विशेषता यह रही कि वह अपने ही वंश का नाश करवाता है। यहाँ भी यही हुआ। उस पैतृक गाँव से भाग आये और अब वहाँ कुछ भी नहीं है। उस पैतृक गाँव से ‘कलवार वंश’ का नाश हो गया”…
“इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि Dealing clerk जबसे होश संभाले हैं तबसे मुझे जानते पहचानते हैं।”…

इन विद्वान सज्जन का आशय यह है कि जब दफ़्तर का बाबू इन्हें जानता ही है तो सक्षम अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपनी पहचान कराने और अवशेष पेंशन के भुगतान के प्रपत्रों पर कोषाधिकारी के सामने हस्ताक्षर करने की ज़रूरत नहीं है। इसी ग़ैरजरूरी काम से बचने के लिए इन्होने जिलाधिकारी, मण्डलायुक्त और शायद मुख्यमंत्री तक अपनी राम कहानी लिख भेजी है। कलेक्टर साहब से तो ये कई बार मिल भी चुके हैं। लेकिन मुझे इनसे मिलने का सौभाग्य नहीं मिल सका है। इसके लिए इनको सादर व्यक्तिगत पत्र भी लिख चुका हूँ कि मेरे ऑफ़िस में आकर अपने पावन हस्ताक्षर दे जाँय, लेकिन उसके बदले इनके द्वारा रचित अनमोल साहित्य ही मेरे हाथ लग रहा है।

कुल ४००० रुपयों के भुगतान के बहाने मुझे इतना ज्ञान प्राप्त हो गया कि मैने कृतज्ञता वश इनका चेक सीधे बैंक को प्रेषित करा दिया है। इनकी फोटो पर ही मैने ‘इन्हे देखकर पहचानने और तभी भुगतान करने’ की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर दिया।…इस उम्मीद में कि शायद इनकी आत्मा को शान्ति मिल जाय।

Saturday, July 12, 2008

मिलिए ९६ साल के जवान से…

आज मुझे एक ९६ साल के जवान से मिलने का मौका मिला। जी हाँ, जवान से- क्योंकि उनकी आवाज़, और अन्दाज़ में कहीं से भी बुढ़ापे की झलक नहीं मिली। और आँखें तो अभी भी ६/६ का नम्बर बताती हैं।

अपनी बैंक पासबुक की प्रविष्टियाँ देखते हुए



मेरे ऑफिस में स्वयं चल कर आने वाले पेन्शनभोगियों में सबसे अधिक उम्र का होते हुए भी इनके हाथ में न तो छड़ी थी, न नाक पर चश्मा था, और न ही सहारा देने के लिए कोई परिजन। …बुज़ुर्गियत पर सहानुभूति पाने के लिए कोई आग्रह भी नहीं था। इसीलिए मेरी जिज्ञासा बढ़ गयी और दो-चार बातें आपसे बाँटने के लिए नोट कर लाया…

श्री आदित्य प्रसाद उर्फ़ राम प्रसाद जी जब १९ वर्ष के थे तो गांधी जी के आह्वाहन पर ‘नमक-सत्याग्रह’ आन्दोलन से जुड़ गये। यह वर्ष १९३० की बात है। इसके पहले बचपन में ही विदेशी कपड़ों की होली जलाने के कई आयोजनों में अंग्रेजों की लाठियाँ खायी। जेल गये। दो-दो नाम रखने की ज़रूरत भी जेल यात्रायों में ही पड़ी। बताते हैं-

अंग्रेज जिस को पकड़ते थे और जेल में डालते थे, उसका नाम-पता लेकर गाँव जाते थे। …वहाँ घर वालों को पूछताछ में तंग करते थे और घर की नीलामी कुर्की भी हो जाती थी। इसलिए हमें गाँव-घर में प्रचलित नाम से अलग एक नाम जेल में बताने के लिए रखना पड़ता था। मैं जेल में ‘रामप्रसाद’ था और गाँव में ‘आदित्य प्रसाद तिवारी’। लेकिन ‘तिवारी’ का इश्तेमाल अब मैं नहीं करता हूँ…

"लेकिन अंग्रेज़ इस झांसे में आते कैसे थे?"मैने पूछा, तो वे सहजता से बोले-
"दुश्मन अंग्रेज भी सत्याग्रही की कही बात पर पूरा विश्वास करते थे। ...उन्हें पता था कि इनकी जान भले चली जाएगी लेकिन ये झूठ नहीं बोलेंगे…"

इलाहाबाद जिले की मेजा तहसील के गाँव ‘उपड़ौरा लोहारी’ में सादा जीवन बिताने वाले आदित्य प्रसाद जी जब ८ वर्ष के थे तभी इनके पिताजी का निधन हो गया था। वे इलाहाबाद के नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर थे। इन्होंने स्वयं हिन्दी-उर्दू विषय से ‘मिडिल’ पास कर लिया था जिसके बाद सरकारी शिक्षक की नौकरी तय थी, किन्तु गान्धी जी की पुकार ने रास्ता बदल दिया।

मुख्य कोषाधिकारी के कक्ष में




“अपना सुख-चैन गँवा कर बड़ी कुर्बानी से पायी हुई आज़ादी के बारे में अब क्या सोचते है?” पूछने पर हल्की सी निस्पृह मुस्कान उनके चेहरे पर तैर जाती है, पहली बार में कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। कुरेदने पर थोड़े संकोच के साथ बस इतना बताते हैं- “आज़ादी तो बहुत बढ़िया मिल गयी थी …लेकिन अब बहुत गड़बड़ हो गया है… कोई तहसील भ्रष्टाचार से खाली नहीं है।”

Thursday, July 10, 2008

समय कम पड़ने लगा है…



ऑफिस में आज काम कुछ ज्यादा था। महीने की शुरुआत में वेतन और पेंशन का काम बढ़ ही जाता है। …शाम को करीब सात बजे घर पहुँचा। …शारीरिक थकान के बावज़ूद मन में यह जानने की उत्सुकता अधिक थी कि सुबह-सुबह ब्लॉगवाणी में आयी जिन पोस्टों पर धुँवाधार टिप्पणी कर आया था, उसपर अन्य चिठेरों ने क्या कहा है। …अपनी पोस्ट पर क्या टिप्पणियाँ आई हैं इसे जानने की उत्कंठा तो थी ही। ऑफिस में अन्तर्जाल बंद हो गया है इसलिए घर का ही सहारा है।
घर मे घुसते ही पत्नी ने मुस्करा कर स्वागत किया लेकिन उसमें छिपी देर से आने की शिकायत साफ झलक रही थी। उन्होने ठण्डा पानी रखा, चाय पूछा, और रसोई में जाकर महिला रसोइए को कुछ काम बताने लगीं। इस बीच मेरा डेढ़ साल का बेटा खुशी से चहकते हुए मेरे पैर में लिपट चुका था- तोतली भाषा…दैदी आदिआ… दैदी आदिआ…। उसे गोद में उठाकर मैं कम्प्यूटर से लगी कुर्सी पर बैठ जाता हूँ।

सत्यार्थ मेरी ऊपर की जेब से एक-एक कर कलम, चश्मा, मोबाइल और कागज वगैरह निकालने की कोशिश करता है…मैं उसे रोकने की असफल कोशिश करता हूँ। कैसे रुला दूँ उसे? उसे दुनिया के किसी भी खिलौने से बेहतर मेरी ये चीजें लगती हैं। …चश्मा दो बार टूट चुका है, मोबाइल रोज ही पटका जाता है…इसपर चोट के स्थाई निशान पड़ गये हैं। …फिर भी कोई विकल्प नहीं है…उसका गोद में बैठकर मस्ती में मेरा चश्मा लगाना, मोबाइल पर बूआ, दादी, बाबाजी, चाचा, दीदी, डैडी आदि से बात करने का अभिनय देखकर सारी थकान मिटती सी लगती है।

…लेकिन आज कुछ उलझन सी हो रही है। बार-बार मेरा ध्यान कम्प्यूटर की ओर जा रहा है… टेढ़ा होकर ‘यूपीएस’ और ‘सीपीयू’ का स्विच ऑन कर देता हूँ। …बेटा मोबाइल पर ‘बूआ’ को बुला रहा है जो सैकड़ो मील दूर इस बात से बेख़बर होगी। …स्क्रीन पर ‘पासवर्ड’ मांगा जा रहा है…माउस की लाल बत्ती जल रही है। मैं फिर टेढ़ा होकर पासवर्ड भरता हूँ …इधर मोबाइल पर अब ‘दादाजी’ की पुकार हो रही है। उधर से आवाज़ न आने पर गुस्सा मोबाइल पर उतरने का डर है… इसलिए मेरा ध्यान लगातार उधर बना हुआ है …मेरे चश्में की एक डण्डी टेढ़ी होकर उसके कान के बजाय गर्दन पर फँसी हुई है। मैं मुश्किल से उसे उतारकर ठीक करता हूँ …लेकिन जेब में या कहीं और नहीं रख पाता। वह फिर ठुनकता है और चश्मा वापस उसकी नाक पर…

इन्टरनेट कनेक्शन के लिए कर्सर को यथास्थान क्लिक करता हूँ। …ब्लॉगवाणी बताती है कि १७ नयी मेल आ चुकी है। मेरी टिप्पणियों के फॉलोअप्स, और मेरी पोस्ट पर आयी टिप्पणियाँ इसमें शामिल होंगी। …इन्हें तुरन्त देखना चाहता हूँ। …उधर मेरी मोबाइल फर्श पर पटकी जा चुकी है। उसे उठाकर छिपा देता हूँ …लेकिन अब साइकिल पर बिठाकर घुमाने की फरमाइश है। अब तो उठना ही पड़ेगा। मैं उसका ध्यान कम्प्यूटर स्क्रीन पर आते-जाते चित्रों की ओर खींचने का प्रयास करता हूँ…लेकिन असफल। …उसे इससे कोई मतलब नहीं। मैं उसे अनसुना करने का यत्न करता हूँ… लेकिन गोद में मचलते हुए फिर से साइकिल पर ले चलने का कातर आग्रह… मैं ठुकरा नहीं पाता हूँ।


मैं उसे उसकी साइकिल पर बिठाता हूँ… पीछे से धकियाता हुआ चलता हूँ- बेडरूम, टीवी-रूम, भीतरी बरामदा, ड्राइंग-रूम, लॉबी फिर बाहरी बरामदे तक पहुँकर वापस उसी रूट से लौटता हूँ…। झुककर की गयी इस कसरत से मेरी कमर जवाब दे रही है लेकिन बेटा किलकारी मार रहा है… चाहता है अगला राउण्ड…। ओह! यह नहीं हो सकता… अजी सुनती हो, सम्भालो इसे… परेशान कर रहा है… साइकिल पर घुमाना मेरे वश का नहीं है…। कमर पकड़कर सीधा हो लेता हूँ। घर की नौकरानी उसे ले जाने का प्रयास करती है तो दैदी-दैदी कहकर और तेज़ रोने लगता है। किसी और का घुमाना उसे मंजूर नहीं…।

थककर कुर्सी पर बैठता हूँ, उसे साइकिल पर से उठाकर चुप कराने की कोशिश करता हूँ। इसबार उसका ध्यान कम्प्यूटर पर लाने में सफलता मिल जाती है। …लेकिन उसे ब्लॉगरी से क्या काम? वह ईयरफोन पर झपटता है… मेजपर कबकी रखी ठ्ण्डी हो चुकी चाय गिरते-गिरते बच जाती है… ईयरफोन कान पर चढ़ाना सीख चुका है, सो चढ़ा लेता है… अब फरमाइश करता है- आदा… आदा…। यानि कि ‘विण्डोज़ मीडिया प्लेयर’ चलाएं और हिमेश रेशमिया का कर्णभेदी गीत “झलक दिखला जा” सुनवाएं। कुछ देर की शान्ति की आशा लिए मैं गाना चला देता हूँ। …वह मुस्करा देता है, मैं ‘माउस’ पकड़ता हूँ …ई-मेल खुल रहा है …लेकिन अब सत्यार्थ ईयरफोन अपने कान से हटा कर मेरे कान पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा है… उफ्… मना करने पर रोने लगता है। …मेरा धैर्य जवाब देने लगता है।

मैं अपनी थकान को दरकिनार करके भी ब्लॉगजगत से नहीं जुड़ पाने का मलाल लिए दुःखी हो रहा हूँ तो बेटा इसलिए रो रहा है कि ‘दैदी’ उसको पूरा समय नहीं दे रहे हैं। मैं चुपचाप बिस्तर पर लेट जाता हूँ। पत्नी को पास बुलाकर उनसे अपनी दमित इच्छा पर चर्चा करना चाहता हूँ। …वह थोड़ी देर में आ जाती हैं। मैं अपने मन की उलझन विस्तार से बताता हूँ- सुबह बरसात की वजह से दौड़ नहीं पाने की चिन्ता, कोर्ट में बिजली गुल हो जाने से बैडमिण्टन मिस हो जाने की फिक्र, ऑफिस में तमाम बेतुके और बोरिंग कामों में समय बर्बाद होने का मलाल, वहाँ इण्टरनेट की सुविधा ठप होने की परेशानी, घर आने पर बेटे के साथ न्याय न कर पाने का अपराधबोध, और ‘सत्यार्थमित्र’ पर कुछ नया पोस्ट करने के लिए देर रात तक जगने से अनिद्रा और सिरदर्द…

…वह चुपचाप सुनती हैं। बीच में कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। मेरी उलझन कुछ बढ़ सी जाती है…। मैं कुरेदता हूँ..। उन्होंने चेहरा छिपा लिया है…। मैं चेहरे को दोनो हाथोंसे पकड़कर अपनी ओर करता हूँ… दो बड़ी-बड़ी बूँदें टप्प से मेरे आगे गिरती हैं… क्या आपकी इस उलझन भरी दिनचर्या में मेरे हिस्से का कुछ भी नहीं है? …मैं सन्न रह जाता हूँ

…मेरे पास कोई जवाब नहीं है। …है तो बस एक अपराध-बोध… …

Saturday, July 5, 2008

चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से...

ब्लॉग मण्डली दहल रही है, मचल रहे तूफान से।
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥१॥

‘मसि’जीवी अब हुआ पुरातन, ‘माउस’जीवी उछल रहा,
धूल खा रही कलम-दवातें, बिन कागज सब निकल रहा।
नयी प्रोफ़ाइल खोल रहे हैं, ब्लॉगर देखो शान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥२॥

स्वतंत्रता तब भले रही हो,लेकिन अवसर कमतर था ,
लिखने की अभिलाषा थी, पर छपता तो मुठ्ठी भर था।
ढूँढ रहे थे पाठक तब, वे लगे रहे जी जान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ३॥

प्रिन्ट-मीडिया के प्रहरी, नौ-सिखिए को धकियाते थे,
प्रतिभा खरी धरी रह जाती,घर-बैठे बतियाते थे।
आज मुझे लौटा डाला जी उसने बड़े मकान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ४॥

संपादक जी को रचनाएं पोस्ट बहुत सी कर आया,
धन्यवाद के साथ लिफाफा, हरदम वापस घर आया।
जो भी उसने सुना इधर से,निकल गया उस कान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ५॥

पर अब भागम-भाग थम गयी इण्टरनेट के आने से,
ब्लॉगजगत ने अवसर खोला लिखने लगे ठिकाने से।
इलेक्ट्रॉन की करें सवारी जुड़ने लगे जहान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ६॥

क्या लिखना है, क्यों लिखना है, कैसे उसे सजाना है?
सब कुछ अपने हाथ आ गया, मनचाहा छप जाना है।
रपट, कहानी, कविता लिख लें या भर दें अब गान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ७॥

यूँ मिलती इस आजादी का, कृष्णपक्ष कुछ देखा है,
उचित संग अनुचित भी है, मिट रही बीच की रेखा है।
चिठ्ठाकारों में कुछ भाई, भरे हुए अभिमान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ८॥

निज-भाषा और सभ्यता की, मर्यादा कुछ-कुछ डोल रही,
नंगी स्वतंत्रता हुई आज, जो सिर चढ़कर के बोल रही।
कड़वी सच्चाई की बातें, करते जो विकट-बयान से
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥ ९॥

कुछ स्वर तो इतने तीखे हैं, ज्यों गरल-पान कर आये हैं,
मानो ब्लॉगिंग के भस्मासुर, शिव जी ने इन्हें बनाये हैं।
जैसे हुई विरक्ति इन्हें नर-नारी के गुणगान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥१०॥

कुछ विकट चिठेरे कलमतोड़, हमलावर बन कर लिखते हैं,
किंचित् प्यारा है विघ्नतोष, रणभूमि जमाये दिखते हैं।
अब क्या उम्मीद करें भाई इस बदले से इन्सान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥११॥

कुछ नारीवादी बहनें हैं, हथियार लिये पहरा देतीं,
जो कुछभी बोल पड़े ‘भाई’, तो घाव वहाँ गहरा देतीं।
हो गयी शिकायत है इनको, शायद अपने भगवान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥१२॥

क्या कोई सत्य नहीं ऐसा, जो सार्वभौम माना जाए,
क्या सदा जरूरी है विरोध, जो बस विरोध ठाना जाए?
अज्ञानी अन्धियारा तो मिटता है सच्चे ज्ञान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥१३॥

बस चाहे यह ‘सत्यार्थमित्र’, यूँ बात बिगड़ने ना पाती।
सबके सच का हो आमेलन, इक साझी दुनिया बस जाती॥
कुछ अच्छे संकेत मिले दुनिया को हिन्दुस्तान से;
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥१४॥

ब्लॉग मण्डली दहल रही है, मचल रहे तूफान से।
चरमपंथ की हवा चली है, मध्यमार्ग हलकान से॥


(हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें.- सत्यार्थमित्र)

Thursday, July 3, 2008

ठोंकि लऽ कपार ए बाबू…

कहते हैं शादियाँ ईश्वर द्वारा स्वर्ग में ही तय कर दी जाती हैं। धरती पर तो केवल उसके फेरे करा दिए जाते हैं। इसप्रकार जैसा भी जोड़ीदार मिले उसे ईश्वर की इच्छा और अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेने की सलाह दी जाती है। हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में अभी भी शादी को अटूट गठबन्धन (irreversible knot) माना जाता है। ऐसे में कभी विडम्बनापूर्ण रिश्ते भी नजर आते हैं। एक बानगी इस भोजपुरी गीत के माध्यम से… …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………




ठोंकि लऽ कपार ए बाबू, बीबी हो गैलि बेकाबू।
मेहरी हो गैलि बेकाबू, ठोंकि लऽ कपार ए बाबू॥

चाहे लऽ घर के ई लछिमी हऽ जइसे
घर के भी मन्दिर बना देई वइसे
सांझो सबेरे के दीया आ बाती
संस्कार सुन्दर बढ़ाई दिन राती

बाकिर ई बोलेले- बाय - बाय डार्लिंग…
“दीज़ सिली कस्टम्स आइ कान्ट डू”
(These silly customs I can’t do)
ठोंकि लऽ कपार…

होली, दशहरा, दिवाली जो आवे
चाहेलऽ भोजन विशेष ई बनावे
पारंपरिक ढंग से ही मनावे
खीर,दालपूड़ी आ गुझिया खियावे

बाकिर ई बोलेले- हाय माई डार्लिंग…
“लेट अस एन्जॉय इन हैवेन्स ड्यू ”’
(Let us enjoy in Heaven’s Dew)
ठोंकि ल कपार…

चाहऽ जो घर में ई चूल्हा जलावे
होते बिहान असनान करि आवे
प्रेम-भाव-रस भीनल भोजन बनावे
पती-परमेश्वर के पहिले खियावे

बाकिर ई बोलेले-नॉट माई डार्लिंग…
“आई लाइक बेड-टी व्हाई डोन्ट यू”
(I like bed-tea, why don’t you?)
ठोंकि लऽ कपार…

चाहे लऽ घर के पुरनियन के आदर
माता-पिता जी के सेवा हो सादर
अतिथी इष्ट-मित्र सबै खुश होवें आके
सत्कार गृह-लच्छिमी जी से पाके

बाकिर ई बोलेले- शटप माई डार्लिंग…
नो कैन आई बीअर, अदर दैन यू
(No can I bear other than You)
ठोंकि लऽ कपार…

नइहर से एकरे जो केहू आ जाला
रंग-ढंग एकर तुरंत बदलि जाला
चाहेले दफ़्तर से छुट्टी तू लेलऽ
‘सारे के बेटा’ के साथ तू खेलऽ

आखिर तू बोलेलऽ– उफ़् माई डार्लिंग
काश जाके मायके में बस जाती तू…
(I wish you go to your parents)
ठोंकि ल कपार…