हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Sunday, June 29, 2008

एक ठेले पर सिमटी जिन्दगी…

इलाहाबाद में दूर-दूर से आकर पढ़ाई और ‘तैयारी’ करने वालों का एक काम कमरा ढूँढना भी होता है। मैं भाग्यशाली था जो हॉस्टल जल्दी मिल गया। लेकिन बालमन की तकलीफ़ लम्बी खिचती रही है। … इसी जद्दोजहद पर उनके लम्बे आलेख के संपादित अंश प्रस्तुत हैं..................................................................


हमने इलाहाबाद में कदम रखने के बाद और पहला कमरा खोजने के दौरान ही यह जान लिया था कि कमरा ढूँढते वक्त मकान- मालकिन को अनिवार्य रूप से ‘भाभी’ कहना होगा, उनकी उम्र चाहे जो हो। जब सुबह-सुबह इसी रिश्ते के ‘भैया’ ने आवाज देकर ऊपर बुलाया तो मुझे इस बात का बिल्कुल भी अन्दाजा न था कि समस्या इतनी गंभीर होगी। मैं सोच रहा था कि शायद लॉज़ के किसी लड़के का किराया बाकी होगा जिससे ‘भैया’ स्वंय न कहना चाहते हों और मेरे माध्यम से कहलवाना चाहते हों। या हो सकता है किसी लड़के ने नल खुला छोड़ दिया हो या बाथरूम का बल्ब जला रह गया हो, यही सब दिखाने-सुनाने के लिये बुलाया हो। ऐसी परेड अक्सर होती ही रहती थी इसलिये मैं बहुत चिंतित नहीं था।

ऊपर पहुँचा तो मेरा स्वागत एक कप चाय के साथ ५० वर्षीया भाभीजी ने किया। भैया पेपर के पहले पन्ने पर छपी आत्महत्या की एक खबर पढ़ते-पढ़ते बोले- “आज-कल के लड़कों को पता नहीं क्या हो गया है? समस्याऒं का सामना ही नहीं करना चाहते। छोटी सी समस्या पर ही परेशान हो जाते हैं और बिना घरवालों की चिन्ता किए आत्म-हत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।”

मैने भी उनकी ‘हाँ मे हाँ’ मिलाई और अपनी ओर से एक लाइन फ़ेंक दी, “यह तो कायरता है।”
भैया ने झट से मेरी बात पकड़ ली और बोले- “तुम तो कायर नहीं हो? मैं सकपका गया, इस प्रश्न का क्या मतलब?
उन्होंने बात साफ की- “असल में एक समस्या आन पड़ी है। मेरे एक दूर के रिश्तेदार का लड़का इलाहाबाद आ रहा है, …उनका कहना है कि आप इस लड़के को अपने पास रखें।…अब तुम तो जानते ही हो कि ऊपर तो कोई कमरा खाली है नहीं … नीचे ही किसी से खाली कराना पड़ेगा। अगर तुम किसी लड़के से कहकर कोई कमरा खाली करा दो तो बड़ा अच्छा रहे।”

पूरी बात सुनकर मुझे ‘आत्महत्या’…‘समस्या का सामना’ …और ‘कायरता’ की कड़ियाँ जुड़ी हुई नज़र आने लगीं। मेरी समझ में आ गया कि मुझे कमरा खाली करने की नोटिस दी जा रही है।

फिर भी मैने कहा- “यहाँ सभी मेरे भाई जैसे हैं। मैं किसी से नहीं कह पाऊंगा।”
“तुम तो जानते ही हो मैं किसी से कमरा खाली करने के लिये नहीं कहता, बड़ी तकलीफ़ होती है” भैया ने अत्यंत मार्मिक अंदाज में कहा।
“तो भाभी कह दें!” मैने अपनी आवाज में आई हुई तल्खी को छिपाते हुए कहा।
“वह भी नहीं कहना चाहती”
भैया के इतना कहते ही मैंने गुस्से में कहा- “तो क्या मैं ही बलि का बकरा मिला हूँ? साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते कि कमरा खाली कर दो।”
…“देखो ऐसी बात नहीं है; तुम नाहक ही गुस्सा कर रहे हो, तुम तो हमारे सबसे पुराने किरायेदार हो”।
“इसीलिये तो” मैने बीच में ही टोका, “इसीलिये आप मुझसे कमरा खाली कराना चाहते हैं जिससे किराया बढाया जा सकें, …आपका कौन सा रिश्तेदार आ रहा है मुझे अच्छी तरह पता है।” मैने अपने स्वर में कठोरता लाते हुए पूछा- “कब तक खाली करना होगा?”

“लगता है तुम बुरा मान गये, पर अगर तुम कमरा खाली करना ही चाहते हो तो तीन दिन के अन्दर हो जाय तो बेहतर रहेगा”, इस आवाज में छुपी खुशी को मैं साफ़ महसूस कर रहा था।

“पर सिर्फ़ तीन दिन!” …मैं बोलना चाहता था पर आवाज़ मेरे गले में अटक कर रह गई। मकान-मालिक (भैया लिखने का मन नही हो रहा) ने फ़िर कहा- “चौथे दिन वह लड़का आ जायेगा।”
“ठीक है, मैं तीन दिन के अन्दर कमरा खाली कर दूँगा” यह कहते हुए मै सीढियों से धड़धड़ाते हुए नीचे अपने कमरे में आ गया।

कमरे में पहुँचकर मैंने कुर्सी खींची और धम्म से बैठ गया। गुस्से के मारे मुँह से गालियाँ निकल रहीं थीं। स्साला, कमीना; कमरा खाली कराना था तो बहाना बना रहा है, मां… …। साले को न तो बिजली का बिल देना है न पानी का। कटिया मार के तो पूरे घर में बिजली की सप्लाई दे रखी है। मुफ़्त की बिजली पर भी न तो कूलर चलाने देता है और न ही कमरे में एक से ज्यादा पंखा इस्तेमाल करने देता है। छ्त पर भी जाने नहीं देता। पानी के लिये मोटर भी सुबह-शाम मिलाकर एक घंटे से ज्यादा नहीं चलता। लैट्रिन-रूम में भी पानी नहीं आता, बाहर से डिब्बे में पानी भर कर ले जाना पड़ता है। रहना ही कौन चाहता है यहाँ।

…अचानक याद आया कि १५ दिन बाद ही फ़िर से ‘एक्ज़ाम’ है। फ़िर तो मानों हजारों टन बर्फ़ डाल दिया गया हो, शरीर एकदम से ठंडा हो गया। अभी तो कमरा खोजना है और फ़िर सामान सेट करने में कम से कम एक सप्ताह तो निकल ही जायेगा। क्या करूँ? …

यही सब सोचते हुए कमरे में ताला बंद कर मैने साईकिल उठाय़ी और एक-एक कर सलोरी, गोविन्द्पुर, तेलियरगंज, म्योराबाद और छोटा बघाड़ा के चक्कर लगा डाले। कटरा और अल्लापुर छोड़ दिया क्योंकि कटरा में कमरे बहुत मँहगे थे और अल्लापुर गन्दगी की वजह से मुझे हमेशा नापसन्द रहा है। तत्काल कमरा तो कहीं नहीं मिला था पर एकाध आश्वासन जरूर मिला था।
थका-हारा मैं आठ बजे तक कमरे पर लौट आया था। थकान इतनी थी कि नींद आ गई। नींद खुली तो रात के एक बज रहे थे। …भूख लग गई थी इसलिए जल्दी से तहरी चढ़ा दी। तहरी खाकर सोने की कोशिश की पर बहुत देर तक नींद नहीं आई। पता नहीं कहाँ-कहाँ की बातें दिमाग में आ रहीं थी। ऐसे ही लेटा रहा …कब नींद आ गई पता नहीं चला।

अगले दिन मुझे बेली हास्पीटल के पीछे बेली गाँव में एक कमरा मिल गया जो हर तरह से मेरी पहुँच में था। एक बड़ी सी बिल्डिंग के पिछवाड़े बने दो कमरों में से यह एक था। शायद कभी नौकरों के रहने के लिये बना हो पर अब हम जैसे लोगों के काम आ रहा था। कमरे में एक खिड़की थी जिसकी इच्छा मेरे मन में तबसे थी जबसे इलाहाबाद आया था। और जिसकी वजह से मैं अक्सर ही किसी गुमनाम शायर की ये लाइनें गुनगुनाता रहता था-

घुटन होती न कमरे में,यहाँ जो खिड़कियाँ होती।
मैं केवल सोच सकता हूँ, किरायेदार जो ठहरा॥

कमरे में कुर्सी-मेज, चौकी और खाना बनाने वाली जगह सेट करने के बाद भी एक चटाई बिछाने भर की जगह बचती …ऐसा मेरा अनुमान था…। सामान्यतया लड़कों के लिये बनाए गये कमरों मे इतनी जगह नहीं मिलती। पचास कदम पर ही चाय की दुकान थी,और उसी के बगल में सब्जी का ठेला भी लगता था। वहाँ से थोड़ी ही दूर पर मैगजीन की दुकान, फ़ोटोस्टेट और पीसीओ एक साथ थे। इस प्रकार यह कमरा मेरी हर बुनियादी जरूरत को पूरा कर रहा था। और सबसे खास बात तो यह कि यहाँ बिना अतिरिक्त पैसा दिये कूलर चलाने की भी छूट थी। मैंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि वो जो करता है अच्छे के लिये ही करता है।



मैंने तीसरे दिन शाम को अपने कुछ मित्रों को इकट्ठा किया… जिनके कमरा बदलने के आयोजन में मैं शामिल रहा था। एक ठेला सौ रुपये में तय हुआ। सामानों की पैकिंग शुरू हुई। किताबें बोरे में भरीं गईं। एक चुल्हेवाला छोटा सिलिंडर बाल्टी मे रखा गया। कमरे के कैलेंडर, पोस्टर, बची हुइ किताबें, नोट्स बिस्तर में बाधें गए। अटैची, बोरे, झाड़ू और छोटा वाला बैग तो ठेले के पेट में ही आ गये। इनके उपर चौकी रखी गई। उसके ऊपर मेज फ़िर कुर्सी। बाल्टी को चौकी के पाए में लटका दिया गया। मकान-मालिक तथा लॉज़ के अन्य लड़कों से दुआ-सलाम कर हम ठेले के साथ आगे बढ ।

ठेले के पीछे चलते हुए मैं नए कमरे में सामानों को व्यवस्थित करने के तरीके और पुराने कमरे के अनुभव के बारे में सोचता जा रहा था। ठेला चढ़ाई पर धीमा पड़ जाता और ढलान पाकर सरपट दौड़ पड़ता… बिलकुल ज़िन्दगी की तरह …मैं सोचता रहा …इस एक ठेले पर सिमटी ज़िन्दगी से निज़ात कब मिलेगी …

(बालमन)

Sunday, June 22, 2008

पच्चीस साल पुराना वह दो मिनट…

इस बार की मेरी गाँव की यात्रा नये-नये अनुभवों की गवाह बनी। इलाहाबाद लौटने से पहले मैने एक रात ससुराल में बितायी। श्रीमती जी को मायके का सुख इसबार भी एकही दिन का मिल पाया। लेकिन संयोग से वह रात एक बहुत पुराने राज पर से पर्दा उठाने वाली साबित हुई। मैं तो सुनकर सन्न रह गया। …उनकी बतायी घटना को उन्ही के शब्दों में पेश कर रहा हूँ। आपभी जानिए…(उनकी अनुमति प्राप्त कर ली गयी है।)

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शिवमंगल से जब भी मेरी मुलाकात होती है हम सहसा मुस्करा पड़ते हैं। बचपन में घटी उस घटना को करीब पच्चीस साल बीत गये हैं। कुल दो मिनट में सबकुछ हो गया था लेकिन वे दो मिनट मेरे जेहन में बिलकुल ताजा हैं। आज मैं अपने पापा के गाँव से विदा होकर ससुराल और ससुराल के गाँव से ‘इनके’ हर तबादले के बाद अपनी गृहस्थी कई बार शिफ़्ट कर चुकी हूँ। अपना बचपन पीछे छोड़कर अपने दो बच्चों के बचपन को सँवारने की जिम्मेदारी में मसरूफ़ हो गयी हूँ। फिर भी कभी कभार मायके जाने पर अपने उस अकिंचन बालसखा से जब भी आँखें मिलती हैं एक नैसर्गिक मुस्कान हम दोनों के चेहरे पर सहसा दौड़ पड़ती है।

यह इस बार भी हुआ… और वह भी अपने भाई और पापा के सामने ही। हम चाह कर भी अपनी मुस्कान छिपा नहीं पाए। पकड़े जाने पर पापा भी पूछ ही बैठे… क्या बात है… गाँव में एक बनिया परिवार के उस लड़के से मुस्कान का ऐसा आदान-प्रदान शादी के नौ साल बाद भी देखकर थोड़ा असहज़ लगा था उन्हें। शुक्र है मेरे भाई को सब कुछ पता था… उसने बात सम्भाल ली।

इस बार की मुलाकात हुई भी थी एक आपराधिक वारदात के तुरंत बाद जुटी भीड़ के बीच। रात के करीब नौ बजे मेरे गाँव से गुजरने वाली नहर की पुलिया पर बदमाशों ने एक आदमी को गोली मार दी थी। सिर्फ इसलिए कि उसने एक राहगीर की साइकिल छीने जाने का विरोध कर दिया था। बदमाश अंधेरे में भाग निकले थे। गोली की आवाज सुनकर गाँववाले जब वहाँ पहुचे तो घटना का प्रत्यक्ष गवाह बना एक आदमी मिला। यह कोई और नहीं, बल्कि शिवमंगल था- वही जो मेरे बचपन के स्मृति पटल पर अब भी बदस्तूर चस्पा है। जिसे गोली लगी थी उसे तत्काल जिला-अस्पताल भिजवाया गया। हालत खतरे से बाहर बतायी गयी थी। इसलिए सभी लोग थोड़ी राहत के साथ शिवमंगल उर्फ़ मुनीब की बात सुन रहे थे। किसी सेठ के यहाँ कभी ‘मुनीब’ का काम कर चुका था इसलिए अब इसे गाँव में इसी नाम से बुलाते हैं।

मैं भी डॉक्टर बन चुके अपने भाई के साथ वहाँ पहुँच गयी थी। मुनीब की सुपरिचित आवाज़ सुनकर मैने यत्नपूर्वक भीड़ के बीच रास्ता बनाया और उसके सामने पहुँच गयी। वहाँ मौत के मुँह से बाल-बाल बचने की चर्चा हो रही थी। गोली खाये व्यक्ति के भाग्य को सराहा जा रहा था। भगवान को भी इसकी क्रेडिट दी जा रही थी। इसी दौरान हमारी आँखें चार हुईं… और फिर वही मुस्कान। …अजीब माहौल बन गया। पापा वहाँ तो कुछ नहीं बोले लेकिन घर लौटने पर उनका चेहरा स्पष्ट रूप से प्रश्न कर रहा था।

मैने भी सोचा कि पच्चीस साल पुराना करार अब तोड़ देने में कोई हर्ज नहीं है। तब हमने तय किया था कि यह बात कभी भी किसी को नहीं बताएंगे। कुल तीन हमराज थे उस घटना के। शिवमंगल, मैं और मेरा छोटा भाई रिंकू।… तब हमारी उम्र रही होगी करीब ७-८ साल।
हमारे खलिहान में एक कुँआ हुआ करता था जिसमें बारिश के दिनों में पानी काफी ऊपर तक भर जाता था। वहाँ रोज़ खेलने के लिए जमा बच्चे कुँए की जगत पर बैठकर अन्दर पैर लटकाकर अपनी बाँहों पर वजन संतुलित करके पैर से पानी छू लेने का प्रयास करते और उनके अभिभावक उन्हें ऐसा न करने के लिए हमेशा मना करते और कड़ी निगरानी रखते। लेकिन बच्चों को वही सब करने में मजा (रोमांच) आता है जिसके लिए मना किया जाता है। कोई न कोई रोज पिटता भी था। उस बाल-मण्डली में सबसे लम्बी और थोड़ी ढीठ होने के कारण मै यह कारनामा अक्सर किया करती थी। पता चलने पर इसके लिए पापा की डाँट भी खूब पड़ती थी। लेकिन जब पापा मोटरसाइकिल से बाहर निकल जाते तो हमारे लिए इस खेल का मौका मिल ही जाता था।

एक दिन ऐसे ही मैं रिंकू को साथ लेकर कुएं का खेल खेलने पहुँची। मुझे देखकर मुझसे करीब दो साल बड़ा किन्तु कद में छोटा शिवमंगल भी आ गया। उसने अपनी बहादुरी दिखाने के चक्कर में झट अपना पैर कुँए में लटका दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश अचानक उसका हाथ कुँए की जगत से फिसल गया। पानी में खुद को गिरता देख वह हड़बड़ी में कुँए के बीचोबीच खड़ी ९ इंच मोटी लोहे की बोरिंग वाली पाइप से लिपट गया। लेकिन पाइप गीली और चिकनी थी। दोनो हाथ व पैरों को पाइप से लपेट लेने के बाद भी वह धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा। आसन्न खतरा भाँप कर उसका बड़ा भाई मार खाने के डर से भाग गया और चुपचाप कहीं छिप गया। शिवमंगल का वह कातर चेहरा मुझे कभी नहीं भूलेगा। उसे इतना समय भी नहीं मिला था कि आँसू निकल पाये हों, चिल्लाकर किसी को मदद के लिए बुलाने भर का अवसर भी उसके पास नहीं था… वह नीचे की ओर सरकता जा रहा था…


सहसा मेरी निगाह उसके दारुण चेहरे और भयानक देहदशा पर पड़ी। वह कमर तक पानी में समा चुका था। मैने हिम्मत करके अपने रोज के आजमाये खेल का सहारा लिया। कुँए की जगत पर बैठकर अपने हाथों को मजबूती से जमीन पर टिकाया और पैर अंदर लटका दिए। उससे पकड़ कर ऊपर आने का संकेत किया। उसने बड़ी मुश्किल से एक हाथ पाइप से छुड़ाकर मेरे पैर की अंगुलियाँ पकड़ लीं। उसका नीचे सरकना रुक गया। लेकिन खतरा अभी टला नहीं थ। उसे बाहर खींच कर लाना मेरे लिए संभव नहीं था। मै खुद एक नाज़ुक संतुलन पर अटकी हुई थी। साँस रोककर मैने धीरे-धीरे पीछे की ओर सरकना शुरू किया। शिवमंगल को भी थोड़ी शक्ति मिल गयी। मेरा पैर थामकर वह ऊपर की ओर सरकने लगा। कुछ ही क्षणों में वह बाहर था। और हमारी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। वह पसीने से तर था। मैं डर के मारे थरथरा रही थी। …क्या होता अगर मैने उसे समय से देखा नहीं होता… या देखा भी होता और हिम्मत जवाब दे गयी होती… आखिर उसका बड़ा भाई सबकुछ देखकर ही चंपत हो गया था…।

जब थोड़ी देर बाद हमारी हालत सामान्य हुई, धड़कनें स्थिर हुईं और हमें लगा कि इस घटना को कोई और देख नहीं पाया है तो हमने तय किया कि इसके बारे में किसी को नहीं बताया जाएगा। हम इस करार पर कायम रहे। वह जब भी मिलता मुझे कृतज्ञता पूर्वक मुस्कराकर नमस्ते करता और मैं भी छिपी मुस्कान से उसकी भावनाओं की रसीद दे देती।

लेकिन इस बार जब मौत उसके सामने से ही गुजरी और मुझे भी पापा की डाँट (या पिटाई) का डर नहीं रहा तो मैने यह कथा घर वालों को सुना दी। उनकी प्रतिक्रिया क्या रही होगी इसका अनुमान आप स्वयं कर सकते हैं… आपको भी तो सुना ही दिया मैने! … शायद आपके अंदर भी वही चल रहा होगा।
- रचना

Saturday, June 21, 2008

शहद के छत्ते को न छेड़ें श्रीमन्…

साहित्यकार बनाम ब्लॉगर को लेकर अच्छी बहस छिड़ी है। बहुत रोचक विषय पर चर्चा चल पड़ी है। साहित्य की परिभाषा गढ़ने या इसकी औकात बताने की मेरी कोई नीयत नहीं है और न ही मैं ऐसी क्षमता का भ्रम ही पाले बैठा हूँ। किन्तु मेरा मानना है कि सभ्यता के विकास में मनुष्य ने बहुत से कार्य अवसर की उपलब्धता के कारण करना प्रारम्भ कर दिया जो बाद में उसकी जरूरत और फिर आदत में शुमार हो गया।

आखिर सभ्यता के इस विकास के समयानुक्रम में आदमी ने किसी एक समय-बिन्दु पर आग, पत्थर, पहिया, लोहा, धातु, जानवर, गुफ़ा, जंगल, झोपड़ी, कपड़ा, कागज, बारूद, हथियार, बिजली, कंप्यूटर आदि का पहली बार प्रयोग किया होगा। इस प्रथम प्रयोग के बाद ही इसका प्रसार और परिष्कार होता गया होगा और ये साधन हमारे जीवन के अविभाज्य अंग बनते गये होंगे। जो हमारी सभ्यता को उत्कृष्टता की ओर ले जाने में उपयोगी हुआ उसका हमने वरण कर लिया, आत्मसात कर लिया और उसे सर्वसुलभ बनाने की कोशिश की। जो काम लायक नहीं रहा वह इतिहास में पीछे छूट गया। ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ का सिद्धान्त भी कमोबेश यही कुछ कहता है।

साहित्य के क्षेत्र में भी तकनीक और साधन ने युगान्तकारी परिवर्तन किये हैं। लेखनी के प्रयोग से पहले स्रुति-परम्परा फिर हस्तलेखन हेतु भोजपत्र, कागज, पाण्डुलिपि फिर छपाई-मशीन, पुस्तकों और अखबारों का प्रकाशन, कम्प्यूटर और इण्टरनेट के क्रमिक विकास ने साहित्य के सृजन, अध्ययन-अध्यापन व आस्वादन की रीति को लगातार बदला है। ‘साहित्य’ को एक नियत कालखण्ड में एक विशेष माध्यम से रचे और पढ़े गये शब्द समुच्चय तक सीमित कर देना किसी विडम्बना की ओर इशारा करता है।

मेरे एक मित्र ने मजाक में कहा था कि ब्लॉगिंग का चस्का कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा नाई को देखकर हजामत बढ़ आने की कहावत में होता है। मतलब इन्टरनेट की सैर करते-करते भाई लोग मुफ़्त में कवि और लेखक बन जाने और प्रत्यक्ष रूप से पाठकों की दाद पा जाने का अवसर हाथ लगने पर झम्म से साहित्य की दुनिया में कूद पड़ते हैं।

वैसे देखा जाय तो इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। इस सर्वसुलभ साधन का अकुशल प्रयोग करने वालों के होते हुए भी इसके प्रसार और प्रभाव को अब रोका नहीं जा सकता है। और न ही दोयम दर्जा देकर इसके उत्साह को कम किया जा सकता है।

तुलसीदास ने अपनी अमर रचना किसी समालोचक या मूर्धन्य विद्वान को लक्ष्य करके उसकी ‘रिकॉग्नीशन ’ पाने के लिए नहीं लिखी थी, बल्कि स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा का भाव ही प्रधान था।

गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी अमर रचना किसी समालोचक या मूर्धन्य विद्वान को लक्ष्य करके उसकी ‘रिकॉग्नीशन ’ पाने के लिए नहीं लिखी थी, बल्कि स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा का भाव ही प्रधान था। लेकिन उनके शब्दों में भाव और लालित्य की वह अविरल धारा फूट निकली कि सारे साहित्यकार पीछे छूट गये।
मैने अनुभव किया है कि ब्लॉग के दरवाजे से अनेक ऐसे हस्ताक्षर भी निकलकर सामने आ रहे हैं जो संकोच में शायद किसी अन्य दरवाजे को खटखटाना भी गँवारा नहीं करते। जबकि उनकी लेखनी में नगीना जड़ा हुआ है।

जंगल में मोर नाचा किसने देखा? होंगे ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार किसी विलक्षण रचना के मालिक। लेकिन पढ़ेंगे तो हम वही जो हमारे करीब आयेगा। भौतिक रूप से भी और भाव रूप में भी। प्यासे और कुएं की कहावत अब बेमानी हो गयी लगती है। अबतो घर-घर ‘वाटर-सप्लाई’ की व्यवस्था पर जोर है। ज्यादातर कुएं तो अब केवल मांगलिक कार्यों में पूजा के काम आने लगे हैं। उनका पानी पीने पर बीमारी फैलने का खतरा बताया जाता है।

घर में बैठकर कनाडा में इसी क्षण रचा गया साहित्य तुरंत पढ़ने और दुनिया को उसके बारे में अपनी राय बता देने का जो सुख हमें एक क्लिक करते ही मिल जा रहा है उसे कौन साहित्य चुनौती दे सकेगा?

अस्तु, हे परम्परा के पुरोधा साहित्यकार श्रीमन आइए अपने छोटे किन्तु विकासशील भाई को गले लगाइये। आपके अच्छे गुणों को यह ग्रहण कर लेगा और बदले मे यह दुआ भी करेगा कि आपकी लोकप्रियता में कोई ‘ग्रहण’ न लगने पाए।

Saturday, June 14, 2008

एक है हिरमतिया…

प्यार क्या है? इस जटिल प्रश्न का उत्तर कवियों, शायरों, फ़िल्मकारों, अनुभवी प्रेमियों और खालिस विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से दिया है। इसके पीछे पड़े बगैर मैं आपको एक ऐसी दास्ताँ सुनाने जा रहा हूँ जहाँ प्यार सिर्फ़ एक कल्पना है, एक अव्यक्त एहसास है, कुछ अस्पष्ट यादें हैं और बाकी आँसू हैं।

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। बल्कि आँखों देखी एक सच्ची बात है। मेरे गाँव की। यह कहानी वहाँ रोज चर्चा का विषय बनती है। क्योंकि इसकी नायिका जहाँ-तहाँ घूमती, गाँव की गलियों में, घरों के आँगन में, नुक्कड़ की दुकान पर लोगों के मनोरंजन का केन्द्र बनी लड़की-लड़कों व आदमियों से घिरी दिख जाती है।

इस कहानी के मुख्य पात्र से मेरा परिचय उसकी माँ के माध्यम से हुआ जो मेरे घर बर्तन माँजने आया करती थी। उसकी माँ की उम्र लगभग ५५-६० की रही होगी पर काम के बोझ और अपने पति के हाथों नित्य-प्रति प्रताड़ना व पिटाई से वह ७० से उपर की दिखती थी। हम उसे ‘संताइन’ के नाम से जानते थे। इस महिला का नाम संताइन क्योंकर पड़ा यह मेरे लिये एक अबूझ पहेली सा रहा क्योंकि उसका ‘संत गोंड़’ नामक पति परम नशेड़ी (वस्तुतः गँजेड़ी) रिक्शाचालक था। ऐसे में मास्टराईन, डाक्टराईन वाला फ़ार्मूला उस पर लागू नहीं होना चाहिए था। खैर …

आइये अपने मुख्य पात्र पे आते हैं। संताइन के साथ साए की तरह लिपटी उसकी बेटी ‘हीरमती’। इसकी उम्र करीब २४-२५ साल की होगी लेकिन आजभी उसकी माँ ही उसका खयाल रखती है। संताइन के साथ ही घरों में काम करने वह भी आती थी। उसके हाव-भाव और कपड़े से थोड़े ही समय में मैने यह अनुमान कर लिया कि ‘हीरमती’ मंदबुद्धि है। वैसे यह बात मेरे घर वाले पहले से ही जानते थे और इसका प्रयोग भी चतुराई से करते थे। जैसे एक कप चाय के बदले सब्जी कटवा लेना या इधर-उधर की बातों में उलझा कर घंटों शरीर दबवाना वगैरह-वगैरह…। हीरमती का इस तरह का शोषण सिर्फ़ मेरे ही घर नही होता वरन्‍ पूरा गाँव ही मौके-बेमौके इस मुफ़्त सेवा का लुत्फ़ उठाता था। उसकी उलझी-उलझी बातों का सिर-पैर ढूढने की मेरी सभी कोशिशें बेकार गयीं। तुलसीदास जी को झुठलाती हुई हीरमती एक ही समय में ‘हँसहि, ठठाहिं, फुलावहिं गालू’ की छवि पेश कर देती।

जीवन के २४-२५ बसन्त यूँ ही देख लेने के बाद हीरमती का शरीर इतना विकसित न था कि एक बार में ही नज़र में आ जाए पर इतना अविकसित भी न था कि नज़र ही न आए। वैसे भी गरीब की बेटी की बढ़ती उमर का शोर कुछ जल्दी ही हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी अगर यह सुनने को मिल जाता कि आज ‘हिरमतिया’ ने फलाने को मारने के लिये दौड़ा लिया या उसकी माँ ढिमाके को पानी पी-पी कर गरिया रही है तो किसी को कत्तई आश्चर्य नही होता।

गाँव भर की ‘हिरमतिया’ को संताइन हमेशा ‘बबुनवा’ ही कहती। प्यार से अपने दुलारे बेटे को किया जाने वाला संबोधन है यह। इसे सुनने वाले मुँह छिपाकर मुस्कराये बिना नहीं रहते। लेकिन संताइन के लिये उसे अपने खाने से पहले खाना खिलाना, उसकी हर एक बात का समर्थन कर उस मंदबुद्धि लड़की को संतुष्ट रखना बहुत सहज लगता था। ऐसा लगता जैसे संताइन ने मंदबुद्धि बच्चों के साथ रहने और उनकी परवरिश करने की ट्रेनिंग ले रखी है। पर ऐसा नहीं था, यह तो एक अनपढ माँ की नैसर्गिक ममता थी जो बेटी के लिये कुछ भी करने को तैयार थी। हम तथाकथित पढे-लिखे लोग मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों से जैसे पेश आते हैं, उसे संताइन के व्यवहार के प्रकाश में देखने पर खुद से शर्म आती है।

दिन ऐसे ही कट रहे थे- संताइन के घर-घर जाकर बर्तन धोते, हीरमती के दूसरों की कुटिल मेहरबानियों की चाय पीते, गाँववालों के घटिया मुफ़्तखोरी और व्यर्थ की चर्चा और ठिठोली करते। शायद ऐसे ही जिन्दगी चलती भी रहती अगर संताइन ने हीरमती की शादी न की होती। लेकिन लोकलाज के भय से माँ ने जवान होती गरीब की बेटी के हाथ पीले करना बेहद जरूरी समझा।

हीरमती की शादी ‘प्रभू’ नाम के एक शख्स से हुई, जो खेती-बाड़ी करने वाला एक साधारण गृहस्थ था। हीरमती की ससुराल मेरे गाँव से कोई पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर थी। ये बातें मुझे संताइन के माध्यम से पता चलीं। हीरमती के ससुराल चले जाने के बाद संताइन जब हमारे घर आती तो बहुत उदास दिखती। कभी गुस्से में बड़बड़ाती तो कभी रोने भी लगती। मेरे घर वाले उसे समझाते कि बेटी को विदा तो करना ही पड़ता है। यही उचित कायदा है। यह सुनकर वह चुप हो जाती, हीरमती और उसकी ससुराल का जिक्र छेड़ देती और प्रसन्न हो जाती।

पर शायद विधाता इतने दयालु भी नहीं हैं कि वह संताइन की खुशी को लंबे अरसे तक बनाये रखते । ससुराल जाने के १०वें दिन दुपहर में ही हीरमती अकेले पैदल गाँव लौट आई। आश्चर्य प्रायः किसी को नहीं हुआ। यह तो होना ही था। आखिर पागल लड़की को कोई कब तक बर्दाश्त करता। अलबत्ता उसके पीहर के अनुभवों को जानने का कौतूहल सारे गाँव में फैल गया।

हीरमती अगले ही दिन संताइन के साथ मेरे घर आई। उत्सुकता हम सभी के मन में भी थी। सोच रहे थे कि संताइन आते ही सबकुछ बड़बड़ा के बता देगी पर आज वह बेहद शांत थी। हमने हीरमती से ही पूछा- “बड़ी जल्दी चली आयी ?” उसके चेहरे पर डर उभर आया, बोली- “बड़ा मारत रहले हँ, एही से भाग अइनी हईं”। हीरमती ने ससुराल में हुई अपनी दुर्दशा के बारे में सारी बातें रोते हुए बताया पर वहाँ से भाग आने की अपनी बहादुरी को हँस-हँस कर बताया।

हीरमती के गाँव लौटने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया। पर हीरमती में एक परिवर्तन आ गया था। उसके भीतर उस एहसास का प्रवेश हो चुका था जिसे पारखी ‘प्रेम’ कहते हैं। एक दिन, एक रात या एक पल का जो प्यार हीरमती को अपने ‘परभू’ से मिला था (कदाचित वासना-प्रधान ही रहा हो) उसने हीरमती को अपने वश में कर लिया था। अब वह सिर्फ़ और सिर्फ़ परभू की बात करती। हिचकी आती तो अपनी माँ से पूछती- “के इयाद करता?” फ़िर खुद ही जवाब देती, “प्रभू इयाद करताड़े”। छींक आती तो प्रभू याद करते, पानी सरक जाता तो प्रभू याद करते, खाना अटक जाता तो प्रभू याद करते, मतलब यह कि हीरमती अब ‘प्रभुमय’ हो चुकी थी। (यहाँ आपको याद दिला दूँ कि प्रभू हीरमती के पति का नाम था कहीं आप इसे ईश्वर न समझ लीजियेगा।)

इधर गाँववालों को एक नया खेल मिल गया था। लोग हीरमती से प्रभू का हाल-चाल पूछते और उसकी बिना सिर-पैर और कल्पना की बातों को सुनकर आनन्द उठाते। घंटों उससे इस आश्वासन पर काम कराते कि प्रभू की चिट्ठी आई है और अभी वह उसे पढ़कर के सुनायेंगे। काम कराने के बाद कुछ भी ऊल-जलूल पढ़ देते और हीरमती पूरे गाँव को बता आती कि ‘परभू के चिट्ठी आइल बा, कहलें हँ आइब, साड़ी अउरी चूड़ी लेकर अइहें’ या ‘देवरा परसों आई’ या ‘ससुई के तबियत खराब बा’। चूंकि गाँव में प्रायः सभी हिरमतिया का मुफ़्त प्रयोग करने के आदी हो चुके थे इसलिये किसी को भी दूसरे का कार्य अनैतिक नहीं लगता।

पर संताइन बेटी को लेकर चिंतित थी। वह उसकी दूसरी शादी कराना चाहती थी। उसने फ़िर से एक बार प्रयास किया। हीरमती एक बार फ़िर दुल्हन बनी, ससुराल गई लेकिन इसबार तीसरे दिन ही लौट आई, शरीर पर चोटों के पर्याप्त निशान लिये। लेकिन बड़ी चोट उसके मन को लगी थी। वह किसी को दिखा भी नहीं सकती थी। अगले दिन उसके ससुराल वाले उसे खोजते हुए आये। उन्होंने बताया कि यह न तो अपने पति के पास रहती है और न ही घर में बैठती है। बार-बार भागने का प्रयास करती है। इसका दिमाग खराब है, हम इसको अपने पास नहीं रख सकते। यह कह कर वे भी चले गये।

हीरमती से भाग आने का कारण पूछने पर उसने जो उत्तर दिया उसकी मैने कल्पना भी न की थी। उसने भाव बिह्वल होकर भींगी आँखों को झुकाकर कहा-‘‘हमार बियाह त परभू से भईल बा, हम केहू दुसरा लगे काहें सूती? एही से भाग अइनी हईं’’।

इस घटना के बाद संताइन ने हीरमती की शादी का प्रयास फ़िर नहीं किया। हीरमती ने प्रभू का जिक्र करना नहीं छोड़ा है। प्रभू कभी हीरमती से मिलने नहीं आया। गाँववालों ने हीरमती का शोषण करना नहीं छोड़ा, बस बहाने बदल गये है। हीरमती को मोबाइल से कस्टमर-केयर पर मिलाकर प्रभू से बात करा दी जाती है। हीरमती इतने पर ही घर के सारे काम कर देती है।

अब हीरमती दुबली-पतली और मलिन हो गई है या थोड़ा और स्पष्ट करें तो बस हाड़ की गठरी रह गई है। संताइन जरावस्था में पहुँचकर और कमजोर हो घर पर पड़ी रहती है। गाँववालों की दया से इन दोनों माँ-बेटी को कुछ खाने को मिल जाता है। पर हीरमती आज भी प्रभू की आस में जी रही है। उसे यह कौन बताये कि उसने दूसरी शादी करके अपना घर बसा लिया है। बताये भी तो वह विश्वास कहाँ करेगी?

हीरमती के लिये प्रभू का नाम एक उम्मीद है, एक इंतजार है, एक खूबसूरत एहसास है, जिसके आलोक में वह जी रही है। शायद प्यार ऐसा ही कुछ होता है।

( यह सत्यकथा बालमन द्वारा लिखी गयी है। )

Thursday, June 12, 2008

लो मैं आ गया…सिर मुड़ा कर!

मेरे दादाजी ने जिस इमर्जेंसी मीटिंग के लिए परिवार के हम सभी सदस्यों को गाँव बुलाया था उसमें पहुँचने में मुझे कुछ घण्टों की देर हो गयी। घर से सबसे अधिक दूरी पर मैं ही जो था। रात भर सड़क मार्ग से यात्रा करने के बाद जब सुबह सपरिवार गाँव मे दाखिल हुआ तो लगभग सभी गाँव वालों को अपने दरवाजे पर इकठ्ठा पाया। अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी।

हरे बाँस को काटकर डोली बनायी गयी थी। महायात्री को गंगाजल से नहला-धुला कर शुद्ध घी से मालिश कर नया वस्त्र पहनाया गया, सुगन्धित इत्र लगाया गया, स्वर्णादि से आभूषित किया गया। सफ़ेद वस्त्र व पीली चादर में डोली पर विराजमान कर लाल चुनरी से डोली सजा दी गयी। बैण्ड बाजा बजने लगा। स्रिंगा की ध्वनि गूंज उठी। रामनाम के जयघोष के साथ डोली उठ गयी। कहांर बनने की होड़ लगी थी। तीन पुत्र, आठ पौत्र, और छः प्रपौत्र जिनमें नन्हा ‘सत्यार्थ’ शामिल था, इस सुअवसर के लिए उद्यत थे। गाँव के सभी पुरुष, पड़ोस के स्वजन, मित्र, रिश्तेदार, बड़े-बुजुर्ग बारात में शामिल हुए। घर की कुछ औरतों व बेटियों की आखें इस विदाई पर जरूर नम थीं, लेकिन शेष जन-समुदाय स्थिर चित्त हो उत्साहित नजर आ रहा था। विषाद का वातावरण प्रायः नहीं था।

लगभग सौ साल (जन्म सन-१९१० ई.) का पूर्ण जीवन बिताने के बाद ‘बाबाजी’ का महाप्रयाण जैसे पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार हुआ। अन्तिम क्षणों से पूर्व गाय की पूँछ पकड़कर वैतरिणी पार करने का अनुष्ठान, शैय्या-दान व घी के कटोरे में स्वर्णमुद्रा डाल उसमें अपनी छवि देखकर छाया-दान, और परिजनों द्वारा श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का पाठ, विष्णूसहस्त्रनाम का जप व सुंदरकाण्ड का गायन। ऐसे वातावरण में जब बाबाजी ने आँखे बंद की थीं तो उस समय उनके चारो ओर अपार जनसमूह इकठ्ठा हो प्रार्थना कर रहा था। जब मैं सुबह पहुँचा तो यह प्रार्थना जारी थी। लोग दूर-दूर से आकर उनका चरण-स्पर्श करते और आँखें बंद कर प्रार्थना करते।

अंतिम विदा के समय परंपरागत नियमों व रूढ़ियों और कर्म-काण्ड का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका विस्तार अगले बारह दिनों तक देखने को मिला। अशुद्धि और शोक के प्रधान तत्वों को परिलक्षित करता यह ‘सूतक’ पखवारा मेरे लिए किसी ‘मेण्टल-एडवेंचर’ से कम नहीं था। परिवार के सदस्य जैसे किसी अभिशाप से ग्रस्त हो गये हों। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें अपने आहार-व्यवहार में कठिन नियमों का पालन करना था। दिनभर निराहार या अल्प फ़लाहार, गो-धूलि बेला में हल्दी-तेल-मशाला से रहित सादा-फीका भोजन, कठोर बिस्तर और ग्रामीण विद्युत आपूर्ति की बदहाल व्यवस्था के बीच गर्मी, ऊमस और मच्छरों का साथ। घर से बाहर स्नान करने का नियम औरतों को भी कड़ाई से पालन करना था।

यह सब भोगकर मुझे एक तरफ अपनी दर्शनशास्त्र की किताबों में लिखी धार्मिक आस्था की अतार्किकता संबन्धी विश्लेषण याद आते तो दूसरी ओर बाबाजी की आत्मा की शान्ति के लिए परिजनों द्वारा पूरी आस्था व विश्वास के साथ पुरोहित द्वारा बताये गये कठिन नियमों के अक्षरशः पालन करने की तत्परता देखकर मन में एक स्वतःस्फूर्त आस्था पैदा हो जाती। सारा दर्शन ताकता रह गया। मैं अपनी पढ़ाई और ज्ञान मन में दबाए रह गया कि ईसा पूर्व छठी-सातवीं सदी में हिन्दू धर्म में प्रचलित कठिन कर्म-काण्डों की वजह से एक आम गृहस्थ पुरोहितों के हाथों किस प्रकार शोषित व प्रताड़ित होता था। मृतक की आत्मा को प्रेत-योनि से छुटकारा दिलाने और पितरों को बैकुण्ठ पहुंचाने के फेर में पड़कर कैसे गरीब परिवार लोभी पुरोहितों के हाथों अपना सर्वस्व लुटा कर भी उन्हें तृप्त नहीं कर पाते थे। मृत्युलोक में जीवनपर्यंत भयंकर पाप व दुष्कर्म करने वाले धनवान सेठ साहुकार, राजे-महराजे व जमींदार किस प्रकार पुरोहितों की निष्ठा खरीदकर खर्चीले यज्ञ-अनुष्ठान व कर्म-काण्ड के बल पर अपने स्वर्गलोक वासी होने के प्रति आश्वस्त हो जाते थे।

हमारे देश में हर प्रकार की मान्यताओं, रूढ़ियों, पंथों और स्वतन्त्र इच्छाओं की पूर्ति का सुभीता है। लेकिन हम अपनी परम्परा छोड़कर कुछ नया आजमाने में डरते हैं। जाने क्यों? शायद हजारों-हजार साल से चली आ रही बातों को छोड़ने पर मझधार में अटक जाने का भय हमें रोकता है।

मैने पढ़ा था कि इन्हीं कर्म-काण्डों की जंजीर में जकड़े हिन्दूधर्म से आजिज आकर विद्रोह स्वरूप बौद्ध व जैन धर्मों का अभ्युदय हुआ। अनेक रूढ़ियों व विकृतियों से बाहर निकलकर महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर के उपदेशों के मुक्त आकाश व खुली हवा में साँस लेकर तत्कालीन समाज के बहुतेरे लोगों ने वैदिक धर्म का त्याग कर दिया था और सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, और ब्रह्मचर्य के नियमों पर आधारित धर्म का वरण कर लिया था।

वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना आठवीं-नौवीं सदी में आदि-शंकराचार्य के प्रयास से तब हुई जब उन्होने अद्वैत वेदान्त का प्रतिपादन कर यह उद्‍घोष किया-
ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या, जीवोब्रह्मैवनापरः।
(ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न नहीं है।)

संसार को मिथ्या बताकर इसमें व्यवहृत समस्त आडम्बरों को समाप्त करने का मार्ग शंकर के दर्शन से प्रशस्त हुआ। उन्होने गीता की व्याख्या कर भारतीय दार्शनिक परम्परा के सर्वमान्य कर्मसिद्धान्त को स्पष्ट किया जिससे जीवन में वास्तविक सद्‍कर्मों के पालन का महत्व रेखांकित हुआ। इस समय तक बौद्ध मठों में भी प्रायः वही आडम्बर व कुरीतियाँ फैल चुकी थीं जिनके विरुद्ध कभी इनका विकास हुआ था। परिणाम स्वरूप कालचक्र का पहिया पूरा घूम गया। फिरसे वैदिक धर्म के प्रति आस्था जमने लगी। आज के बहुलवादी समाज (pluralist society) में ये सारे तत्व न्यूनाधिक मात्रा में यत्र-तत्र मिल जायेंगे।

मैंने ‘सूतक’ के दौरान घर के बड़ों द्वारा बताये गये नियमों का यथा-सामर्थ्य पालन किया और कर्म-काण्ड विशेषज्ञ पुरोहित ‘शास्त्रीजी’ द्वारा पं. लालबिहारी मिश्र लिखित व गीताप्रेस से छपी अन्त्यकर्म श्राद्ध प्रकाश के अनुसार पिण्डदान के असंख्य चरणों में अपने पूज्य पितामह के नाम के आगे ‘प्रेत’ शब्द जोड़कर उसके निवृत्यार्थ किए जा रहे अनुष्ठान को कलेजे पर पत्थर रखकर देखता रहा। उस शब्द का उच्चारण मात्र हमारे सीने में नश्तर चुभोता रहा और हम भीरुता से सब कुछ सहते रहे।

हमारे देश में हर प्रकार की मान्यताओं, रूढ़ियों, पंथों और स्वतन्त्र इच्छाओं की पूर्ति का सुभीता है। लेकिन हम अपनी परम्परा छोड़कर कुछ नया आजमाने में डरते हैं। जाने क्यों? शायद हजारों-हजार साल से चली आ रही बातों को छोड़ने पर मझधार में अटक जाने का भय हमें रोकता है।

दसवें दिन घर के सभी मर्दों ने एकसाथ बाग में जाकर अपना सर मुड़वाया। वहीं बोरिंग पर सामूहिक स्नान हुआ, जनेऊ बदला गया, मेरे पिताजी ( दगहा, होता) ने अशौच के बाद सफ़ेद वस्त्र में पहली बार घर में प्रवेश किया। पहली बार हमने घर के भीतर सामूहिक रूप से अन्न ग्रहण किया। ग्यारहवें व बारहवें दिन का कार्यक्रम अत्यंत विस्तृत और थकाने वाला था। उसका विवरण देना आवश्यक नहीं है। आखिर में ब्रह्मभोज की बड़ी दावत के साथ सूतक पखवारे का समापन हुआ।

दूर-दूर से आये रिश्तेदारों में से कुछ तो मेरे लिए भी अपरिचित थे। तीन-चार पीढ़ी पुराने रिश्तों के कुछ वर्तमान वंशजों से मेरा पहली बार मिलना एक अचंभित करने वाला अनुभव था। सभी को ससम्मान विदा करने के बाद हमें अपनी नौकरी की सुधि आयी। अर्जित अवकाश पूरा हुआ। इस अवकाश में हम अति व्यस्त रहे। बिलकुल नया अनुभव अर्जित किया। हमने दादाजी का स्थूल रूप खो दिया किन्तु सूक्ष्म रूप में वे हमारे हृदय में बस गये हैं। तभी तो हम वापस आए हैं
– सिर मुड़ा कर।