हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, May 27, 2008

अर्जित अवकाश पर गाँव जा रहा हूँ…

ब्लॉगर बंधुओं, आखिर वो घड़ी आ ही गई जब मुझे पन्द्रह दिन के अर्जित अवकाश पर अपने पैतृक गाँव जाना पड़ रहा है। मेरे दादा जी ने इमरजेन्सी काल पर परिवार के सभी सदस्यों को तुरंत बुला लिया है। लगता है जीवन के ध्रुव सत्य से साक्षात्कार कराने की मंशा है।

वहाँ गाँव में इण्टरनेट और कम्प्यूटर तो दूर की बात बिजली भी कभी-कभी ही आती है। ऐसे में ब्लॉग की दुनिया कुछ समय के लिए दूर हो जाएगी। लेखन कठिन हो जाएगा। इसका दुःख कम है लेकिन निरन्तर बह रही विचारों की अजस्र धारा में डुबकी लगाने का सुख कुछ दिनों के लिए रुक जाएगा इससे थोड़ा उदास हूँ। मेरे लिए तो यह कल्पना करना कठिन हो रहा है कि संचार के इस साधन के बिना दिन कैसे गुजरेंगे। जबकि मात्र दो महीने पहले इस दुनिया से मैं लगभग अन्जान था। बस अखबारी ज्ञान से इसका नाम सुन रख था।

देखते-देखते आपलोगों से इतना जुड़ाव हो गया है कि पंद्रह दिन का विछोह भारी लग रहा है। लेकिन कर ही क्या सकते हैं। जीवन के अन्य पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए मिलते हैं एक ‘छोटे से’ ब्रेक के बाद… नमस्कार।

सिद्धार्थ

5 comments:

  1. रोचक लगता है और सुखद भी जब चिठेरे इस प्रकार की बात ब्लॉगजगत को अपनी एक्स्टेण्डेड फैमिली मान कर करते हैं। यही ब्लॉगिंग नेटवर्क का महत्व है।
    आशा है आपके दादाजी शतायु हों।

    ReplyDelete
  2. खुशकिस्मत हैं आप कि आपको कोई गाँव बुलाता है!
    वैसे अजस्र का अर्थ क्या होता है?

    ReplyDelete
  3. इत्मिनान से हो आयें गांव. हम सब इन्तजार करेंगे. दादाजी स्वस्थ रहेंगे, हम सबकी प्रार्थना में वो होंगे.

    मिस तो करेंगे आपको, यह याद रखियेगा.

    बहुत शुभकामनाऐं.

    ReplyDelete
  4. दादाजी के स्वस्थ रहे इसकी शुभकामना... और कभी-कभी तो इस टेक्नोलॉजी से दूर रहना एक तरह से शुकुन होता है.

    ReplyDelete
  5. आपकी यात्रा शुभ हो ऐसी दुआ करते है......दादा जी को प्रनाम कहियेगा

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)