Sunday, June 22, 2008

पच्चीस साल पुराना वह दो मिनट…

इस बार की मेरी गाँव की यात्रा नये-नये अनुभवों की गवाह बनी। इलाहाबाद लौटने से पहले मैने एक रात ससुराल में बितायी। श्रीमती जी को मायके का सुख इसबार भी एकही दिन का मिल पाया। लेकिन संयोग से वह रात एक बहुत पुराने राज पर से पर्दा उठाने वाली साबित हुई। मैं तो सुनकर सन्न रह गया। …उनकी बतायी घटना को उन्ही के शब्दों में पेश कर रहा हूँ। आपभी जानिए…(उनकी अनुमति प्राप्त कर ली गयी है।)

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शिवमंगल से जब भी मेरी मुलाकात होती है हम सहसा मुस्करा पड़ते हैं। बचपन में घटी उस घटना को करीब पच्चीस साल बीत गये हैं। कुल दो मिनट में सबकुछ हो गया था लेकिन वे दो मिनट मेरे जेहन में बिलकुल ताजा हैं। आज मैं अपने पापा के गाँव से विदा होकर ससुराल और ससुराल के गाँव से ‘इनके’ हर तबादले के बाद अपनी गृहस्थी कई बार शिफ़्ट कर चुकी हूँ। अपना बचपन पीछे छोड़कर अपने दो बच्चों के बचपन को सँवारने की जिम्मेदारी में मसरूफ़ हो गयी हूँ। फिर भी कभी कभार मायके जाने पर अपने उस अकिंचन बालसखा से जब भी आँखें मिलती हैं एक नैसर्गिक मुस्कान हम दोनों के चेहरे पर सहसा दौड़ पड़ती है।

यह इस बार भी हुआ… और वह भी अपने भाई और पापा के सामने ही। हम चाह कर भी अपनी मुस्कान छिपा नहीं पाए। पकड़े जाने पर पापा भी पूछ ही बैठे… क्या बात है… गाँव में एक बनिया परिवार के उस लड़के से मुस्कान का ऐसा आदान-प्रदान शादी के नौ साल बाद भी देखकर थोड़ा असहज़ लगा था उन्हें। शुक्र है मेरे भाई को सब कुछ पता था… उसने बात सम्भाल ली।

इस बार की मुलाकात हुई भी थी एक आपराधिक वारदात के तुरंत बाद जुटी भीड़ के बीच। रात के करीब नौ बजे मेरे गाँव से गुजरने वाली नहर की पुलिया पर बदमाशों ने एक आदमी को गोली मार दी थी। सिर्फ इसलिए कि उसने एक राहगीर की साइकिल छीने जाने का विरोध कर दिया था। बदमाश अंधेरे में भाग निकले थे। गोली की आवाज सुनकर गाँववाले जब वहाँ पहुचे तो घटना का प्रत्यक्ष गवाह बना एक आदमी मिला। यह कोई और नहीं, बल्कि शिवमंगल था- वही जो मेरे बचपन के स्मृति पटल पर अब भी बदस्तूर चस्पा है। जिसे गोली लगी थी उसे तत्काल जिला-अस्पताल भिजवाया गया। हालत खतरे से बाहर बतायी गयी थी। इसलिए सभी लोग थोड़ी राहत के साथ शिवमंगल उर्फ़ मुनीब की बात सुन रहे थे। किसी सेठ के यहाँ कभी ‘मुनीब’ का काम कर चुका था इसलिए अब इसे गाँव में इसी नाम से बुलाते हैं।

मैं भी डॉक्टर बन चुके अपने भाई के साथ वहाँ पहुँच गयी थी। मुनीब की सुपरिचित आवाज़ सुनकर मैने यत्नपूर्वक भीड़ के बीच रास्ता बनाया और उसके सामने पहुँच गयी। वहाँ मौत के मुँह से बाल-बाल बचने की चर्चा हो रही थी। गोली खाये व्यक्ति के भाग्य को सराहा जा रहा था। भगवान को भी इसकी क्रेडिट दी जा रही थी। इसी दौरान हमारी आँखें चार हुईं… और फिर वही मुस्कान। …अजीब माहौल बन गया। पापा वहाँ तो कुछ नहीं बोले लेकिन घर लौटने पर उनका चेहरा स्पष्ट रूप से प्रश्न कर रहा था।

मैने भी सोचा कि पच्चीस साल पुराना करार अब तोड़ देने में कोई हर्ज नहीं है। तब हमने तय किया था कि यह बात कभी भी किसी को नहीं बताएंगे। कुल तीन हमराज थे उस घटना के। शिवमंगल, मैं और मेरा छोटा भाई रिंकू।… तब हमारी उम्र रही होगी करीब ७-८ साल।
हमारे खलिहान में एक कुँआ हुआ करता था जिसमें बारिश के दिनों में पानी काफी ऊपर तक भर जाता था। वहाँ रोज़ खेलने के लिए जमा बच्चे कुँए की जगत पर बैठकर अन्दर पैर लटकाकर अपनी बाँहों पर वजन संतुलित करके पैर से पानी छू लेने का प्रयास करते और उनके अभिभावक उन्हें ऐसा न करने के लिए हमेशा मना करते और कड़ी निगरानी रखते। लेकिन बच्चों को वही सब करने में मजा (रोमांच) आता है जिसके लिए मना किया जाता है। कोई न कोई रोज पिटता भी था। उस बाल-मण्डली में सबसे लम्बी और थोड़ी ढीठ होने के कारण मै यह कारनामा अक्सर किया करती थी। पता चलने पर इसके लिए पापा की डाँट भी खूब पड़ती थी। लेकिन जब पापा मोटरसाइकिल से बाहर निकल जाते तो हमारे लिए इस खेल का मौका मिल ही जाता था।

एक दिन ऐसे ही मैं रिंकू को साथ लेकर कुएं का खेल खेलने पहुँची। मुझे देखकर मुझसे करीब दो साल बड़ा किन्तु कद में छोटा शिवमंगल भी आ गया। उसने अपनी बहादुरी दिखाने के चक्कर में झट अपना पैर कुँए में लटका दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश अचानक उसका हाथ कुँए की जगत से फिसल गया। पानी में खुद को गिरता देख वह हड़बड़ी में कुँए के बीचोबीच खड़ी ९ इंच मोटी लोहे की बोरिंग वाली पाइप से लिपट गया। लेकिन पाइप गीली और चिकनी थी। दोनो हाथ व पैरों को पाइप से लपेट लेने के बाद भी वह धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा। आसन्न खतरा भाँप कर उसका बड़ा भाई मार खाने के डर से भाग गया और चुपचाप कहीं छिप गया। शिवमंगल का वह कातर चेहरा मुझे कभी नहीं भूलेगा। उसे इतना समय भी नहीं मिला था कि आँसू निकल पाये हों, चिल्लाकर किसी को मदद के लिए बुलाने भर का अवसर भी उसके पास नहीं था… वह नीचे की ओर सरकता जा रहा था…


सहसा मेरी निगाह उसके दारुण चेहरे और भयानक देहदशा पर पड़ी। वह कमर तक पानी में समा चुका था। मैने हिम्मत करके अपने रोज के आजमाये खेल का सहारा लिया। कुँए की जगत पर बैठकर अपने हाथों को मजबूती से जमीन पर टिकाया और पैर अंदर लटका दिए। उससे पकड़ कर ऊपर आने का संकेत किया। उसने बड़ी मुश्किल से एक हाथ पाइप से छुड़ाकर मेरे पैर की अंगुलियाँ पकड़ लीं। उसका नीचे सरकना रुक गया। लेकिन खतरा अभी टला नहीं थ। उसे बाहर खींच कर लाना मेरे लिए संभव नहीं था। मै खुद एक नाज़ुक संतुलन पर अटकी हुई थी। साँस रोककर मैने धीरे-धीरे पीछे की ओर सरकना शुरू किया। शिवमंगल को भी थोड़ी शक्ति मिल गयी। मेरा पैर थामकर वह ऊपर की ओर सरकने लगा। कुछ ही क्षणों में वह बाहर था। और हमारी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। वह पसीने से तर था। मैं डर के मारे थरथरा रही थी। …क्या होता अगर मैने उसे समय से देखा नहीं होता… या देखा भी होता और हिम्मत जवाब दे गयी होती… आखिर उसका बड़ा भाई सबकुछ देखकर ही चंपत हो गया था…।

जब थोड़ी देर बाद हमारी हालत सामान्य हुई, धड़कनें स्थिर हुईं और हमें लगा कि इस घटना को कोई और देख नहीं पाया है तो हमने तय किया कि इसके बारे में किसी को नहीं बताया जाएगा। हम इस करार पर कायम रहे। वह जब भी मिलता मुझे कृतज्ञता पूर्वक मुस्कराकर नमस्ते करता और मैं भी छिपी मुस्कान से उसकी भावनाओं की रसीद दे देती।

लेकिन इस बार जब मौत उसके सामने से ही गुजरी और मुझे भी पापा की डाँट (या पिटाई) का डर नहीं रहा तो मैने यह कथा घर वालों को सुना दी। उनकी प्रतिक्रिया क्या रही होगी इसका अनुमान आप स्वयं कर सकते हैं… आपको भी तो सुना ही दिया मैने! … शायद आपके अंदर भी वही चल रहा होगा।
- रचना

11 comments:

  1. ऐसे ही रचनाये श्रेष्ठता की श्रेणी में शुमार होती है. अच्छा लिखा है.

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  2. हमारी सांसे तो धौंकनी की तरह पढ़ते पढ़्ते ही चलने लगी जो सामने घटता तो क्या हाल होते, सोच भी नहीं सकते.

    बहुत उम्दा लिखा है..एकदम जीवंत चित्रण.

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  3. पढते वक्त ही कुछ कुछ सिहरन आ गई.... अच्छा लिखा।

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  4. स्कूल में एक कहानी पढ़ी थी - दो लड़के चिट्ठी ले के जा रहे थे और चिट्ठी कुँए में गिर जाती है, कुँए में साँप। लड़के चिट्ठी ले के आते हैं। दिल दहलाने वाली कहानी।

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  5. साँस रोके पूरा पढ़ गए।
    बाप रे आप तो बड़ी बहादुर निकली।

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  6. भाभीजी
    बहुत ही खूबसूरत लेकिन, बदमाश यादें, सहेजकर रखने लायक। लेकिन, बदमाशी करने वाले बहादुर हों तो, दिक्कत नहीं।

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  7. संकट के समय मानव अतिमानवीय ऊर्जा और साहस का परिचय देता है। लगभग असम्भव काम सम्पन्न होते हैं इस दशा में।
    यह संस्मरण भी वही सत्य रेखांकित करता है!

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  8. बहुत शानदार लेखन है. मानवीय संवेदना मनुष्य को कमजोर नहीं करती, जैसा कि अक्सर कहा जाता है. आपने बहुत धैर्य का परिचय दिया.

    श्री राम शर्मा की कहानी स्मृति की सहज ही याद आ गई.

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  9. जीवंत चित्रण.अच्छा लिखा है आपने

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  10. - शिवमंगल के साथ कोई अमंगल नहीं हुआ तो इसका श्रेय मुझे जाता है।… जी हाँ, ठीक सुना आपने… मुझे यानि ‘सिद्धार्थ’ को। ईश्वर ने रचना जी का गठबंधन मेरे साथ तय कर रखा था। …भला अगर भविष्य के ‘मुनीब जी’ बाहर नहीं निकल पाये होते …तो ये दोनो सखा-सखी जल-समाधि ले चुके होते। …फिर विधाता मुझे क्या जवाब देते?
    मैं तो अब आत्म-मुग्ध हो गया हूँ।

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  11. दिलचस्प भी ,मजेदार भी ओर सच्चा भी ...इस किस्से में बहुत कुछ था......ओर कही इश्वर भी था.....

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