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Sunday, August 24, 2008

कुछ कचोटते प्रश्न…???

वैसे तो जबसे खबरिया चैनेलों ने समाचार दिखाने के बजाय विज्ञापन बटोरने की होड़ में घटिया तमाशा, भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, और बेडरूम के झगड़े इत्यादि पर कंसेण्ट्रेट करना शुरू कर दिया है तबसे मैने टी.वी. पर समाचार देखना लगभग बन्द सा कर दिया है, लेकिन शनिवार की शाम को भोजन के समय एक न्यूज चैनेल पर मेरी निगाह अटक ही गयी।

आइटम तो वही ‘स्टिंग ऑपरेशन’ वाला ही था; लेकिन यहाँ इस औंजार का शिकार किसी राजनेता, अभिनेता अथवा किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को नहीं बनाया गया था। बल्कि इसके केन्द्र में एक आठ-नौ महीने की बच्ची की देखभाल कर रही नौकरानी थी। इस ऑपरेशन को अन्जाम देने वालों में भी कोई मीडिया वाला नहीं था। बल्कि, उस बच्ची की अपनी माँ थी, जो नौकरीशुदा होने के कारण अपनी दूधमुँही बच्ची को घर पर उस नौकरानी के भरोसे छोड़ कर जाती थीं। पतिदेव भी कहीं बड़े नौकर थे।

उस वयस्क उम्र की नौकरानी को दिखाया गया कि वह सारी ममता और दया को शर्मसार करती हुई किस प्रकार उस मासूम को चुप कराने के लिए थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद करती जाती है, बिलख कर रोती हुई बच्ची की आवाज बन्द करने के लिए उसके मुँह में रबर की निप्पल जबरिया घुसेड़ देती है, और उसको एक मोटी सी चादर से पूरी तरह ढंक देती है। रोती हुई बच्ची उफ़नाकर चादर हटाती है तो फिर मार पड़ती है। प्रतिकार में वह अपने दम भर रोती है लेकिन अन्ततः थक कर सो जाती है। वह क्रूर औरत बच्ची को चुप कराने के बजाय मोबाइल पर बात करने को ज्यादा तरज़ीह देती है…। उस बच्ची की माँ का ये भी कहना था कि इस नौकरानी को घरेलू शिष्टाचार का अच्छा ज्ञान था। वह सबके सामने इसका प्रदर्शन करके विश्वासपात्र भी बन गयी थी। लेकिन माँ तो बस “माँ” होती है। उन्हें जाने कैसे शक हुआ और उन्होने यह हृदय विदारक ऑपरेशन कर डाला। अब उनके पास अफ़सोस है, और आँसू हैं…

यह सब देख-सुनकर मेरी पत्नी तो जैसे थर-थर काँपने लगीं। मेरी आठ वर्षीया बेटी भी उद्विग्न हो उठी। डेढ़ साल का बेटा तो मस्ती से सो रहा था, लेकिन उसकी माँ और दीदी के मन में उसके लिए जो एक डर बैठ गया उसे दूर करने के लिए मुझे काफ़ी परिचर्चा करनी पड़ी। याद दिलाना पड़ा कि मेरे बच्चे इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें माँ-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मौसी आदि से युक्त संयुक्त परिवार का अपार स्नेह मिलता रहा है। घर छोड़कर नौकरी करने से थोड़ी अड़चन जरूर है। लेकिन वेतनभोगी नौकर के हाथ में उन्हे सौंपने की जरूरत नहीं आने वाली है। खैर…

अब, जब वे तीनों सो चुके हैं तो मेरे मन में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब सीधा नहीं आ रहा है। एक सवाल मेरी पत्नी ने भी उठा दिया इसलिए शुरुआत उसी से करता हूँ।

उनका सवाल था कि उस महिला के स्थान पर यदि कोई पुरुष होता तो क्या वह भी उस अबोध के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करता? मेरा जवाब था ‘पता नहीं’ लेकिन उनका मानना था कि कोई पुरुष शायद उस बच्ची को भले ही चुप नहीं करा पाता लेकिन वह ऐसा भी नहीं करता जैसा उस दुष्ट महिला ने किया।

यह विचार थोड़ा सब्जेक्टिव टाइप का है, इसलिए छोड़ते हैं। आप अपना विचार इसपर भी दे सकते हैं। लेकिन जो सवाल मुझे कचोट रहे हैं उनका यहाँ केवल जिक्र कर रहा हूँ। इनका जवाब हम मिलकर ढूँढेंगे:-

१.क्या एक सभ्य समाज के नाते हमें ऐसी व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए कि एक मासूम को उसकी जीती-जागती माँ का वात्सल्य भरपूर मात्रा में मिल सके?

२.क्या पति-पत्नी दोनो का नौकरी करना इतना आवश्यक और अपरिहार्य हो गया है कि उसकी कीमत एक बच्चे को माँ की ममता से हाथ धोकर चुकानी पड़े?

३.जिस औरत को ममतामयी और दयालु कहकर महिमा-मण्डित किया जाता है क्या वह प्यार और ममत्व की सेवा (नौकरी) के बदले मजदूरी (वेतन) लेकर भी अपनी ड्यूटी न निभाते हुए इतनी क्रूर हो सकती है?

४.क्या वह पारम्परिक व्यवस्था जिसमें पति-पत्नी परिवार की गाड़ी के दो पहिए होते थे, जहाँ घर का पुरुष जीविका कमाकर बाहर से लाता था, और पत्नी घर के भीतर का प्रबन्ध संभालती थी; इतनी अनुपयुक्त और अधोगामी हो गयी है कि उसे पूरी तरह से त्याग कर काम के बंटवारे के बजाय काम में प्रतिस्पर्धा का वरण किया जाना अपरिहार्य हो गया है?

५.आज के उपभोक्तावादी समाज में कहा जाता है कि धनोपार्जन से ही सुख के साधन जुटाये जा सकते हैं। लेकिन क्या इस धन को ही सुख का एकमात्र साधन मान लेना हमें हमारे ‘साध्य’ से भटका तो नहीं रहा है? क्या इस आपा-धापी में धन ही हमारा साध्य नहीं होता जा रहा है?

६.नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए उसका धनोपार्जन करना कितना जरूरी है? नारी की बौद्धिक जागृति के लिए नैतिक और मूल्यपरक शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है कि उसकी आर्थिक सम्पन्नता के लिए तकनीकी शिक्षा?

७.स्त्री और पुरुष के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध ठीक हैं कि उनके बीच हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा होना ठीक है। क्या स्त्री और पुरुष का आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रकृति-सम्मत भी है? ताजे ओलम्पिक खेलों में कुछ संकेत खोजे जा सकते हैं क्या?

८.परिवार का गठन कैसे हो? या, यही कि पारिवारिक जीवन कितना जरूरी है?

प्रश्न तो बहुत से बेतरतीब उमड़-घुमड़ रहे हैं, लेकिन अभी बस इतना ही। मैं इनपर आपके जवाब और टिप्पणियों की प्रतीक्षा करूंगा। इस संबंध में अपने मन की धारणाओं से भी आपको जरूर अवगत कराउंगा, अपनी अगली पोस्ट में।
(सिद्धार्थ)

18 comments:

  1. यह पोस्ट यह प्रिमाइस (premise) ले कर चलती है कि मां बाप अपने बच्चों को पूरी ममता से पालते हैं। मुझे तो इस पर शक है। नव युग के तनाव, पैसे की जरूरतें और बच्चों से अपेक्षायें - सब मिला कर मां-बाप में हिंसा लाती है और उसके शिकार बच्चे होते हैं।
    आप समाज को कोस लें। पर समाधान समायोजन और संतोष में है। इण्डीविजुअलिस्टिक होते समाज में कौन इन गुणों की परवाह करता है। नारी तो शायद नहीं ही करती। वह कुटुम्ब के साथ रह कर वर्चस्व खोना नहीं चाहती।

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  2. जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आपको शुभकामनाएं
    दीपक भारतदीप

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  3. आपके सवालों का जवाब तो नहीं है लेकिन इतना कह सकता हूँ की संयुक्त परिवार भले आज के समय में मुश्किल है लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं होना सम्भव नहीं दीखता.

    अगर नारायण मूर्ति की पत्नी ने काम से बच्चों के लिए अवकाश ले लिया तो नारी सशक्तिकरण वाले इसे ये कह कर भी पूछते हैं की उनहोंने ही क्यों अवकाश लिया नारायण मूर्ति ने क्यों नहीं लिया? जो भी हो कोई भी एक ले ले तो बचपन तो दे सकता है ! बचपन जो शायद सबकु्छ होता है एक आदमी के जीवन में... व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा वहां से आता है.

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  4. bhai achchi post hai.
    jab se apne yahan aapke blog ka link diya hai aapko padhne me suvidha ho gayi hai.

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  5. पश्चिम के विलासी वैभव की रौशनी से चौंधियाए,साम्यवादी,विज्ञानवादी,प्रगतिवादी,सेक्युलरवादी एवं भौतिकतावादियों की अधकचरी सोंच से उत्पन्न व्यवस्था नें आज भारत के परम्परागत समाजव्यवस्था को इतना छिन्न-भिन्न कर ड़ाला है कि उसे संभालना अब आसान नहीं दिखता। वस्तुतः पारम्परिक समाज व्यवस्था को तोड़ने वालों ने ऎसा कोई प्रतिमान ही नहीं स्थापित किया जिसको आदर्श मान समाज प्रेरणा ले पाता। प्रतिमान स्थापन तो दूर वह भ्रस्टाचार की ऎसी सड़ाँध फैला रहा है कि समाज अनुप्राणित होंने की जगह भांति-भांति के रोगो से ग्रसित होत जा रहा है।औद्योगिक,आर्थिक,तकनीकी,शैक्षणिक इत्यादि तथाकथित प्रगति की चौंध नें सुख एवं शान्ति से जीनें की स्वाभाविक अभीप्सा को हम से छीन लिया है। जबकि जो मोक्ष नहीं भी चाहते हैं वैसे लोग भी सुख-शान्ति से जीना चाहते हैं। संयुक्त परिवार,सादा जीवन उच्चविचार,सहिष्णुता एवं ईश्वर में आस्था, यह भारतीय समाज की पुष्ट एवं प्रामाणिक जीवन पद्धति थी। आदर्शों को तोड़ना जितना आसान है, नवीन आदर्श स्थापन उतना ही कठिन।

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  6. कोई पुरुष शायद उस बच्ची को भले ही चुप नहीं करा पाता लेकिन वह ऐसा भी नहीं करता जैसा उस दुष्ट महिला ने किया।

    आपको शायद एहसास नहीं है की आज के इस युग में पुरुष नौकरों के द्वारा दूध पीती बच्ची का बलात्कार करना आम है!

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  7. इस स्टिंग को देखते समय मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे ....कई महीने पहले इसे दिखाया गया था ...मन खिन हो गया था ओर एक स्त्री को देखते हुए हैरानी थी की कोई ऐसे भी कैसे हो सकता है ..मेरे एक दोस्त जो पति पत्नी दोनों डॉ है ,उसी कॉलेज में है जहाँ मेरी पत्नी पढाती है ...वे अपना अनुभव बत्ताते है की एक दिन वे घर पहुंचे तो देखा बच्ची हाथ में चाकू लेकर खेल रही है बच्ची एक साल की थी ओर नौकरानी अपने में मस्त है ....उस दिन के बाद से पत्नी ने नौकरी छोड़ दी ..एकल परिवारों में जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते है ये बहुत बड़ी समस्या है...इस विषय पर मैंने भी कभी एक लेख लिखा था ....

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  8. sanyog se wo news meine nahi dekhi par news or uske baad uthne wale prashan vicharniyen hain. aapki patni ki chinta v jayaj hai. is vishay par chinta swabhavik hai ab to mujhe v kuch likhana hi hoga is vishay par

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  9. परिवार का लोग अर्थ ही नही जानते, सिर्फ़ स्वार्थ ही याद रहता है, कि यह मेरा है ! इस बच्ची की मां और पिता से पूछें की घर के बुजुर्ग कहाँ चले गए थे जो नौकरानी की आवश्यकता पड़ी ! अगर कोई वात्सल्यमयी बुढ़िया माँ या दादी वहां होती तो शायद यह नौबत नहीं आती ! मगर आज वात्सल्य की आवश्यकता किसे है ?? और निदान किसे चाहिए ?? आवश्यकता है क्षणिक समस्या पूर्ति की, वह पैसे से हो जाएगा पर ये लोग प्यार नही खरीद सकते !.

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  10. yeh sab pashchim ke andhanukaran ka hi nateeja ha, woh samay door nahin jab ham fir se sanyukt pariwar par aa jaayenge .
    aur purush to sahi bat ha ki jyada samvedan sheel nahi ho sakta, lekin aj ka samaj naari se bhiuski samvednaay ccheen raha ha, woh bhi purush jaisi ban ne ke chakkar me kathor ho rahi hain.

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  11. Maine bhi wah sting operation dekha tha.. aur mujhe bhi laga tha ki sach koi itna nirdayi kaise ho sakta hai.. par kya kare Duniya hai babu.. bahut azeeb parchahiya mil jati hai yaha


    New Post :
    मेरी पहली कविता...... अधूरा प्रयास

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  12. Maine bhi wah sting operation dekha tha.. aur mujhe bhi laga tha ki sach koi itna nirdayi kaise ho sakta hai.. par kya kare Duniya hai babu.. bahut azeeb parchahiya mil jati hai yaha


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  13. Maine bhi wah sting operation dekha tha.. aur mujhe bhi laga tha ki sach koi itna nirdayi kaise ho sakta hai.. par kya kare Duniya hai babu.. bahut azeeb parchahiya mil jati hai yaha


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  14. यह आलेख आज ही मेरी नजर में आया. प्रश्नों के उत्तर सारथी पर एक आलेख के रूप में देने की तय्यारी चल रही है. नजर रखें!

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  15. Kya is sting operation ko aise seifish,self-centered,bajaru,-upbhoktavadi parents ke liye sabak ke roop mein nahi dekha ja sakata.Jab aise parents raton rat amiri ka sukh pane ki apani ichcha ka daman kuch samay ke liye nahi kar sakte to paid employee se emotions ki ummid kyon ki jaye.Jab ve apne Maa-Baap ki(jinki na jane kitni raaten unke rone ne kharab ki,kitni picnic,parties tumhari pathai-bimari ne kharab ki)khansi,karah,dant,dard se rulai aur man ki pukar nahi sun sakte to paid maid se ummid kyon?

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  17. मैं क्या कहूँ सिद्दार्थ भाई...
    आपने जो प्रश्न पूछे हैं,उन्हीं प्रश्नों से घिरी आहत पीड़ित और आक्रोशित मैं भी हूँ,उत्तर कहीं से नहीं मिलता।
    महंगे कपड़े,खिलौने,स्कूल दे नौकरीपेशा अभिभावकों को लगता है इतिश्री हो गयी उनके कर्तब्य की।
    दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति अब तो तभी दूर होगा जब भुक्तभोगी कम से कम तीन पीढ़ी परेशान हो यह सोचना समझना शुरू करेगी कि पुरानी व्यवस्था भी अर्थहीन न थी।

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आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)