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Wednesday, July 16, 2008

बची-खुची पेंशन के लिए प्राप्त प्रार्थना-पत्र

हमारे यहाँ सरकारी दफ़्तरों में जब दूर-दराज से गाँव-देहात के लोग अपना कोई काम कराने आते हैं तो उनकी अज्ञानता को भुनाने के लिए अनेक पढ़े-लिखे लोग दुकान सजाये मिल जाते हैं। अमुक काम किस दफ़्तर से होगा, किस जुगाड़ से होगा, और ‘खर्चा-बर्चा’ क्या लगेगा यह सब कुछ सहर्ष बताने और करा देने को तैयार लोग कचहरियों और सरकारी कार्यालयों के आस-पास घूमते या अड्डा बनाकर बैठे हुए आसानी से पहचाने जा सकते हैं। अशिक्षा और पिछड़ेपन के अंधकार में रास्ता तलाशते लोगों के लिए ये एक टिमटिमाते दिए का काम करते हैं।


किसी भी ‘साहब’ के दफ़्तर में जाने पर सबसे पहले एक अदद दरख़्वास्त की ज़रूरत पड़ती है। बहुत लोग ऐसे हैं जो केवल दूसरों की दरख़्वास्त लिखकर और उसे सम्बन्धित अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर अपनी जीविका चला रहे हैं। इसमें कुछ ऐसे जूनियर वकील भी हैं जिनकी प्रैक्टिस गोते लगा रही है। शुरू-शुरू में जब मुझे एक ही लिखावट और भाषा-शैली के प्रार्थना-पत्र अलग-अलग फरियादियों की ओर से मिलते थे तो मुझे आश्चर्य हुआ था, लेकिन बाद में आदत पड़ गयी। बल्कि इससे एक सुविधा यह हो गयी कि पूरा कागज पढ़ना नहीं पड़ता। काम की बात कहाँ लिखी है, यह कागज हाथ में लेते ही पता चल जाता है।

इन प्रार्थना-पत्रों के अवयव(contents) उनकी तुलना में अलग तरीके से लिखे गये होते हैं जो फ़रियादी द्वारा स्वयं तैयार किए जाते हैं। फीस देकर लिखाये गये पत्रों में विस्तार का अभाव होता है तथा भाषा सरकारी टाइप की होती है, जबकि स्वयं प्रार्थी द्वारा तैयार प्रार्थना पत्रों में अनावश्यक विस्तार, बातों की पुनरावृत्ति और दीनतापूर्ण आग्रह का समावेश होता है। कोषागार में आमतौर पर बुजुर्ग पेन्शनभोगियों या उनके आश्रितों द्वारा भुगतान से संबंधित पत्राचार पढ़ने को मिलता है जो प्रायः नीरस और उबाऊ ही होता है। लेकिन कल मुझे एक ऐसा प्रार्थना पत्र मिला जिसे पढ़कर मुझे यहाँ बताने लायक ज्ञान की प्राप्ति हो गयी।

जिलाधिकारी को लिखे गये इस पत्र के माध्यम से प्रार्थी ने अपने दिवंगत दादा-दादी की पेंशन की कुछ बची-खुची धनराशि(life-time arrears LTA) के भुगतान में विलम्ब की शिकायत करते हुए तत्काल भुगतान की गुहार लगायी है। यह एक पढ़े-लिखे अतृप्त लेखक की कलम से लिखी गयी गाथा है जिसे सरकारी दफ़्तर में बैठे हुए एक क्लर्क से घोर शिकायत हो गयी है क्योंकि वह उसका चचेरा भाई भी है। करीब छः पृष्ठों में तैयार यह प्रार्थना-पत्र पूरा का पूरा पढ़ने लायक है लेकिन मैं यहाँ इसका मुश्किल से संपादित किया हुआ वह अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें उन्होने अपनी पहचान (identification) के लिए कोषाधिकारी के कार्यकक्ष में उपस्थित होने की आवश्यकता को खारिज़ करने का प्रयास किया है:-

[यथासम्भव उनका आलेख हूबहू देने का प्रयास कर रहा हूँ इसलिए वर्तनी और पैराग्राफ (अ)परिवर्तन में कुछ खटके तो मेरा दोष मत मानिएगा]
“…काउण्टर नम्बर-एक पर तैनात dealing klerk के पिता और मेरे पिता दोनो चचेरे भाई हैं। इनके पितामह(grand father) और मेरे पितामह दोनो सगे भाई हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मेरे पिताजी गवर्नमेण्ट प्रेस में एक सरकारी मुलाजिम थे। वहाँ से on deputation इलाहाबाद हाईकोर्ट के coping section के S.O. रहे और तत्पश्चात नायब तहसीलदार। किन्तु मेरे पिताजी ने ब्रिटिश ब्योरोक्रेसी की नौकरी करने की अपेक्षा मातृभूमि की सेवा करना अधिक श्रेयस्कर समझा। अतः सन १९४२ के महात्मा गान्धी के ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया फलतः तीन बार जेल गये। जिनमें से दो बार नज़रबंद (security prisoner) रहे। स्वतंत्रता बाद, यह वर्ष १९५० से ५७ के मध्य की बात है कि उनकी लिखी हुई एक पुस्तक ‘ज्ञानालोक’ उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कक्षा-आठ में स्वीकृत थी। जब ‘भूदान’ के जनक आचार्य विनोबा भावे (संभवतः वर्ष१९५५ में) पहली बार इलाहाबाद आये तो जो ‘जिला भूदान समिति-इलाहाबाद’ गठित की गयी थी उस समिति का प्रथम मंत्री बनने का गौरव मेरे पिताजी को मिला। बहुमुखी प्रतिभा के धनी होने के कारण मेरे पिताजी के व्यक्तित्व, प्रगति, उत्थान तथा बुलन्दियों से इनका परिवार ईर्ष्या, द्वेष जलन रखता था। सच बात यह है कि ‘विभीषण’ हर युग में पैदा हुए हैं, हर युग में रहते हैं। विभीषण में कई विशेषण थे- १.विभीषण अपने भाई की प्रतिभा, योग्यता, प्रगति और बुलन्दियों पर गर्व नहीं करता वरन्‍ वह अपने भाई से ईर्ष्या, द्वेष जलन रखता है। २.विभीषण की दूसरी विशेषता यह रही कि भाई के शत्रु उसे मित्र, शुभचिन्तक, हितैषी लगते हैं। ३.विभीषण की तीसरी विशेषता यह रही कि अपने भाई के शत्रुओं से मिलकर उनकी सहायता से अपने ही भाई से लड़ता है। यहाँ भी यही हुआ कि वर्ष १९७० में इनका पूरा परिवार इनके पिता, इनके सगे चाचा तथा ये चारो भाई मेरे पिता व मुझसे तथा मेरी माता से लड़ पड़े। और तबसे मेरा व इनके परिवार का उठना बैठना, दुआ सलाम (राम रहारी), खाना पीना सब छूट गया, सब समाप्त हो गया। विभीषण के तन, मन, धन की सहायता तथा अथक प्रयास से कालजयी, अपराजेय, महाबली, महापंडित रावण का बध हो जाता है।…”
…“मुझे यह लिखने में, यह बताने में कोई संकोच नहीं कि मेरे पिता के उन सभी शत्रुओं की मदद लेकर यहाँ इस ‘विभीषण काका’ ने मेरे पिताजी की हत्या कर दी। किन्तु यह जीतकर भी, विजयी होकर भी अपने को हारा हुआ महसूस करते हैं। अतः ऐसे में अगर यह कुछ न करें तो इनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है”…
…“विभीषण की चौथी विशेषता को बग़ैर बताए मुझे यह प्रकरण अधूरा –अधूरा सा लगता है। विभीषण की चौथी विशेषता यह रही कि वह अपने ही वंश का नाश करवाता है। यहाँ भी यही हुआ। उस पैतृक गाँव से भाग आये और अब वहाँ कुछ भी नहीं है। उस पैतृक गाँव से ‘कलवार वंश’ का नाश हो गया”…
“इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि Dealing clerk जबसे होश संभाले हैं तबसे मुझे जानते पहचानते हैं।”…

इन विद्वान सज्जन का आशय यह है कि जब दफ़्तर का बाबू इन्हें जानता ही है तो सक्षम अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपनी पहचान कराने और अवशेष पेंशन के भुगतान के प्रपत्रों पर कोषाधिकारी के सामने हस्ताक्षर करने की ज़रूरत नहीं है। इसी ग़ैरजरूरी काम से बचने के लिए इन्होने जिलाधिकारी, मण्डलायुक्त और शायद मुख्यमंत्री तक अपनी राम कहानी लिख भेजी है। कलेक्टर साहब से तो ये कई बार मिल भी चुके हैं। लेकिन मुझे इनसे मिलने का सौभाग्य नहीं मिल सका है। इसके लिए इनको सादर व्यक्तिगत पत्र भी लिख चुका हूँ कि मेरे ऑफ़िस में आकर अपने पावन हस्ताक्षर दे जाँय, लेकिन उसके बदले इनके द्वारा रचित अनमोल साहित्य ही मेरे हाथ लग रहा है।

कुल ४००० रुपयों के भुगतान के बहाने मुझे इतना ज्ञान प्राप्त हो गया कि मैने कृतज्ञता वश इनका चेक सीधे बैंक को प्रेषित करा दिया है। इनकी फोटो पर ही मैने ‘इन्हे देखकर पहचानने और तभी भुगतान करने’ की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर दिया।…इस उम्मीद में कि शायद इनकी आत्मा को शान्ति मिल जाय।

4 comments:

  1. कभी अगर मौका लगे और यदि न पढी हो, तो हरि शंकर परसाई जी 'भोला राम का जीव' पढियेगा-इस परिदृश्य में आनन्द आयेगा.

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  2. हैरानी कभी कभी मुझे इन सरकारी बाबू की खाल को लेकर होती है की इतनी मोटी होती है की किसी चीज़ का कोई असर नही होता ....सच मानिये आजकल इमानदारी की परिभाषा बदल गई है जो आदमी रिश्वत लेकर वक़्त पर काम कर दे वो ईमानदार है और वाजिब काम कराने के लिए आपको रिश्वत देनी पड़ती है...

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  3. बहुत जमा के लिखा जी।
    यह सत्साहित्य हमारे यहां भी कुंतल के भाव आया करता था। प्रोमोशन होने पर यह कुछ छंट गया है। पर दफतर में अब भी बहुत मिलेगा!:)

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  4. सुंदरतम, रोचक और सटीक लेखन। साधुवाद।

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