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Monday, September 29, 2008

किताबों की खुसर-फुसर… भाग-२

पिछली कड़ी से आगे…

‘मातृत्व तथा बच्चों की फिक्र’(१९३१) की भूमिका में लिखा अथर्ववेद का श्लोक समझने का प्रयास कर ही रहा था कि दीवार से लगी बड़ी सी मेज पर फड़फड़ाहट की आवाज तेज हो गयी। उसपर बहुत सी पत्रिकाएं बिखरी पड़ी थीं। वहाँ की नोक-झोंक इतनी तेज थी कि अनायास ही आलमारियों में रखी किताबें भी अपनी बतकही बन्द करके उधर कान लगाकर सुनने लगीं।

“अरे चुपकर बावरी, यह तो बस दिखा रहे हैं, इन्हें मातृत्व से क्या लेना देना… उस किताब ने टोक दिया तो उसका मन रख रहे हैं। ”

“हाँ जी, …इतने ही साहित्य रसिक होते तो इधर न आते…”

“तू बड़ी भोली है, इन्हें तो शायद पता ही न हो कि हिन्दी में कितनी साहित्यिक पत्रिकाएं छपती हैं…” आखिरी बात सुनकर मैं वाकई झेंप गया।

…मुझे तो हंस, कादम्बिनी, आजकल और इण्डिया टुडे की साहित्य वार्षिकी के अतिरिक्त कोई पत्रिका पता ही नहीं थी। …हाल ही में हिन्दुस्तानी त्रैमासिक की जानकारी हुई जब एकेडेमी का लेखा-जोखा सम्हालने के लिए नामित हो गया। …छः-सात साल पहले लखनऊ में किताब की शक्ल वाला एक त्रैमासिक ‘तद्‍भव’ जरुर खरीद कर देखा था। …और हाँ, छात्र जीवन में धर्मयुग पढ़ा था और इसके बन्द हो जाने पर साहित्य जगत की श्रद्धाञ्जलि भी देखी थी।

मैने झटसे मातृत्व को गोपालजी के हवाले किया और उस मेज के पास चला गया। मेज क्या थी; दो लोगों के आराम से पसर कर सोने भर का क्षेत्रफल था उसका। …लेकिन तिल रखने की जगह नहीं थी उसपर। एक दूसरे के ऊपर चढ़ी हुई साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक पत्र-पत्रिकाएं अटी पड़ी थीं। उनके ऊपर धूल तो नहीं जमीं थी, क्योंकि गोपालजी उनकी इतनी सेवा का खयाल जरूर रखते हैं; लेकिन उनके चेहरे पर छायी उदासी यह जरूर बता रही थी कि इनकी उपेक्षा हुई है। …दूर-दूर से चलकर यहाँ एक अदद प्रेमी (पाठक) की तलाश में ये आ तो गयी हैं, लेकिन इन्हें मन के मीत से मुलाकात की प्रतीक्षा जारी है। मुझे कबीर दास जी याद आ गये-

अंखड़िया झाईं पड़ीं, पन्थ निहारि-निहारि।

जीभड़्याँ छाला पड़्या, राम पुकारि-पुकार॥


पोर्टब्लेयर (अंडमान) से छपने वाली ‘द्वीपलहरी’ हो या वर्धा की ‘राष्ट्रभाषा’, बीकानेर की ‘वैचारिकी’ हो या देहरादून की ‘लोकगंगा’ , समस्तीपुर से आयी ‘सुरसरि’ हो या आणंद (गुजरात) से पधारी ‘रचनाकर्म’, इन्दौर में प्रस्फुटित ‘वीणा’ का राग हो या रायपुर में अनुष्ठानित ‘अक्षरपर्व’ हो, या फिर पूना की ‘समग्र दृष्टि’ हो, राजसमन्द (राजस्थान) का ‘सम्बोधन’ हो अथवा गोरखपुर का ‘दस्तावेज’ व सुल्तानपुर (उ.प्र.) की ‘रश्मिरथी’; ये सभी भारतवर्ष के कोने-कोने से आकर संगम नगरी में एक ही पटल पर सामुदायिक जीवन जी रहे, या कहें, काट रहे हैं। सबकी साझा तकलीफ देखकर मैं ग्लानि और अपराध बोध से भर गया।

कुछ बड़े केन्द्रों से प्रकाशित पत्रिकाएं भी उतनी ही क्लान्त थीं। जैसे: दिल्ली की ‘आजकल’, ‘आलोचना’, ‘मन्त्र तन्त्र यन्त्र’, ‘कथादेश’, ‘साहित्य अमृत’, ‘समीक्षा’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘हंस’, ‘राजभाषा भारती’, ‘इण्डिया टुडे’ व ‘सदाकांक्षा’; मुम्बई से छपने वाली ‘सृजन सांख्य’, ‘कथाबिम्ब’ व ‘हिन्दुस्तानी जबान’; भोपाल की ‘दिव्यालोक’, ‘आयुष्मान’, ‘चौमासा’ व ‘साक्षात्कार’, लखनऊ की ‘कथाक्रम’ व ‘तद्‍भव’, इलाहाबाद की ‘त्रिवेणिका’, ‘विज्ञान’, ‘नई आजादी उद्‍घोष’, ‘सम्मेलन पत्रिका’, ‘हिन्दी अनुशीलन’, ‘हिन्दुस्तानी’, ‘हुड़दंग’ व ‘साहित्य वैचारिकी’।

मैं इनके नाम-पते नोट करने लगा तो एक फिकरा कान में पड़ा, “ढूँढते रह जाओगे…! इनकी दुनिया यहीं खत्म नहीं होती ” मैने हड़बड़ा कर उधर देखा।

डॉ. नामवर सिंह द्वारा सम्पादित ‘आलोचना’ बोल रही थी, “यहाँ जो देख रहे हो वह तो बस ‘हिन्दुस्तानी’ के विनिमय में आती हैं। खरीदने की औकात तो इस पुस्तकालय की बस रत्तीभर से थोड़ा ज्यादा समझ लो…”

मैं फिर चौका, “…तो क्या, हिन्दी में छपने वाली सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं यहाँ नहीं आतीं?”

जिनकी संख्या को मैं विस्फारित आँखों से देख रहा था वो अभी राष्ट्रीय पटल पर हो रहे हिन्दी अनुष्ठान की बस एक झलक भर देती हैं। उसपर हालत ये कि इनका भी कोई पुरसा हाल नहीं। मन उद्विग्न हो उठा…

मैं कुर्सी खींचकर बैठ गया। छत की ओर निहारता रहा। गोपालजी सूची बनाने लगे। तभी एक पुराने रैक से वीणा का स्वर उभरा। मधुर, कर्णप्रिय किन्तु आर्त…।

मैं उठकर उसके पास गया तो साक्षात् ‘सरस्वती’ दिखायी दीं। मैने धीरे से हाथ बढाया तो मुस्करा उठीं। सौ साल से ज्यादा की उम्र पाकर विलक्षण रूप और अनुभव तो दिख ही रहा था; वर्ष भर के अंकों को एक साथ नत्थी करके मोटा जिल्द चढ़ जाने से स्वास्थ्य भी अक्षुण्ण लग रहा था। इस मुलाकात से मेरा मन प्रसन्न हो गया।

‘हिन्दी’ के बचपन और तरुणाई की सहेली रह चुकी ‘सरस्वती’ अपनी गोद में अमूल्य निधि संजोए किसी पारखी को खोज रही थीं। मुझ अकिंचन ब्लॉगर को देखकर उनका उत्साह जग गया तो अपनी अपात्रता से मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। …गला भर आया। अब इनकी उम्मीद का क्या करूँ…।

‘सरस्वती’ अपनी बालसखी ‘नागरी’ की कहानी कहती रही; अरबी, फारसी, अंग्रेजी के बीच संस्कृत की जमीन से अंकुरित हिन्दुस्तानी के बीज से हिन्दी-उर्दू की जुड़वा पैदाइश का वर्णन करती रही; पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्याम सुन्दर दास, और पं.श्रीनारायण चतुर्वेदी के जमाने को याद करके भावुक होकर आँसू बहाती रही; और हम अवश होकर सुनते और भींगते रहे…

लाल तुम्हारे विरह की, अगिनि अनूप अपार।

सरसै बरसै नीर हूँ, झरहूँ मिटै न झार॥

(...जारी)

8 comments:

  1. बहुत अच्छा और जानकारीपूर्ण आलेख..आगे इन्तजार है.

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  2. आपकी मेहनत झलक रही है। अगली कड़ी का इंतजार रहेगा

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  3. (सत्यार्थ) मित्र, आपके व्यक्तित्व का यह नया आयाम बनते देख रहा हूं या यह पहले के आयाम का उत्कृष्ट प्रकटन है?!

    आप गहरे से घुस गये हैं एक रुचि के पोषण में।

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  4. बहुत सुंदर आलेख। आपके पिछले कुछ पुण्यकर्म रहे होंगे जो अकादेमी का काम मिला है। जब तक हैं इसी तरह
    दिल से प्रयत्न करते रहें । निश्चित ही अच्छे प्रयास खाली नहीं जाते । परंपरा , प्रतीक, थाती और संस्मरणों को बिसराने-बिगाड़ने में हम भारतीयों की सानी नहीं है। इस मामले में विदेशियों से सीखना चाहिये हमें।

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  5. इन दिनों किताबो से खुसर-पुसर किसी सफर की मोहताज है या लाइट की ...केबल की लाईट ...टी वी जायेगा तभी आप खुसर पुसर करते है....

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  6. अच्छी वैचारिकी है। मन उद्वेलित हो उठा।

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  7. SIDDHARTHJI,

    PRATHM CHIMA,AAPKE DVARA SAKCHAR KARNE KE PRAYAS KE BAWZOOD ABHEE BHEE ROMAN CHALAYE JAA RAHA HOON.........PAR AAP BHEE KYA KAREN

    FOOLAHEEN FALAHIN NA BENT,
    YADAPI SUDHA BARSAHIN JALAD.
    MOORAKH HRIDAY NA CHET.....
    ..............JO GURU MILAHIN VIRANCHI SAM !

    SHARMINDA HOON !

    PAR DONO PART (chepak sahit) YE KHUSAR PUSHAR KE BAD KHUD KO ROK NAHEEN PA RAHA.....NAGREE JAB SEEKHOONGA TO SEEKHOONGA.

    AB TO MAN KARTA HAI....FIR ACADEMY KE BAGAL BASERA HO JATA ...SIXTEES KEE TARAH TO FIR VAHEE ANANDA........

    PAR AB SHAYAD USASE BHEE BRIHAT ROLE NIBHA SAKTEE HAI ACADEMEE.YEH GYAN SAMPADA KHUSAR PUSHAR NAHEEN 'HUNKAR' BAN SAKTEE HAI.NET PAR 'DAHAD' SAKTEE HAI...SAB KA SCAN PRASTUTIKARAN HO SAKTA HAI ? HAM SAB CHAH LEN TO KYON NAHEEN ?

    MERE LAYAK SEVA HO TO JAAN TO LOON !

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