हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, July 28, 2008

उड़ाया हुआ एक पत्र - पत्नी के नाम

आजकल चिठ्ठाजगत में दूसरों के लिखे व्यक्तिगत पत्र सार्वजनिक करने का दौर जोर पकड़ रहा है। पंगेबाज अरुण जी ने अपने किसी डॉक्टर मित्र का प्रेमिका को लिखा पत्र उसकी डायरी से उड़ाकर बाँचने की कोशिश की तो शिवकुमार जी ने उसके अनुवाद की आउटसोर्सिंग कराके अपने ब्लॉग पर ठेल दिया। यह सब पढ़-सुनकर मैने भी अपने तहखाने से एक ‘उड़ाया हुआ पत्र’ ढूँढ निकाला।

उत्तराञ्चल के अलग होने के बाद उ.प्र. सरकार के अधिकारियों की ट्रेनिंग की अकादमी (ए.टी.आई.) नैनीताल के साथ उधर ही चली गयी। आनन-फानन में लखनऊ के निकट ‘बख्शी का तालाब’ में नयी प्रशासनिक अकादमी की स्थापना की गयी। यहाँ जो पहला बैच ट्रेनिंग के लिए आया उसमें मुझे भी बुलाया गया था। कई दूसरे अधिकारी भी नौकरी के बीच से बुला लिए गये थे। वहीं हॉस्टेल के बरामदे में फेंका हुआ यह ‘रफ़’ का टुकड़ा मुझे मिला तो मैने इसे सहेज़ कर रख लिया। तब मुझे क्या पता था कि एक दिन यह ब्लॉग पर ठेलने के काम आ जाएगा…।






प्रिय सहधर्मिणी,
ओह! आज यह संबोधन लिखते हुए पहली बार कुछ अटपटा सा लग रहा है। तुम भी पढ़ो तो शायद बेतुका लगे। दो महीने बीत गये। हमें अलग-अलग रहते हुए। मैं यहाँ प्रशिक्षु-धर्म निभाने का प्रयास कर रहा हूँ, और तुम वहाँ अकेले गृहस्थी सम्भाल रही हो।

लेकिन यार, सच बताऊँ? इसका भी अपना एक अलग मजा है। जबसे हमारी शादी हुई, हम रोज सुबह उठकर एक ही मुँह देखते थे, एक ही तरह की बातें और रोज़ एक ही तरह का काम। ऊबन सी होने लगी थी। अब यहाँ आकर थोड़ा अलग माहौल मिलने लगा है। अलग-अलग किस्म के लोग हैं। काम भी ज़रा हट के है। एक से एक दिग्गज हमें पढ़ाने आते हैं।

कभी-कभी लगता है कि यूनिवर्सिटी की लाइफ वापस आ गयी है। बस तुम्हारी कमीं है। दिन में लेक्चर अटेण्ड करना, हम-उम्र दोस्तों के बीच कहकहे लगाना और रात में सोने से पहले… … (क्या सोचने लगी?)… थोड़ा बहुत पढ़ाई कर लेने का रुटीन फिर से चालू हो गया है। कितना अलग सा है न?

तुम तो जानती हो, सरकारी नौकरी की आदत पड़ जाने के बाद कार्य-कुशलता, सृजनशीलता, समयबद्धता और लक्ष्य के प्रति समर्पण की भावना बनाये रखना कितना कठिन हो जाता है। अब मुश्किल यह है कि यहाँ यही सब सिखाया-पढ़ाया जा रहा है। इतना ही नहीं, यहाँ की हमारी दिनचर्या में भी इन बातों का समावेश कराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन तुम चिन्तित मत होना। हमारी भरसक कोशिश यही है कि कम से कम तक़लीफ उठायी जाय।

जिस बात के लिए तुम मुझे सदैव कोसती रही हो, आखिरकार यहाँ आकर मुझे वह कठिन काम करना ही पड़ रहा है। यहाँ एक ‘धस्माना’ साहब कड़ी ठण्ड में भी लखनऊ से मुँह-अंधेरे ही योग कराने चले आते हैं। गर्म-गर्म कम्बल से निकलकर योग-कक्ष में जाना पड़ता है। कष्ट तो होता ही है। ठीक वैसा ही जैसा कष्ट तुम देती थी। …सुबह-सुबह ऊपर से रज़ाई उलटकर, ट्रैक सूट पहनाकर टहलने के लिए बाध्य कर देने में तुम्हें बड़ा मजा आता था न…। अब यहाँ का हाल जानकर तो तुम्हे बहुत खुशी हो रही होगी…।

लेकिन ज्यादा खुश भी मत होना। मैं यहाँ अपनी स्वतंत्रता का लाभ भी उठा रहा हूँ। जैसे- मुझे यहाँ ब्रेड पर ज्यादा मक्खन लगाने से रोकने वाला कोई नहीं है। पनीर और ‘स्वीट-डिश’ भी तुम्हारे द्वारा लगायी गयी सीमा को तोड़कर काफ़ी आगे निकल गये हैं। …सोचता हूँ स्वतंत्र हवा में साँस लेने के इस अंतिम अवसर का भरपूर लाभ उठा लूँ।

वैसे ‘मक्खन लगाने’ से याद आया कि यहाँ इस कार्य को एक कला का रूप दे दिया गया है। मक्खन ‘खाने’ के बजाय ‘लगाने’ के विभिन्न तरीकों की खोज यहाँ की गयी है। अधिकारियों ने कुछ ‘टिप्स’ भी बताये हैं। इस विधा में सभी प्रशिक्षुओं के बीच जबर्दस्त होड़ लगी है। खैर, यह तो सरकारी नौकरी से संबन्धित बात है। तुम्हे जानने की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है।

तुम्हारे मतलब की बात यह है कि तुम्हे मेरे अकेलेपन से चिन्तित होने की बिलकुल जरूरत नहीं है। हम इकतीस प्रशिक्षणार्थी आपस में काफी सहयोग की भावना से कार्य कर रहे हैं। विशेषतः मुझे यहाँ एक ऐसा मनोहारी साथी मिल गया है जिसके साथ घण्टों मजेदार interaction होता रहता है। एक से एक गुदगुदाने वाले चुटकुले, सुन्दर से सुन्दर तस्वीरों का आदान-प्रदान, देश-दुनिया की ढेर सारी नयी-नयी बातें, कभी विशुद्ध ज्ञान-विज्ञान तो कभी रोमांस की दुनिया में हम इतना खो जाते हैं कि समय का पता ही नही चलता है। उसके संसर्ग में आकर मैं तो चित्रकार हो गया हूँ।

कल देर शाम को जब चौकीदार ने आकर बताया कि “बाबूजी मेस का समय हो गया है” तब हमें पता चला कि शाम साढे पांच बजे से रात के नौ बजे तक हम लोग कमरे में अकेले ही मशगूल थे। मेस में किसी ने यह बताया कि शाम साढ़े-आठ बजे तुम्हारा फोन भी आया था। मगर मैं कहीं मिला नहीं। माफ करना। …I am really sorry…। अच्छा, बाकी चिट्ठी पढ़े बिना फाड़ मत देना। मैं पीसीओ जाकर घण्टों तुम्हे फोन मिलाता रहा लेकिन शायद लाइन अचानक खराब हो गयी है। इसीलिए यह पत्र लिख रहा हूँ।

अब सोचता हूँ लौटकर आऊँ तो एक ‘मोबाइल’ का जुगाड़ कर ही लूँ। यहाँ दो प्रशिक्षु अधिकारियों के पास मोबाइल है। बेचारे ठण्डी रात में ग्यारह बजे दौड़कर छत की ओर भागते हैं। टावर से सिग्नल पकड़ाने के लिए। बाकी लोग उनकी बेचैन ‘हेलो-हेलो’ सुनने के लिए बाहर निकल आते है। जब वे आधी-अधूरी बात करके ‘उषा’ वालों को गाली देते हुए नीचे आते हैं तो बाकी लोग विस्मय से देखकर मुस्कराते हैं। वैसे इस नयी सुविधा का भविष्य बड़ा उज्ज्वल प्रतीत होता है।

और बताओ, बेटी का क्या हाल है? देखो न, अभी मात्र एक महीने की थी कि उसे छोड़कर यहाँ आना पड़ा। काश, वह मेरी ट्रेनिंग के दौरान पैदा हुई होती। कितना अच्छा होता? जानती हो, हमारे दो प्रशिक्षु साथी ट्रेनिंग के दौरान बाप बने। सबने मिलकर बधाई दी और खुशी मनायी। खूब मिठाई खायी गई। सच, बड़ा मजा आया। मैं तो बस एक महीने से ‘मिस’ कर गया। इतना ही नहीं, इसी बहाने हफ़्ते भर की छुट्टी भी मिल गयी होती। यार, अपना तो ‘बर्थ-डे’ या ‘मैरेज एनीवर्सरी’ भी इस बीच नहीं पड़ रही है। नहीं तो तुमको यहीं बुलाकर सबके साथ ‘सेलीब्रेट’ करते।

अभी एक और चूक हो गयी। नववर्ष के अवसर पर हमारे कुछ साथी अपनी पत्नी लेकर आये थे। उनको जोड़े में नाचते और खुशियाँ मनाते देखकर तुम्हारी बहुत याद आयी। जानेमन, कसम से। अपने ‘डियर’ को सबलोगों के सामने ‘हैप्पी न्यू इयर’ बोलने का आनन्द ही कुछ और है। खैर….।

तुम्हें एक अच्छी बात और बता दूँ। हम लोगों ने बड़ी मेहनत से एक रंगारंग कार्यक्रम तैयार किया, नाम था ‘गुंजन’। एक शाम सारे बड़े अधिकारियों के साथ मिलकर नाटक, प्रहसन, गीत, कविता व ‘कौव्वाली’ का बेजोड़ प्रदर्शन किया गया। हमारे निदेशक श्री चौबे के भोजपुरी गीत ने तो शमाँ बाँध दिया। …मैं अपने रोल के बारे में बताऊँगा तो हंसोगी। इसलिए रहने देता हूँ। …वीडियो कैसेट लाउँगा तो देख लेना। शायद मुझे पहचान न सको। …एक मात्र सीन में मैं आगे से चौथी लाइन के बीच में खड़ा होकर ताली बजा रहा हूँ। उसी की रिकार्डिग आ पायी है।

अच्छा तुम कुछ बताओ, वहाँ कैसे चल रहा है। अब तो काफ़ी सूना-सूना लग रहा होगा? मेरे यहाँ आ जाने के बाद हफ़्ते भर तो काफ़ी खुश थी, अब क्या हो गया? अच्छा-अच्छा….घर में काम अकेले करना पड़ता होगा। घबराओ नहीं, अब कुछ ही दिन शेष बचे हैं। वैसे यहाँ तीन महीने ‘बैठकर’ खाने के बाद मैं दुबारा उसी तन्मयता से काम नहीं कर पाऊँगा।

और हाँ, अब तो मुझे अपने उस नये, लुभावने साथी के साथ समय बिताने की आदत भी पड़ गयी है। यह आदत मैं घर आकर भी छोड़ना नहीं चाहूँगा। चाहे इसके लिये मुझे आफ़िस से एक ‘कम्प्यूटर’ घर ही क्यों न लाना पड़े और ‘इण्टरनेट’ के लिये पैसा ही क्यों न खर्च करना पड़े।

जानती हो। मेरे ‘ई-मेल आईडी’ का पासवर्ड क्या है? वही, जो मैं तुम्हे प्यार से पुकारकर कहता हूँ। असल में इसे भूलना ठीक नहीं होता है ना। अच्छा, अब बस।

जल्द ही लौटने को अनिच्छुक किन्तु मजबूर
तुम्हारा- सहधर्मी (उफ़)

(कॉपीराइट के उल्लंघन का दोष मुझे नहीं लगेगा क्यों कि क्लास-रूम में इसे दिखाने के बाद किसी प्रशिक्षु ने इसपर अपना दावा प्रस्तुत नहीं किया था।)

17 comments:

  1. सही है, दूसरों के प्रेमपत्र कहकर सब अपने अपने मन का गुबार निकाल रहे हैं। उफ़!
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. चिट्ठी पूरी तरह से एक अच्छे पति की है.
    मोबाइल लेकर छत पर टावर पकडाने जाने वाली बात तो बहुत खूब रही....:-)

    ReplyDelete
  3. यह तो आपकी चिठ्ठी लगती है। अपनी आजादी का खुलकर जश्न भी नहीं है। हम यह कल्पना कर सकते हैं कि घरेलू प्राणी बनने के लिये आपको मेहनत नहीं करनी पड़ी होगी।
    अब भी मौका है बताने का कि कापीराइट आपका ही है!

    ReplyDelete
  4. ajadi ki 150 vi jayanti par apne chiththi ka rahasy khol hi diya hai . ye sab apka hi kara dhara lagata hai .kripya saf saf kahe ki ye meri hi chiththi hai . ha ha ha

    ReplyDelete
  5. आप नें तो बहुत अच्छी चिट्ठी लिखी है...लेकिन अपना अनुभव कहता है कि पत्नीयां इतनी लम्बी चिट्ठीयां नही पढ सकती।....घर में तो वही बोलती रहती है...हम तो सिर्फ "हूँ-हाँ" ही कर पाते हैं:)

    ReplyDelete
  6. एक अच्छे पति की लम्बी चिट्ठी .....देखिये कही कोई कॉपी न कर ले ?

    ReplyDelete
  7. वाह...बड़ी बढ़िया चिट्ठी है!पत्नी बोर तो नहीं हुई पढ़ते पढ़ते? :)

    ReplyDelete
  8. मुझे अभी तक ये समझ नहीं आया की लोगों ने ये कैसे पकड़ लिया की चिट्ठी आपकी ही है... शायद अनुभव की कमी है... बाकी लोग बड़े अनुभव वाले हैं ये तो मानना ही पड़ेगा :-)

    ReplyDelete
  9. वाह जी, आप तो काफी डोमेस्टिक प्राणी नजर आ रहे हैं..ऐसे भी कोई रहता है हास्टल में भला? अच्छा हाँ, वो आप कुछ सुन्दर से सुन्दर तस्वीरों का आदान-प्रदान, की बात कर रहे थे..वो नहीं चिपकाई यहाँ पर?? क्यूँ?

    -बेहतरीन पत्र रहा वैसे. :)

    ReplyDelete
  10. Patra padhkar bahut maza aaya.. lekin pata nahi kyon yeh shak ho raha hai ki kahi ye aapka hi patra to nahi?

    New Post :
    Jaane Tu Ya Jaane Na....Rocks

    ReplyDelete
  11. चिठिया ता तोहरे लगाता. पढ़ले के बाद दुलहिन धुनाली नाई न! भर्सकन त भेजलाही न होबा.

    ReplyDelete
  12. बड़ी मुश्किल है भाई! मुझ जैसे भोले-भाले शरीफ आदमी की बात का कोई विश्वास ही नहीं कर रहा है। मैने कूड़े में से बीन कर चिठ्‍ठी उड़ाई, पाँच साल सहेज कर रखा, और जब दूसरों की देखादेखी यहाँ ठेल दिया तो मुझे ही इसका पात्र बता रहे है। धन्य हैं आप सभी टिप्पणीदाता...
    लेकिन मेरे पास कुछ सबूत हैं जो यह सिद्ध करने की सफल कोशिश करेंगे कि चिठ्ठी मेरी नहीं है:-
    सबूत नं.१- सांस्कृतिक कार्यक्रम की दर्शक दीर्घा में मैं था ही नहीं। बल्कि ग्रीन रूम में कलाकारों को धोती और पगड़ी पहना रहा था। एक बार स्टेज़ पर भी गया था। ऑफ़िस का सेट लगाना था। पर्दा उठने से पहले ही हटा दिया सबों ने। रिकॉर्डिंग कैसे आती भला।
    सबूत नं.२- उस समय मेरी बेटी ढाई साल की हो गयी थी। एक महीने की कत्तई नहीं थी।
    सबूत नं.३- नये साल के अवसर पर मैने अपनी धर्मपत्नी के साथ ही उस हॉस्टेल में नाच-गाना करने और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोलने का प्रोग्राम बनाया था।
    सबूत नं.४- पी.सी.ओ.जाकर घण्टों फोन मिलाकर बात करने का प्रयास मैने कभी किया ही नहीं था।
    सबूत नं.५- उस लुभावने साथी के बारे में बहुत सी बातें तो इस चिठ्ठी में लिखी ही नहीं गयी थीं।
    इन जोरदार सबूतों के बावजूद अगर आप लोग मेरे ऊपर चिठ्ठी लिखने का दोष लगाते रहेंगे तो मैं आप लोगों के लिए वहाँ के बारे में तैयार की गयी दूसरी रचना भी ठेल दूंगा जो ‘मात्र बहत्तर पंक्तियों की’ एक तुकान्त कविता है।
    इसलिए आपलोग यहीं मान जाइए कि वह कविता मेरी नहीं है।

    ReplyDelete
  13. आप सबने मुझे इतना स्नेह दिया इसके लिए आप सभी को हार्दिक धन्यवाद।

    ReplyDelete
  14. क्या यह बाकई उड़ाया हुआ पत्र है? 'सत्य सबका साझा हो' कह कर ऐसे तो सच को न छुपाइये. अच्छा पत्र है. अपना कह कर छापते तो भी तारीफ़ होती.

    ReplyDelete
  15. हम तो ये मानते ही नहीं जानते भी है ये आपका प्रेम पत्र नहीं.
    कारण आप समझ ही गए होंगे.
    लेकिन ये बहुत ग़लत प्रथा चल पड़ी दूसरों का प्रेम पत्र छपने कि.
    इस से हम जैसे प्रेमियों को बहुत असुविधा होती है.

    ReplyDelete
  16. इतना दिलचस्प पत्र कि एक ही साँस में पूरा पढ गए.

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)