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Sunday, August 31, 2008

कुर्सी में धँसकर गान्धी का कत्ल…

अभी-अभी इलाहाबाद में एक गान्धी आये थे। …राहुल गान्धी । चर्चा में ‘गान्धी ’ पर बहस हो गयी… राहुल, वरुण, संजय, राजीव, इन्दिरा, फिरोज़, से होते हुए बात ‘असली गान्धी ’ तक पहुँच गयी।

सत्य, अहिंसा, भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता, गरीबी उन्मूलन, दरिद्रनारायण की सेवा, अस्पृश्यता निवारण का ध्येय, गीता के निष्काम-कर्म का प्रेय; यही तो थी गान्धी की राह! …विदेशी दुश्मन के सामने निर्भीक सीना ताने अडिग अपनी टेक पर स्वराज की चाह!

…साम्प्रदायिकता से लड़ाई अकेले लड़ने की धुन …जब पूरा देश स्वतंत्रता का झण्डा फहरा रहा था …तो भी वह संत इन्सानियत के शीतल जल से नोआखाली में हैवानियत की आग बुझा रहा था …

एक वहशी हिन्दू को यह गान्धीगीरी रास न आयी… उसकी गोलियों ने ‘राम-नाम’ के रस में डूबे उस निर्भीक सीने में जगह बनायी…। कानून ने पूरी चुस्ती और फुर्ती से अपना काम दिखाया …उस दरिन्दे को नियमानुसार फाँसी पर लटकाया। देश के नेताओं ने सबको ढाँढस बँधाया… “गान्धी व्यक्ति नहीं विचार है-जो कभी नहीं मरता…” ऐसा समझाया।

लेकिन यह बात समझने में हमारी आत्मा रोज झिझकती है। मन में बारम्बार यह बात खटकती है… गान्धी की तस्वीर को अपने पीछे की दीवार पर टाँगकर, उसके ‘विचारों’ की जघन्य हत्या करने की दुर्घटना रोज ही घटती है…

अखबार पलटता हूँ तो साफ दिखता है, कि आज कश्मीर में, हो रहा है रोज गान्धी का खून सरेआम… इसे अन्जाम देने वाले पहनते हैं गान्धी आश्रम की खादी… काट रहे हैं सत्ता की चाँदी… और उसी की टोपी पहनकर तिरंगे को करते हैं सलाम…

फैलने देते हैं साम्प्रदायिकता का जहर… बैठे हुए सत्ता की मखमली गद्दी में धँसकर… हिंसा को तबतक चलने देते हैं, जबतक न बन न जाये यह आँधी… भले ही कब्र में करवट बदलते-बदलते उकता कर उठ बैठें इनके बापू गान्धी…

अमरनाथ के यात्री भी हो जाते हैं अस्पृश्य, अपने ही देश में नहीं मिलती दो ग़ज जमीन, हो जाती है दुर्लभ, जहाँ बैठकर सुस्ता सकें… बाबा के दर्शन की थकान, घड़ीभर ठहरकर मिटा सकें…

ये संप्रभु राष्ट्र के शासक, जो बन बैठे अपनी कुल मर्यादा के विनाशक…। गान्धी की निर्भीकता और साहस को दफ़न करके डर से सहमते हैं… उन मूर्ख आततायियों से, जो एक ‘तानाशाह’ देश की शह पर, मज़हबी खूँरेज़ी के रास्ते से ‘ख़ुदमुख्तारी’ की बात करते हैं…।

आजादी दिलाने वाली पार्टी का विघटन करना ही उचित, यह मेरा नहीं उसी गान्धी का था विचार… लेकिन कत्ल इसका उसी क्षण हुआ जब बनी पहली भारत सरकार…।

गान्धी के ही नाम पर सत्ता की दुकानदारी चलती रही… देश में मक्कारी, गरीबी, मज़हब की तरफ़दारी, और जात-पात की लड़ाई बदस्तूर पलती रही…

गान्धी के इस देश में, उनके विचारों का यूँ तिल-तिलकर मरना हमें बहुत अँखरता है… हमारे सामने ही गान्धी के इन वंशजों के हाथों, गान्धी जो रोज मरता है…।



indiatimes.com से साभार



सोचिए, और बताइए… कहाँ है वो कानून, कहाँ अटक गया है? …गोडसे को फाँसी देने के बाद किस अन्धेरे गलियारे में भटक गया है?
(सिद्धार्थ)

16 comments:

  1. आपके चिंतन के सामर्थ्य और सीमाओं को रेखांकित करता विचारपरक आलेख .....गांधी नेतागिरी और व्यावसायिकता की दुरभि संधियों में दम तोड़ते रहे हैं .वे तब नहीं मरेथे अब तिल तिल कर मर रहे हैं

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  2. मिठास अच्छी चीज है, लेकिन शहद की तरह मीठा होने से डर होना चाहिए कि कोई चाट न जाए. गांधीजी की आध्यात्मिकता ने उन्हें यह समझने नहीं दिया, तथाकथिक सेक्यूलरों को उनकी छद्म-धर्मनिरपेक्षता उन्हें यह समझने नहीं दे रही है. वे कट्टरपंथ, अलगाववाद के साथ भी तुष्टिकरण की नीति को अपना रहे है. बल्कि होना चाहिए कि तुष्टिकरण की राजनीति छोड़कर समग्र भारत के विकास की बात करते.

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  3. नेता-ब्यूरोक्रेसी ने तो मारा ही है बापू को सतत; पर आम जनता ने भी निहाल नहीं किया। आम लोगों का भी नैतिकता को पानी मिलाना खराब लगता है।

    और आप बहुत अच्छा लिखने वालों में से एक हैं - निश्चय ही।

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  4. vicharaniy post . mai apke vicharo se kafi had tak sahamat hun.ki apne desh ke log apni jami par susta nahi sakate. abhaar

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  5. लेकिन यह बात समझने में हमारी आत्मा रोज झिझकती है। मन में बारम्बार यह बात खटकती है… गान्धी की तस्वीर को अपने पीछे की दीवार पर टाँगकर, उसके ‘विचारों’ की जघन्य हत्या करने की दुर्घटना रोज ही घटती है…
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    पूरी प्रस्तुति प्रभावशाली
    गद्य कविता की तरह है.
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    आभार
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  6. कानून अटका नहीं है, गुलाम हो गया है, गाँधी के ही हत्यारों का । एक अत्यंत विचारणीय पोस्ट। ऐसी पोस्टों के लिये साधुवाद

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  7. दरअसल गांधी को राजनेतायो ने क़त्ल नही किया ,हमने किया....आज़ादी मिलने के बाद गाँधी भार लगने लगे थे ....अगर क़त्ल नही होते तो शायद अपने आप ही दुःख से मर जाते...कभी कभी सोचता हूँ की क्या ख़ास रहा होगा उस आदमी में जिसके पीछे लाखो लोग दौड़ पड़ते थे .....कुछ तो बात होगी.वरना ट्रेन से धेकेले जाने के बाद कौन देखता उस अंधेरे में उन्हें.....यही नियति थी.....चौरा - चौरी काण्ड में क्यों हिंसा हुई ...क्यूंकि लोग जोश में आकर गांधी के रस्ते पे चल तो पड़े .लेकिन उनमे अहिंसा का वैसा जनून नही था ...... जरा सी गाली दी या किसी ने डंडे मारे ....नही सहन कर पाये ....फर्क सिर्फ़ जनून का था .....आज़ादी के बाद जो सच्चे गांधीवादी थे वो मर खप गए बाकियों ने अपने रास्ते पकड़ लिये ....ओर अब गांधी सिर्फ़ कांग्रेस के हो गए है......कभी सोचा है किसी ने २३ साल के उस भगत सिंह में क्या सोच थी ?जेल में रहकर भूख हड़ताल ?इतना घबरा गई थी सरकार की रातो रात फांसी दे दी.....क्या उम्र होती है २३ साल ?पर वो वक़्त ओर था .......वो जज्बा ओर था .............................तब चरित्र गुण माना जाता था माफ़ करना आजकल ये कमजोरी है.....

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  8. जो जहाँ है वही गाँधी को मारता है, साथ में दुसरे को गाली देकर.
    सब कहते हैं नेता ख़राब हैं, बाबू ख़राब हैं, कचहरी में घुसखोर हैं... पर वो भी वही काम करते हैं. हम सब छोटी-बड़ी गलतियों से गाँधी को मारते हैं, साथ में दुसरो पर दोषारोपण करने से नहीं हटते. यही... सच्चाई है !

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  9. मान्यवर, रचना पढ़कर यही लगा कि गाँधी का इस दुनिया से उठ जाना इतना दुर्भाग्यशाली नही था जितना हमारे विचारों से उठ जाना. मेरे विचार से गाँधी के साथ सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि गाँधी को मात्र एक व्यक्तित्व मान लिया गया, मात्र एक पौराणिक चरित्र. राम और कृष्ण की भाँति एक महापुरुष जिसकी पूजा तो की जा सकती है, परंतु जिसका अनुगमन नही. इससे बड़ी क्रूरता क्या होगी की जिस गाँधीवाद को कालजयी समझा गया था, और समझा भी क्यों नही जाता, दो महाद्वीपों की समकालीन तीन पीढ़ियों ने उसे स्वीकार, अंगीकार किया था, उसी गाँधीवाद को अपनी मातृभूमि से निर्मूल होने में एक पीढ़ी भी नही लगी.

    लेकिन गाँधीवाद की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर नही करती कि हमने उसे अपनी पीढ़ी में कितनी इज़्ज़त बख़्शी, अपितु हमने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या ज़मीन तैयार कि. एक बात तो तय है, अंततः हमें लौटना उसी गाँधीवाद पर है,इस पीढ़ी में नही तो अगली पीढ़ी में. अभी रोलिंग स्टोन और कॉल सेंटर कि दुनिया में जी रही यह पीढ़ी अभी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. मक्डोनाल्ड के बर्गर और मा के हाथों की खीर के पशोपेश में हमारी पीढ़ी अपनी पहचान ढूँढ रही है. यकीन मानिए आइडेंटिटी की यह तलाश अपनी जड़ों पर ही ख़तम होगी. हम इसी, नहीं तो अगली पीढ़ी में गाँधी को पुनः अंगीकार करने जा रहे हैं.

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  10. गांधी महात्मा थे, उनका सार्वजनिक कद इतना ऊंचा था कि उनकी बस जय-जयकार ही की जा सकती थी। लेकिन इस व्यक्ति ने राजनीति कैसी की, इसकी भी परख ज़रूरी है, तभी हम उनके चिंतन को सही अर्थों में लागू कर पाएंगे। मेरा अपना मानना है कि देश में चल रही दलाली की राजनीति के बापू यही गांधी महात्मा रहे हैं।

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  11. duniya petrol se chalati hai,city lohe khate hai...satya bhram hai aur ahinsa ka pata nahi....ek adami ki khopari per ajadi ka taj rakhana rastra ki atama ke sath apradh hai....usaki saja to bhugatani hi paregi....kaya kalia nag duhai dene se bhgwan krishana ki bat man leta ? Hum!! Britishers Ahinsa se bhage !! Jhuth par-par ke tang aa chuka hun...
    alok nandan

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  12. भाषा, विचार और विषय अत्यन्त प्रभावशाली हैं !
    आपका लेख आत्ममंथन के लिए विवश करता है !
    बहुत धन्यवाद ! शुभकामनाएं !

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  13. महात्‍मा गांधी के विचारों की हत्‍या तो आजादी के साथ ही शुरू हो गयी थी। उन्‍होंने कांग्रेस को भंग कर देने को कहा, लेकिन कांग्रेसी तैयार नहीं हुए। वे देश के बंटवारे के खिलाफ थे, लेकिन उनकी एक न सुनी गयी।

    सच तो यह है कि महात्‍मा हमारे उन राष्‍ट्रनेताओं के लिए असुविधाजनक हो गए थे, जिनपर हम फूल चढ़ाते हैं। शायद यही कारण है कि खुफिया सूचना मिलने के बाद भी उनकी सुरक्षा का पुख्‍ता बंदोबस्‍त नहीं किया गया।

    हमारे सत्‍तालोलुप नेताओं ने पहले राष्‍ट्रपिता की हत्‍या होने दी, फिर राष्‍ट्रभाषा के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेडि़यां पहनायीं।

    आपकी बाढ़ वाली पोस्‍ट भी पढ़ी। मानवीय संवेदना से परिपूर्ण कविता और अच्‍छा लेख प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद।

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  14. मे अशोक पाण्डेय जी की बात से सहमत हू, ओर आज उसी कोरवो की कांग्रेस मे गांधियो की लाईन लगी हे, ओर तो ओर अब तो गोरे गोरिया भी गांधी बन गाये हे,

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  15. गोडसे को वहशी हिंदू, बोल आप एक निस्वार्थ आत्मा का अपमान कर रहे हो. यह भी तो देखो की गाँधी ग़लतियो के कारण सबसे बड़े काबिल नेता श्री सरदार पटेल प्रधानमंत्री कुर्सी से वंचित रह गये अलग दिया गया. उन्हे दूध की मखी तरह अलग कर दिया गया.

    नेहरू (जो की एक कामुकता से भरपूर,चरित्रहींन व्यक्ति थे) ने प्रधानमंत्री कुर्शी हड़प ली. 55 लाख निर्दोष हिंदू मारे गये (कवन् उनका ज़िम्मेदार? क्या गाँधी की कोई ज़िम्मेदारी नही?)

    अगर गाँधी राष्ट्रपिता है, तो वो ही ईन्न निर्दोष हिंदू के खून ज़िम्मेदार . टिब्बेट भारत से हो गया.घोद्से ने जो किया उसका कोई व्यक्तिगत हिट नही था..

    उसकी फैमिली से कोइ भी नही मारा था.. मगर उसने हिंदू समाज की अस्मिता के लिए आपने प्राणो बलि दी.

    do reply me let me know your comments.

    Your brother, Shivnarayan

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  16. अपने ब्लॉग पर मिली आपकी टिपण्णी से यहाँ तक पहुंचा हूँ.. दरअसल ये भी एक सच है.. इतिहास के पन्नो में ना जाने कितने सच छुपे हुए है.. जिसको जो पहले मिला वो उठाया.. सच तो ये है की गांधी यहाँ रोज़ मरते है. और जिसके लिए सबसे ज्यादा अपराध होते है.. उन नोटों पर भी गांधी जी होते है.. गांधी को पाने के लिए गांधी के उसूलो की ही बली दे दी जाती है..

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आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)