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Monday, October 20, 2008

एक झलक ग्रामीण उच्च शिक्षा की…

भारतवर्ष की हिन्दीभाषी गंगापट्टी जिसे कुछ विद्वान लोग गोबरपट्टी कहने में यथार्थवादी होने का सुख प्राप्त करते हैं; इसके दूरस्थ ग्रामीण इलाके शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए रहे हैं।

बनारस, इलाहाबाद, फैजाबाद, गोरखपुर और जौनपुर के विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध अनेक महाविद्यालयों की स्थापना पूर्वी उत्तरप्रदेश के देहाती इलाकों में उच्च शिक्षा के लिए हुई है। इनमें नये-नये व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर नौकरी लायक शिक्षा को स्थानीय स्तर पर सुलभ कराने की कोशिश की जा रही है। इसमें आजकल बी.एड. का पाठ्यक्रम खासा लोकप्रिय हो चला है।

सर्वप्रथम स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों को कक्षा-०६ से कक्षा-१० तक के लिए शिक्षक बनने का कैरियर चुनने के लिए इस पाठ्यक्रम को बनाया गया था। लेकिन परवर्ती सरकारों ने इस उपाधि के धारकों को प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालयों (digree colleges) तक में पढ़ाने का अवसर देने के निर्णय लिए हैं। इसका असर ये हुआ है कि सर्वाधिक नौकरी के अवसर खोलने वाली इस उपाधि के लिए भारी भीड़ लग रही है। लड़के-लड़कियाँ, आदमी-औरत, युवा-प्रौढ़ आदि सभी बी.एड. करने को प्रयासरत हैं।

अतः इसके लिए राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है जिसमें कई लाख स्नातक भाग लेते हैं, इसमें जो अभ्यर्थी सफल होता है वह इस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जब पढ़ने जाता है तो वहाँ का माहौल कुछ ऐसा पाता है- :)

[चित्र www.usc.edu.ph से साभार ]

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित उदाहरण है जो योगेन्द्र कुमार त्रिपाठी - प्रशिक्षु शिक्षक ने अपने निजी अनुभव के आधार पर बतायी है।)
एक कक्षा बी.एड. की जिसमें हैं प्रशिक्षु
कुल ९८
महिलाएं १४
शादी-शुदा १२
कुआँरी लड़कियाँ ०२
पुरुष ८४
शादीशुदा ४५
कुआँरे लड़के ३९
सबसे छोटी उम्र-२४ वर्ष
सबसे बड़ी उम्र-४२ वर्ष

कक्षा में एक चुटकुला जो एक उत्साही नौजवान छात्र ने सुना दिया

एक सरदार के तेरह बच्चे थे। उससे एक व्यक्ति ने पूछा- इस जमाने में भी इतने बच्चे? सरदार जी बोले- इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, गलती सब मेरे ससुर की है। व्यक्ति चकराया, “वो कैसे?” सरदार ने साफ किया- “क्यूँ कि शादी के समय ससुर जी ने मुझसे जुबान लिया था कि मै उनकी बेटी को कभी खाली पेट न रखूँ।” :)
हा,हा,हा,हा…

इस पर बवाल हो गया। महिला प्रशिक्षुओं द्वारा आपत्ति :(

सभ्यता संस्कृति की दुहाई
हूटिंग, हाय तौबा

पीड़ित चुटकुलेबाज द्वारा दुःखी होकर अपनी व्यथा एक कविता में डाल दी गयी
ये रही वो कविता :)

कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी,
मैने यूँ ही कुछ कह दिया और इतनी बड़ी बात हो गयी
किसी ने सिखाया, किसी ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया
किसी ने तो हद कर दी भाई
सभ्यता और संस्कृति का ऊँचा-ऊँचा पहाड़ दिखाया
लोगों की संवेदना जाग गयी
मैने सोचा चलो अच्छा हुआ भाई।
कम से कम लोगों में संवेदना तो आयी
किसी ने केवल प्रश्न-चिह्न लगाया।
तो किसी की नाक-नक्श और भौवें चढ़ आयीं
मैने तो केवल चुटकुला सुनाया था
लोगों को हँसाने का काल्पनिक बहाना बनाया था।
लेकिन ये लोगों की संस्कृति पर बन आयी।
मैने सोचा क्या इतनी बड़ी बात हो गयी
कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी।

फिर आया महिलाओं का खेद प्रकाश

उन्हें अपने द्वारा की गयी हूटिंग पर सच में पछतावा हो गया -:(

फिर क्या था ?
उत्साह में फिर एक और कविता। ये रही:-

मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो
घर में क्या छुप-छुप कर अश्लीलता में लजाते हो
कभी धर्म के नाम पर, कभी समाज के नाम पर
तुम तो हमेशा संस्कृति और सभ्यता चिल्लाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

तो तुमसे एक प्रश्न है मेरा
क्यूँ नहीं लोगों में मानवता फैलाते हो
जब चौराहे पर लुट रही किसी की मर्यादा तो
क्यूँ नहीं सब मिलकर हो-हल्ला मचाते हो?
तब तो अपने दामन को पाक साफ बचाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

माना कि मैने कुछ गलत कहा
तो क्यूँ नहीं तुम्ही सब सच-सच बताते हो
बातों ही बातों में समता की बात चलाते हो
दुनिया भर की बातें हैं सोचने समझने को
तो फिर इस छोटी सी बात पर क्यूँ अटक जाते हो?
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो?

अब तो हद ही हो गयी।

लेकिन महिलाओं ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा
बस माफी मांग ली।
माफ़ी दे दो भाई!
हमने आपत्ति ग़लत उठाई!
:) (।) ):
(प्रकरण समाप्त)

क्या कहेंगे इसे?

नारी की हार, शान्ति की चाह, वाद-विवाद से पलायन, या और कुछ??

अभी नारीवाद को लम्बा रास्ता तय करना है।?

(सिद्धार्थ)

16 comments:

  1. सिद्दार्थ जी मैं इस वृत्तांत से तत्त्काल तादात्म स्थापित कर गया हूँ क्योंकि अभी कल ही बी एड की परीक्षा में सुबह ४ बजे से सायं सात बजे तक शर्म /श्रम दान कर लौटा हूँ -इस परीक्षा को लेकर अब उत्साह का आलम यह है कि देशी शहरी ,विवाहित अविवाहित ,बच्चेदार -बिना बच्चेदार ,उमरदार-कमसिन और भी तरह तरह के संयोगों वाले नर नारी इसकी कतार में थे .
    जहा मानवता इतने विविध और समग्र रूप में होगी इंगित रचनाधर्मिता वहाँ सहज ही आ उपस्थित होगी !

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  3. अभी शायद बीएड मे ये नजारा देखने मिल रहा हैं, जल्द ही अन्य क्षेत्रों मे भी देखने मिल जायगा क्योंकि सभी जगह लक्षण समान दिखाई पड रहे हैं, यहाँ मुम्बई की बात करूँ तो स्टूडेंट्स का नजरीया जस्ट फॉर फन पर ज्यादा जोर मारता है।

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  4. हम थोड़ा इस माहौल से दूर हो गये हैं तो अचरज सा ही हो रहा है बस.

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  5. वाद विवाद से पलायन

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  6. आर्कषक चित्रण | बड़ा सही माहौल है बी एड का | अन्यथा विज्ञानं में सुन्दरता काफी कम नज़र आती है | हमारे इलेक्ट्रानिक्स की क्लास में बड़ी नीरसता थी | हम जानबूझ के बायोलोजी और केमिस्ट्री की क्लास में गलती से चले जाते थे |

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  7. shikshak banane ke liye itna to karna hee padega. holiday adhik, kam kam. ab shikshak bhee sarkari karmchari ki tarah ho gaye

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  8. इस दुनिया की झलक दिखाने का शुक्रिया

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  9. चित्र देख कर एक बारगी चकरा गया। गोबर पट्टी में यह झकाझक! फिर www.usc.edu.ph देख समझ में आया कि चित्र बिलायती है। लेकिन दूसरी चकराहट बनी हुई है। योगेन्द्र त्रिपाठी जी के अनुभव से लगता है, परिदृष्य बड़ी तेजी से बदल रहा है।
    इस पोस्ट ने हमें आउट आफ डेट होने का अहसास करा दिया। और सोचने को मसाला भी दिया।

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  10. हम तो वाद-विवाद से पलायन ही कहेंगे... झूट मुठ के बात के बात बढ़ाने का क्या लाभ !

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  11. yaha college me aane ke bad aaj pahli bar blog par kuchh padhane ka mauka mila. badhiya post. sardar ji wale chutkule ne gudgudaya.

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  14. पवन जी,
    एक ही कमेण्ट तीन बार प्रकाशित हो गया था, इसलिए इसमें से दो को हटा दिया है।

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  15. कुछ महिलाएं आपस में बात कर रही थीं। एक ने पूछा-आखिर ये मर्द लोग अकेले में कैसी बातें करते हैं? एक ने जवाब दिया -वैसी ही करते हैं जैसी बातें हम अकेले में करते हैं।
    सवाल करने वाली की प्रतिक्रिया थी -हाय राम! बड़े बदमाश होते हैं ये मर्द लोग।

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  16. atyant jaankari parak post.

    bahut achcha laga.

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