हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, December 23, 2008

रामदुलारे जी नहीं रहे…!

वैधानिक चेतावनी: यह शोक श्रद्धाञ्जलि नहीं है।

गाँव से जब यह खबर आयी तो हम चक्कर खा गये। विचित्र भाव मन में उठने लगे। रामदुलारे जी के जाने के बाद अब गाँव का माहौल कैसा हो जाएगा…? बिलकुल सूना, रसहीन, और बेसुरा। लोग-बाग कुछ दिन तक तो इनकी मौत की चर्चा करेंगे लेकिन जो आदमी नित नयी चर्चा का मसाला दिया करता था, उसकी साँसें थम जाने के बाद वह बात नहीं रह जाएगी।

तीन भाइयों, चार बेटों, चार बेटियों, और दर्जनों नाती-पोतों वाले रामदुलार जी जब ‘हार्टफेल’ होने से करीब ८० वर्ष की उम्र में भी अहर्निश सक्रियता को अचानक विराम देकर चलते बने तो उनकी मृत देह को कन्धा देने के लिए गाँव के वही लोग काम आये जिन्हें जेल भेजने का सपना देखते इनका जीवन बीता था। घर पर इनकी दूसरी ब्याहता पत्नी के अलावा और कोई नहीं था। सभी बेटे-बेटियाँ इनसे किनारा करके बाहर बस चुके थे। गाँव वालों ने २५ साल पहले घर छोड़ चुके बड़े बेटे तक सूचना पहुँचायी तो वह मुखाग्नि देने के लिए जरूर हाजिर हो गया। अपने भाइयों को तो इन्होंने कबका अलग कर दिया था।

बहुत हटके जीवन बिताया रामदुलार जी ने…।

गाँव में पहला पक्का मकान, उसमें लगा बुलन्द दरवाजा और पशुओं के लिए पक्के सीमेण्ट की चरन (नाद) सर्वप्रथम इन्हीं के पिताजी ने बनवायी थी। दरवाजे पर दो जोड़ी बैल, अनेक गायें और भैंसें, और अनाज रखने की ‘बखारें’ देखने से लगता था कि सरेह में खेती भी काफी अच्छी होगी। अंग्रेजी सरकार के कृपा पात्र होने से उन्होंने काफी धन-सम्पत्ति अर्जित कर ली थी। पैसा ‘कमाने’ का ही अच्छा तजुर्बा था उन्हें, लेकिन पिता की आँखों के तारे रामदुलारे जी ने जब होश सम्हाला तबसे पैसा ‘खर्च करने’ के तमाम करतब देखने को मिले।

कौड़ी और ताश के पत्तों से जुआ खेलने के शौक ने रामदुलारे जी की ख्याति कम उम्र में ही दिग-दिगन्त में फैला दी थी। दीपावली और होली के अवसर पर तो दिल खोलकर लुटाते थे। खान-पान के भी शौकीन थे। इनकी इस फितरत ने इनके आस-पास अनेक दोस्त जमा कर लिए और अपने सगे भाइयों को जल्दी ही बँटवारा कराकर अलग हो जाने की राह दिखा दी।

इन्हें मुकदमा लड़ने और लड़ाने का तो ऐसा नशा था कि जीवन पर्यन्त इनका एक पैर कचहरी में ही रहता था। पिता की मृत्यु और भाइयों के अलग हो जाने के बाद इन्होंने अपना सारा ध्यान यही दो शौक पूरा करने पर लगाया।

ये अपनी धुन के इतने पक्के थे कि कभी जीविका ‘कमाने’ के बारे में सोचने का मौका ही नहीं निकाल पाये। पहले पिता की छोड़ी गयी नगदी और जेवर और उसके बाद विरासत में मिली कभी गाँव में सबसे अधिक रही खेती की जमीन काम आयी। जब दोनों की स्थिति पूर्णिमा के चाँद से अमावस्या तक पहुँच गयी तब बेटियाँ भी सयानी हो गयीं थीं।

इनके सभी लड़के इतने ‘प्रखर’ थे कि एक-दो साल स्कूल आने-जाने के बाद ही उसकी ‘निस्सारता’ समझ गये। गाँव की बेरोजगारी व घर पर पिता की गालियों और प्रताड़ना की सहनसीमा पार करते हुए बारी-बारी से बाहर निकलते गये। सभी दोस्त इनकी जमीन और पैसे से लाभान्वित होने के बाद आगे की सम्भावना क्षीण देखकर अपनी राह चलते गये।

लेकिन ऐसी मामूली बातों से इनके उत्साह में कोई कमी नहीं आने वाली थी। बेटियों ने गाँव के दूसरे घरों में चौका-बरतन, झाड़ू-पोछा, और छोटे बच्चों को बहलाने का काम करना शुरू कर दिया। ब्राह्मण कन्याओं के प्रति दयाभाव से गाँव वालों और रिश्तेदारों ने मिलकर उनका हाथ भी पीला करा दिया। कुछ दूसरे लोगों ने सस्ते में ही ‘कन्यादान’ का पुण्य भी कमा लिया। …लेकिन इनकी कन्याओं की वर्तमान हालत बताने लायक नहीं है…।

सभी बेटिया जैसे-तैसे अपने-अपने ससुराल चली गयीं और सभी बेटे दिल्ली-पंजाब-लुधियाना जाकर कमाने लगे तो ये घर पर बिल्कुल निर्द्वन्द्व होकर अपना शौक पूरा करने लगे। एक जमीन बेचते और एक पड़ोसी पर मुकदमा ठोक देते। हमने उन्हीं को देखकर जाना कि बिना मेहनत के मिलने वाली धनराशि को खर्च करने का मजा ही कुछ और होता है।

धीरे-धीरे बाग-बगीचों और खेती वाली एक-एक इन्च जमीन से ‘भारमुक्त’ हो लेने के बाद बारी आयी पैतृक मकान वाली जमीन की। गाँव के भीतर की इस जमीन को इनके कुछ पड़ोसियों ने मुँहमांगी कीमत देकर बैनामा कराया। इन्होंने अपने हाथ से नापकर कब्जा दिया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये अपनी सीमा से सटे सभी पड़ोसियों को एक-एक करके अदालत खींच ले गये। इलजाम एक ही कि सबने इनकी जमीन पर कब्जा कर रखा है।

कायदा-कानून की दृष्टि से कमजोर इन दीवानी मुकदमों को यथासम्भव लम्बा खींचने का जुगाड़ लगाते रहे। लेकिन अन्ततः इनका भी कोई स्थायी मजा न आता देख इन्होंने फौजदारी के मुकदमें लिखाना शुरू किया। सहसा इन्हें अपने सभी पड़ोसियों से ‘जान-माल’ का खतरा रहने लगा। इस दौर में इनके पास जो ‘माल’ था वह केवल कचहरी के पुराने रिकार्ड्स में ही दर्ज था। घर तो कबका साफ हो चुका था।

लेकिन ‘जान’ को लेकर ये जरूर चिन्तित थे। हृदय रोग ने जब इनके शरीर में स्थायी घर बना लिया तो सभी पड़ोसी इनसे भयभीत रहने लगे। प्रत्येक सप्ताह थाने से कोई न कोई सिपाही इनकी शिकायत की तफ़्तीश करने गाँव में आने लगा। इन्हें छूना भी खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि इनके बीमारी से मरने पर भी फँसना तय था। मौत का डर सिर्फ इन्हें ही नहीं था।

एक बार मैं छुट्टियों में गाँव गया हुआ था तो उनकी एक शिकायत पर होने वाले मुआयने का प्रत्यक्षदर्शी बना। इन्होंने अपने भतीजों पर यह संगीन आरोप लगाया था कि उन्होंने रातोरात इनके दरवाजे पर लगे पन्द्रह-सोलह आम के हरे पेड़ काट डाले और जड़ भी खोद ले गये ताकि कोई सबूत न रहे। थाने का सिपाही मौका-ए-वारदात पर पहुँचकर पेड़ों की जगह पूछने लगा तो सभी लोग हैरान हो गये। क्योंकि बाक़लमखुद के शौक ने इन्हें पेड़ों से बहुत पहले निजात दिला दी थी।

जब रामदुलारे जी पेड़ों की जगह दिखाकर सबूत नष्ट कर दिये जाने का आरोप लगाने लगे तो भीड़ में एकाएक ठहाके गूँज पड़े। हुआ ये था कि इनके एक भाई की जमीन पर जहाँ कूड़ा फेंकने की जगह थी उसपर इन्होंने कोर्ट में अपना दावा ठोंक रखा था। उसी जगह पर कुछ आम की गुठलियाँ फेंकी गयीं थी जिनसे कूड़े की खाद और नमीं के कारण पौधे (अमोला) निकल आये थे। भतीजे ने दरवाजे का कूड़ा साफ करते समय इन बित्ते भर के पौधों को भी साफ कर दिया था और अनजाने में एक और मुकदमे को न्यौता दे दिया था…।

गाँव के भूमिहीन मजदूरों को छोड़ दें तो वहाँ शायद ही कोई गृहस्थ ऐसा होगा जो अपना राशन एक दिन की जरूरत के हिसाब से रोज खरीदता हो। लेकिन ये महाशय प्रतिदिन दुकान से चावल/आटा खरीदकर ‘ताजा’ ही बनाते थे।

भगवान की ऐसी कृपा थी कि सारी जमीन चुक जाने के बाद भी इनके पास कैश की कभी कमी नहीं होने पाती थी। जमीन जायदाद जाने के बाद भी जब हाथ खाली होने की नौबत आती तो ये दिल्ली अपने बेटों के पास जाकर बैठ जाते और प्रतिदिन इतनी गालियाँ सुनाते कि वे आजिज आकर इन्हें ‘ससम्मान’ विदा कराने पर मजबूर हो जाते। इसके अलावा खण्डहर हो चुके पैतृक मकान से मिलने वाली इमारती लकड़ियों और ईंटों को बेचकर भी इनका दिन बड़े अमन-चैन से गुजरा। एक बार दिल्लीवासी बेटे ने नये कमरे बनवाने के लिए कुछ ईंटें मंगाकर रख दी। जब निर्माण कार्य में देरी होने लगी तो इन्होंने ईंटों को भी अपने शौक के लिए किसी जरूरतमन्द के हाथों बेचकर पैसा बना लिया।

रामदुलारे जी ने गाँव में छूत-अछूत का खेल भी खूब खेला। कुछ ब्राह्मण परिवारों को समाज से बहिष्कृत कराने का अभियान चलाया। लेकिन जब इनके बेटों ने बाहर जाकर अन्तर्जातीय विवाह रचा लिए और विजातीय बहुओं ने गाँव आकर इनके घर पर कब्जा जमाने का प्रयास किया तो इन्होंने फौरन उल्टी दिशा पकड़ ली। समतामूलक, प्रगतिशील और उदार दृष्टिकोण के ध्वजवाहक बन गये। उन्हें आशीर्वाद दिया और दिल्ली में जाकर उनके ‘दान’ को ग्रहण भी किया।

अस्सी कि उम्र में भी ये फौजदारी के लिए अपने पड़ोसियों को जिस तरह ललकारते थे उसे देखकर गाँव वाले मुँह दबाकर किनारा कर लेते थे। लगभग सभी भाई-पट्टीदार इनसे किसी न किसी बहाने भिड़ चुके थे।

इन विषेषताओं के अतिरिक्त उनमें फाग (होली गीत) गाने की विलक्षण प्रतिभा थी। जवानी के दिनों में तो पूरे फाल्गुन महीने भर इनकी टेर चलती रहती थी। लेकिन पिछली होली में अस्सी की अवस्था में भी इन्होंने ढोलक की थाप और झाल की झंकार पर जमकर फाग गाया।

अब उनके चले जाने के बाद गाँव में अजीब सा खालीपन आ जाएगा। उनके द्वारा थाने में की गयी शिकायतों की पोटली भी गठियाँ कर टांग दी जाएगी। गाँव में सिपाही भी नहीं आएंगे। मुकदमें का ‘सम्मन’ भी नहीं आएगा। पड़ोसी लम्बी तान कर बेखटक सोने लगेंगे। इनका साहचर्य खो देने के बाद इनकी पत्नी भी तत्काल बूढ़ी हो जाएंगी, शायद कोई बेटा अपने साथ ले जाना चाहे। फिर इनके सूने घर की खाली जमीन पर कब्जा करने वालों को कौन रोकेगा?

कुछ लोग डरने लगे हैं कि कहीं उनका प्रेत न आ जाय…।

(सिद्धार्थ)

10 comments:

  1. ऐसी शख्सियतें अमूमन हरेक गाँव में एकाध होती है आपके चरित नायक ने भरपूर जिंदगी के मजे लिए -कुदरत उन पर कुर्बान रही और गुरवत ने छुआ तक नही ! आपने ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि रामदुलारे जी की यशः काया सहसा ही साकार हो उठी !

    ReplyDelete
  2. अच्छा चरित्र है। मैं ने भी अनेक देखे हैं ऐसे ही लोग।

    ReplyDelete
  3. हुए नामवर बेनिशां कैसे-कैसे,
    जमीं खा गई नौजवाँ कैसे-कैसे.

    ReplyDelete
  4. बिल्कुल यही चरित्र! हर रोज भांग की ठण्डई छानना और अपने द्वारा दायर तीस मुकदमों की चर्चा करना --- मरते दम तक उनकी दिन चर्या का अंग रहा।
    मलाल यह है कि पोस्ट आप लिख गये उनपर! हम सोचते रह गये!
    बहुत बढ़िया ब्लॉगरचना!

    ReplyDelete
  5. भाई लगता है आप हमारे पडोस मै तांक झाक कर के यह लेख लिख रहै है, जी हमारा सगा मोसा बिलकुल ऎसा ही था, ओर उस के बेटे उस से भी चार कदम आगे.... मजाल है किसी को भी छोड दे... एक बार आप राम राम कर के पंगा तो ले,
    बहुत मजा आया, ओर एक चल चित्र आंखो मे घुम गया.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  6. जब तक सूरज चांद रहेगा, रामदुलारे जी का नाम रहेगा।

    ReplyDelete
  7. बढिया चित्रण किया गया है रामदुलारे जी का।

    ReplyDelete
  8. aji badhiya hota ki yamraj par bewakt bula lene ke liye mukadma thok dete. achha laga ramdulare ji ki jiwan gatha padhkar. sab kuchh padhne ke bad aisa laga ki pure jiwan ya to khud assant rahe ya dusre ko assant rakha.....khair bhagwan unki aatma ko santi dyen.

    ReplyDelete
  9. बहूत बढिया पोस्ट और बहुत बढिया चरित्र चित्रण।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)