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Saturday, October 25, 2008

धुंधुकारी कौन था? (भाग-२)…पुराण चर्चा।

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि धुंधुकारी और गोकर्ण गुरुकुल में जाकर परस्पर विपरीत प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख हुए। अब आगे


धुंधुकारी के भीतर ब्राह्मणोचित गुणों का विकास शून्य था। वह परम क्रोधी और विघ्नतोषी हो गया। बुरी से बुरी वस्तुएं एकत्र करना, चोरी करना, लोगों के बीच झगड़ा करा देना और दीन – दुखियों को कष्ट पहुँचाना उसे बड़ा प्रिय था। वह खतरनाक हथियार लेकर घूमा करता और सज्जनो, मासूम पशु-पक्षियों व अन्य जीवों के लिए आततायी बन जाता। उसे पूजा-अराधना जैसे कार्य तुच्छ और हीन लगते थे। वह उम्र बढ़ने के साथ ही व्यभिचार में लिप्त रहने लगा। उसके वेश्यागमन से आत्मदेव की प्रतिष्ठा तार-तार होने लगी। आत्मदेव पुनः शोकमग्न रहने लगा।

गोकर्ण को अपने पितातुल्य आत्मदेव का दुःख देखा न गया। उसने उन्हें वैराग्य का उपदेश दे डाला। इस जगत को नश्वर और पुत्र, स्त्री व धन को मोह-माया का बन्धन बताते हुए इन्हें समस्त दुःखों का कारण बताया। सुख की प्राप्ति के लिए ऋषि- मुनियों की भाँति मोहरूपी अज्ञान को त्याग देने का उपदेश देकर गोकर्ण ने आत्मदेव को मोक्ष की प्राप्ति हेतु वनगमन करने की सलाह दे डाली।

गोकर्ण के उपदेश से आत्मदेव को अपना मार्ग मिल गया। उन्होंने गोकर्ण से वैराग्य का उपदेश प्राप्त किया और वैराग्य धारण कर वन की ओर प्रस्थान कर गये। वन में भगवत् साधना करते हुए उन्हे परम धाम की प्राप्ति हो गयी।

इधर पिता के चले जाने के बाद धुंधुकारी अधिक उन्मुक्त और स्वतंत्र हो गया। उसके द्वारा निरन्तर बढ़ रहे उपद्रव तथा धन के लिए डराने-धमकाने और प्रताणित करने से व्यथित धुंधुली ने कुँए में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। गोकर्ण भी माता-पिता का सानिध्य समाप्त हो जाने के बाद लम्बी तीर्थ यात्रा पर निकल गया। धुंधुकारी अब परम स्वतंत्र और निरंकुश हो गया। अब सदा वेश्याओं के साथ ही विलास में डूबा रहता था। इस व्यभिचार और कुकर्मों से उसकी बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो गयी।

धुंधुकारी को दुष्कर्मों में लिप्त पाकर वेश्याओं ने उसका अधिकाधिक दोहन प्रारम्भ कर दिया। एक बार धुंधुकारी ने राजमहल में बड़ी चोरी की और लम्बा हाथ मारा। राजमहल का धन और आभूषण इत्यादि देखकर वेश्याओं ने सोचा कि राजा के सिपाही यदि इस चोरी का पता लगा लेंगे तो धुंधुकारी के साथ ही हम सब भी पकड़ी जाएंगी, और यह अपार सुख त्याग कर कारागार का कष्ट भोगना पड़ेगा।

इस भय से आक्रांत वेश्याओं ने मिलकर सोते हुए धुंधुकारी को दहकते हुए अंगारों से जलाकर मार डाला तथा उसी घर में गढ्ढा खोदकर दफ़ना दिया। अपने कुकर्मों के फल से धुंधुकारी प्रेत बनकर भटकने लगा।

इधर एक दिन गोकर्ण तीर्थों का भ्रमण करते हुए अपने नगर वापस आया तथा उसी पैतृक आवास में रात्रि-विश्राम को रुका। उसे वाहाँ पाकर धुंधुकारी ने भयंकर रूप धारण कर उसे डराने का प्रयास किया। किन्तु ज्ञानी गोकर्ण ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि यह कोई दुर्गति को प्राप्त जीव है।

गोकर्ण द्वारा संयत और प्रेमपूर्ण वाणी में परिचय पूछने पर धुंधुकारी फूट-फूटकर रो पड़ा। अपनी दुर्गति और वेश्याओं द्वारा जलाकर मार दिये जाने की कहानी विस्तार से सुनाते हुए उसने गोकर्ण से हाथ जोड़कर प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। अपने भाई के प्रति गोकर्ण के मन में संवेदना का भाव उमड़ पड़ा और उसने उसकी मुक्ति का प्रयास करने का वचन दे दिया।

गोकर्ण से मुक्ति का आश्वासन पाकर धुंधुकारी प्रसन्न भाव लेकर चला गया; किन्तु गोकर्ण की आँखों से नींद गायब हो गयी। अपना वचन पूरा करने का मार्ग नहीं सूझ रहा था। प्रातःकाल उसके नगर आगमन का समाचार पाकर क्षेत्र के विद्वतजन उसके दर्शनार्थ आए। गोकर्ण ने सबसे प्रेतबाधा के निवारण के उपायों पर चर्चा की लेकिन सभी वेदों और शास्त्रों को खंगालने के बाद भी सर्वसम्मत समाधान नहीं मिल सका।

गोकर्ण ने तब भगवान सूर्य की अराधना की और धुंधुकारी की प्रेतयोनि के अन्धकार से मुक्ति का उपाय पूछा।

सूर्यदेव प्रकट हुए और बोले- “वत्स! तुम्हारे भाई की मुक्ति केवल श्रीमद्भागवत पुराण के श्रवण से हो सकती है; इसलिए तुम उसे सप्ताह-श्रवण कराओ।” उन्होंने बताया कि इस दिव्य कथा के श्रवण से न केवल धुंधुकारी को प्रेतयोनि से छुटकारा मिल जाएगा; बल्कि सर्वत्र कलुष मिटेगा और सर्वमंगल की वर्षा होगी।

सूर्यदेव का मार्गदर्शन पाकर गोकर्ण ने धुंधुकारी के उद्धार और सर्वमंगल की कामना से श्रीमद् भागवत की कथा सुनाने का निश्चय किया। पूरे क्षेत्र में यह शुभ समाचार फैल गया। कथा सुनने के लिए विशाल जन समुदाय उमड़ पड़ा। एक उँचे आसन (व्यास-गद्दी) पर बैठकर गोकर्ण ने कथा का वाचन प्ररम्भ कर दिया।

कथा सुनने के लिए धुंधुकारी-प्रेत भी वहाँ पहुँचा। बैठने का स्थान खोजते हुए उसने वहाँ गाड़े गये सात बाँस देखे। उसी में से एक बाँस के भीतर बैठ गया और ध्यानमग्न होकर अमृतमय कथा का रसपान करने लगा।

संध्या होने पर जब कथा को विराम दिया गया, तभी वह बाँस जोरदार आवाज के साथ फट गया। इसी प्रकार सात दिन की कथा में सातो बाँस क्रमशः फटते गये। अन्तिम दिन धुंधुकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर दिव्यरूप में सबके सामने प्रकट हो गया। चेहरे पर दिव्य आभा, शरीर पर राजसी वस्त्राभूषण और सिर पर तेजमय मुकुट। सभी उसे विस्फारित आँखों से देखने लगे।

तभी वहाँ भगवान श्रीकृष्ण के पार्षदों को लेकर एक दिव्य विमान उतरा। पार्षदों ने आदरपूर्वक धुंधुकारी से विमान में बैठने का आग्रह किया। विस्मित गोकर्ण ने उन्हें टोका- “मान्यवरों! यहाँ सभी श्रोताओं ने समान रूप से कथा सुनी है; किन्तु आपने मात्र धुंधुकारी को ही इस विमान के लिए क्यों आमन्त्रित किया?”

मुख्य पार्षद ने स्पष्ट किया कि इसफल-भेद का कारण श्रवण-भेद है। यह सत्य है कि सबने कथा का श्रवण समान रूप से किया, किन्तु इस प्रेत के समान कथा पर मनन किसी और ने नहीं किया। धुंधुकारी ने सात दिनों तक निराहार रहकर अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखते हुए इस कथा का श्रवण किया था, और साथ में इसपर मनन भी करता रहा। इसीलिए यह भगवान श्रीकृष्ण के परम पद को प्राप्त करने का अधिकारी बना।

इतना कहकर सभी पार्षद धुंधुकारी को विमान में लेकर गोलोक को चले गये।
(कथा समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

5 comments:

  1. बहुत सुंदर कथा रही, आनंद आ गया और प्रेरणा यह मि‍ली कि‍ सि‍र्फ श्रवण ही काफी नहीं है, मनन-चिंतन अत्‍यंत आवश्‍यक है, श्रवण का लाभ भी तभी मि‍लता है।
    अच्‍छी कथा पढ़वाने के लि‍ए आभार।

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  2. श्रीमद्भागवत महिमा के लिए आभार ! जय हो !

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  3. अच्छा लिखा भैया। हम सब में जो धुंधुकारी है, वह श्रवण भेद से ही मुक्त होगा।

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  4. वाह यह कथा सुना कर आप भी भागवत कथा सुनाने के पुन्य के भागी हो गए -बड़ा ही रोचक प्रसंग है यह भागवत की प्रस्तावना !
    दीपावली आप और परिवार को खूब सुख समृधि प्रदान करे !

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  5. आप ने बहुत ही सुंदर ढंग से कथा सुनाई धन्यवाद.
    आप को ओर आप के परिवार को दिपावली की शुभकामनाये

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